गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009

हिरासत में मौत गंभीर मामला ! किन्तु आम बात

आज सुबह जब मै अखबार पढ़ रहा था तो अचानक मेरी नजर एक खबर पर पडी शीर्षक था " हिरासत में युवक की मौत से पुलिस संदेह के घेरे में" खबर को आगे पढ़ने पर पता चला कि मुंबई हाई कोर्ट के न्यायाधीश 'द्वय' जस्टिस बिलाल नाचकी एवं जस्टिस ए. आर. जोशी की डिविजन बेंच नें मंगलवार को याचिकाकर्ता मेहरूनिसा जो कि मृतक अल्ताफ की माँ है के याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पहली नजर में यह हिरासत में हत्या का मामला लगता है क्योंकि पोष्टमार्डम रिपोर्ट में यह बात कही गयी है कि मृतक अल्ताफ के पुरे शरीर पर गंभीर घाव थे पुलिस इस मामले की लीपापोती कर रही है । संभव है कि याचिकाकर्ता के प्रयास एवं मुंबई हाई कोर्ट की सक्रियता से अल्ताफ के हिरासत में मौत का मामला उजागर हो जाय यह भी संभव है कि मामला उजागर होने से पहले दबा दिया जाये और याचिकाकर्ता हाँथ मलते हुए अदालत से बाहर आ जाय क्योंकि न्यायपालिका, विधायिका आदि आज के भारतीय लोकतंत्र की तानाशाही के दिखाने के दाँत हैं, पुलिस, सेना और तरह-तरह के अर्द्धसैनिक बल ही उसके खाने के दाँत हैं। तमाम पुलिसिया दमन-उत्पीड़न के बावजूद सरकार दोषी पुलिसकर्मियों पर न तो कोई कार्रवाई करती है और न ही ब्रिटिशकालीन पुलिस सम्बन्‍धी कानूनों में संशोधन करती है। हिरासत में मौत अब आम बात हो गयी है देश भर में हर रोज पुलिस हिरासत या कानूनी हिरासत में औसतन चार लोगों की मौत हो रही है ।
एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट ( टार्चर इन इंडिया ) खुलासा किया है कि १ अप्रैल २००१ से ३१ मार्च २००९ तक देश भर में कुल ११८४ लोगों की पुलिस हिरासत में मौत होने की सूचना राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को मिली इसमें उन लोगों की भारी संख्या है जिनकी मौत पुलिस हिरासत में की गई हिंसा ( मार-पीट) से हुई अधिकतर मौतें पुलिस हिरासत में लिये जाने के ४८ घण्टों के भीतर हुईं वर्ष २००७ में पुलिस हिरासत में ११८ लोगों की मौत हुई जबकि २००६ में यह संख्या ८९ थी। यानी कि एक साल में ३२.५ प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी के बरक्स रिपोर्ट बताती है कि २००७ में पुलिस हिरासत में हुई मौतों के ११८ मामलों में सिर्फ ६१ मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच के आदेश दिये गये या जाँच की गयी। १२ मामलों में कानूनी जाँच हुई। ५७ मामलों में पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ मामले दर्ज किये गये और ३५ पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ चार्जशीट दाख़िल की गयी। ग़ौरतलब है कि वर्ष २००७ में हिरासत में हुई मौत के मामलों में एक भी पुलिसकर्मी को सज़ा नहीं हुई। ध्‍यान देने वाली बात यह भी है कि ये ऑंकड़े सिर्फ उन मामलों के हैं जिनकी सूचना सम्बन्धित राज्यों की पुलिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दी है। एसीएचआर की रिपोर्ट कई ऐसे मामलों का ज़िक्र करती है जिनमें हिरासत में हुई मौत की सूचना पुलिस ने मानवाधिकार आयोग को नहीं दी। इसके अलावा सेना, अर्द्धसैनिक बलों, सीमा सुरक्षा बल और अन्य सशस्त्र बलों की हिरासत मे होने वाली मौतों का ज़िक्र इस रिपोर्ट में नहीं है, क्योंकि ये बल केन्द्र सरकार के नियन्त्रण में हैं।
इन सब के बीच मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाये गये राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्यों में राज्य मानवाधिकार आयोग के पास कोई ख़ास अधिकार ही नहीं होते। ये सिर्फ जवाब-तलब कर सकते हैं और सूचनाएँ इकट्ठा कर सकते हैं। सरकारी अधिकारी बहुत बाध्‍य हो जाने पर ही और काफी टालमटोल के बाद इनकी बात मानते हैं। इन आयोगों की शिकायतें और संस्तुतियाँ कार्रवाई के इन्तज़ार में पड़ी धूल फाँकती रहती हैं। हिरासत में मौत होने के ज्यादातर मामलों में पीड़ित के स्वास्थ्य सम्बन्‍धी रिपोर्टों और मौजूदा साक्ष्यों के बजाय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग पुलिस के बयान को तरजीह देता है। यही कारण है कि वर्ष २००७ में हिरासत में हुई मौतों के सिलसिले में एक भी पुलिसकर्मी को सज़ा नहीं हो पायी। अन्य सरकारी विभागों की तरह ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी आम जनता को जितनी राहत देता है, उससे कहीं अधिक का भ्रम बनाये रखता है। मानवाधिकारों का खुलेआम और बड़े पैमाने पर हनन के विरोध में मीडिया और सभ्य समाज में किसी सार्थक पहल का पूरी तरह अभाव है। ऐसे में मानव अधिकारों के संरक्षण हेतु कार्य कर रहे देश के तमाम बुद्धिजीवियों एवं मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी निश्चित रूप से बढ़ गयी है ।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

मानव अधिकार विचारधारा की उत्पत्ति एवं विकास में भारतीय योगदान

मानव अधिकार विचारधारा के विकास का क्रम भारत में आज से लगभग ९००० वर्ष (७३२३ ईसा पूर्व) पहले शुरू हुआ माना जाता है भारत के राज्य अयोध्या, प्राचीन काल में इसे कौशल देश कहा जाता था, के राजा रामचंद्र नें रावण और अन्य आततायी राजाओं का संहार कर रामराज्य की स्थापना की एवं द्वारका जोकि भारत के पश्चिम में समुद्र के किनारे पर बसी है, हजारों वर्ष पूर्व श्री कॄष्ण ने इसे बसाया था कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, गोकुल में पले, पर उन्होने द्वारका में ही बैठकर सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। कंस शिशुपाल और दुर्योधन जैसे आततायी अधर्मी राजाओं को नष्ट कर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की एवं नागरिकों के अधिकार उन्हें दिलाया । भगवान महावीर ( ५९९ ईसा पूर्व से २२७ ईसा पूर्व ) एवं भगवान बुद्ध ५६३ ईसा पूर्व के कालखंड में अधिकारों के अवधारणा की रचना की जिसमें सत्य, अहिंसा और समता मुख्य थे ।
इसी तरह यूनान में ( ४६९ से ३९९ ईसा पूर्व ) विख्यात दार्शनिक सुकरात का नाम आता है । सुकरात नें अपने अनुयाइयों को आत्मानुसंधान के बारे में तथा सत्य न्याय एवं इमानदारी का अवलंबन करने के बारे में बताया । हालाँकि तत्कालीन यूनानी शासकों नें सुकरात के उपदेशों पर प्रतिबन्ध लगाने का प्रयास किया पर सफल न होने पर उन्होंने सुकरात को विषपान कर अपनी इहलीला समाप्त करने का आदेश दिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस प्रबल पैरोकार नें विषपान कर अपनी इहलीला तो समाप्त कर ली किन्तु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आंच नहीं पहुचने दी इसके बाद सुकरात का शिष्य प्लेटो (४२८ ईसा पूर्व से ४२७ ईसा पूर्व ) प्लेटो का शिष्य अरस्तु (३८४ ईसा पूर्व से ३२२ ईसा पूर्व ) इन महान यूनानी दार्शनिकों नें तमाम मानवीय अधिकारों की व्याख्या की ।
इधर भारत में आगे चलकर सम्राट अशोक नें भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के (धार्मिक) अवधारणाओं को लेकर उसे राजनीतिक रूप दिया और यह सब सम्राट अशोक नें कलिंग की लडाई के पश्चात् उसमे हुए नरसंहार से दुखी होकर मानव गरिमा को अच्छुण बनाये रखने के प्रयास के तहत किया । सम्राट अशोक का कार्यकाल ईसा पूर्व २७३ से २३२ तक बताया जाता है इसके पश्चात् मानवीय अधिकारों को केंद्रविन्दु मानकर विश्व में तमाम क्रांतियाँ हुई जिसमें १२१५ ईसवी में मैग्नाकार्टा, १७९१ अमेरिकी बिल ऑफ राइट्स, तथा मानव अधिकारों को व्यापक गरिमा फ्रांसीसी क्रांति (१७८९ ) के पश्चात प्राप्त हुई । अमेरिका में जाँ जैक के संविदा सिद्धांत से प्रेरित क्रांति के समय संविधान सभा नें यह घोषणा की थी कि अमेरिकी संविधान निर्मित होने पर सबसे पहले मानव अधिकारों का उल्लेख किया जाएगा यह घोषणा वास्तव में जार्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में संयुक्त राज्य अमेरिका के स्वतंत्रता की घोषणा ( सन १७७८ ई०) के सिद्धांतों से प्रेरित थी ।
इसमें कोई दो राय नही कि भारत के आजादी की लडाई मानवीय अधिकारों के मूल्यों पर लड़ी गई । महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता के रूप में उभरे वे सत्याग्रह, अत्याचार के प्रतिकार एवं अहिंसा ( उन्होंने ये सभी अवधारणाए महावीर और बुद्ध के (धार्मिक) अवधारणाओं से उठाया ) और इसी का आजादी की लडाई में हथियार के रूप में इस्तेमाल किया तत्कालीन भारतीयों के दिलों-दिमाग पर छा गये सत्याग्रह, अत्याचार के प्रतिकार एवं अहिंसा रूपी हथियार इतनें कारगर साबित हुए कि आज भी समूची दुनिया महात्मा गांधी के इस प्रयोग का लोहा मानती है । देश के आजाद होनें के पश्चात सम्राट अशोक से प्रभावित हमारे तत्कालीन नेतागण भारतीय संविधान में भगवान बुद्ध और भगवान महावीर एवं सम्राट अशोक के अवधारणाओं को मौलिक अधिकारों के रूप में शामिल किया इतना ही नहीं हमारे देश के तत्कालीन नेतागण दो कदम और आगे जाकर अशोक चक्र को राष्ट्रीय चिन्ह एवं अशोक स्तम्भ को राष्ट्रीय मुद्रा चिन्ह के रूप में स्वीकृत किया ।
जानकारों के मुताबिक तमाम देशों के संविधान में भगवान बुद्ध और भगवान महावीर एवं सम्राट अशोक के अवधारणाओं एवं मूल्यों को शामिल किया गया है । इतना ही नहीं हर विषय पर पश्चिमी देशों की तरफ देखने वालों और तमाम मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को शायद ही यह पता हो कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना २४ अक्टूबर १९४५ को हुई थी उसका मूल भगवान बुद्ध और भगवान महावीर एवं सम्राट अशोक की अवधारणाए एवं मूल्य ही है । जब हम मानवीय अधिकारों के अवधारणा के विकास का गहराई से अध्ययन करते है तब हमें मानव अधिकारों के विकास में प्राचीन भारत के राजा रामचंद्र, राजा कृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर एवं सम्राट अशोक से लेकर महात्मा गांधी के योगदान की अद्वितीय गाथा का पता चलता है किन्तु शायद इस बात से अनजान या जानते हुए कि पुरी दुनिया भारतीय महापुरुषों द्वारा निर्मित मानवीय अधिकारों के अवधारणाओं एवं मूल्यों को स्वीकार्य एवं अंगीकृत किया है । भारत सरकार नें संयुक्त राष्ट्रसंघ के दबाव में आकर मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ तो संसद में किसी तरह पास कर दिया किन्तु सरकार मानव अधिकारों की गरिमा को अच्छुण बनाये रखने के प्रति कितनी उदासीन है, दिखाई देता है ।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

मानव अधिकार आयोगों द्वारा किये जा रहे मानव अधिकारों के हनन का कड़वा सच




भारत सरकार नें वर्ष १९९३ में अंतर्राष्ट्रीय एवं संयुक्तराष्ट्र संघ के निर्देशों को ध्यान में रख कर मानव अधिकार सुरक्षा अधिनियम १९९३ पारित किया इस अधिनियम के उद्देश्य कितने मानवीय थे या कितने तकनीकी यह अलग बहस का विषय है । बहरहाल अधिनियम को संसद से पारित करने के पश्चात राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया गया । उस समय भी तमाम वरिष्ठ मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की तरफ से सरकार द्वारा पारित किये गये अधिनियम के नियम व उपनियम तथा आयोगों में नियुक्तियों को लेकर तरह-तरह के सवाल खडे किये गये किन्तु इसके पश्चात भी मानव अधिकार कार्यकताओं को यह लगा कि कम से कम सरकार नें अधिनियम तो पारित किया ! आयोग तो बनाया ! ।
इन आयोगों को मानव अधिकार कार्यकर्ताओं नें मानव अधिकार हनन के शिकायतों के निपटारे के लिए बनाये गये एक फोरम के रूप में देखा और राज्य स्तरीय मानव अधिकार आयोगों के गठन हेतु अपने आंदोलनों को सक्रिय बनाये रखा परिणाम स्वरूप देश के तमाम राज्यों में मानव अधिकार आयोगों का गठन हो गया जिसमें आंध्रप्रदेश, आसाम, हिमांचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, केरल, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, उडीसा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडू, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, गुजरात, एवं बिहार आदि का समावेश है ।
खेद जनक बात यह है कि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग सहित तमाम राज्य मानव अधिकार आयोग विषय पर कार्यरत मानव अधिकार कार्यकर्ताओं, सिविल सोसायटियों, संस्थाओं को समय-समय पर पीड़ित प्रताडित करने से बाज नहीं आते इनका मकसद मानव अधिकार हनन के मामलों पर नजर रखने तथा उसे रोकने के बजाय मानव अधिकार कार्यकर्ताओं, सिविल सोसायटियों, संस्थाओं, को नष्ट करना हो गया है जोकि काफी गंभीर बात है दरअसल जिस दिन इन आयोगों की कमान नौकरशाहों के हाँथ में दी गयी उसी दिन यह तय हो गया कि आने वाले दिनों में ये आयोग ही मानव अधिकार आंदोलनों को कुचलने में अग्रणी भूमिका निभाएंगे इस समय वे स्थितियां बनती नजर आ रहीं है ।
मानव अधिकार आंदोलनों, संगठनों, संस्थाओं, को कुचलने के पीछे सरकारों की मंसा को जानने के लिए हमें यह समझना पडेगा कि इन आंदोलनों से सरकारों एवं सत्ताधारियों के किन हितों पर चोट पहुँचती है ! मसलन सरकारों एवं उसमें बैठे नौकरशाहों की जनविरोधी नीतियों का विरोध एवं उसका खुलासा करने, भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने, नौकरशाहों के मनमानियों को रोकने का प्रयत्न करने, हिरासत में मौतों, फर्जी मुठभेडों, एवं पुलिस के अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने, जैसे मामले शामिल है इतना ही नही मानव अधिकार संगठनों की आयोगों के क्रिया कलापों के सम्बन्ध में उंगली उठाने से भी आयोगों में बैठाये गये नौकरशाह एवं पुलिस अधिकारी चिढ़ कर मानव अधिकार आंदोलनों को कुचलने की साजिशें रच रहें है ।
अब जरूरत इस बात की है कि मानव अधिकार एवं तमाम जनआंदोलनों से जुड़े हुए कार्यकर्ता एक मंच पर आयें और मानव अधिकार आयोगों एवं सरकारों द्वारा संगठनों एवं संस्थाओं को कुचलने के कुचक्र का कड़ाई से मुकाबला करें । क्योंकि इन निरंकुश पुलिस अधिकारियों एवं नौकरशाहों को अंकुश संतुलन की परिधि में बनाये रखने की जिम्मेदारी अंततः मानव अधिकार कार्यकर्ताओं पर ही है ।

सोमवार, 31 अगस्त 2009

जरूरी है भोजन के अधिकारों (राइट टू फ़ूड) को कानूनी संरक्षण

डा. मनमोहन सिंह नें शनिवार को पत्रकारों को संबोधित करते हुए बताया कि जन वितरण प्रणाली के लिए देश के पास पर्याप्त खाद्यान भंडार है देश में कोई भूखा पेट न रहे इसकी जिम्मेदारी मौजूदा सरकार के माध्यम से अपने ऊपर ली । सूखे के चलते देश के ऊपर मंडरा रहे अकाल और भूखमरी के खतरे और अपने पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को ध्यान में रख कर उन्होंने यह बयान दिया । भूखमरी और कुपोषण गरीबी और अभाव देश के लगभग ३५ करोड़ लोगों को प्रभावित किये हुए है ऐसा नहीं कि हमारे प्रधानमंत्री को इस विषय की जानकारी नहीं है उपरोक्त ३५ करोड़ लोग जोकि भूखमरी और कुपोषण के लिए अभिशप्त है अभी तक इनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही क्यों नहीं तय की गयी । पहले से मौजूद इन आंकडों पर जब हम नजर डालते है कि भारत के करीब २० करोड़ लोग रात को खाली पेट सोने को मजबूर है (संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट) क्या प्रधानमंत्री महोदय नें इनके भोजन की व्यवस्था कर दी है ?
पिछले दिनों राष्ट्रपति ने यह घोषणा की कि भोजन का अधिकार कानून बनाना नयी सरकार की शीर्ष प्राथमिकता है इसके तत्काल बाद खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्रालय ने एक प्रस्ताव जारी किया जिसमें इस प्रस्तावित कानून के तहत सरकार की भूमिका महीने में सिर्फ़ २५ किलोग्राम चावल और गेहं तीन रुपये प्रति किलो की दर से आपूर्ति करने तक सीमित रखने की कोशिश की गयी । वह भी आबादी के एक छोटे से तबके के लिए जिन्हें सरकार गरीब मानती हो दबी जुबान यहां तक कहा गया कि इससे सरकारी खजाने पर काफ़ी बोझ पड़ेगा लेकिन इसके कुछ समय पहले यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने पत्र में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इस संदर्भ में शीघ्र कार्रवाई करने का आग्रह किया था जो कहीं ज्यादा व्यापक तरीके से भूखे लोगों को समुचित भोजन का भरोसा दिलाये उन्होंने कहा था कि इसके मसौदे में ऐसे लोगों का खास तौर पर ध्यान रखा जाये जो गंभीर रूप से भोजन के अभाव से ग्रस्त हैं जैसे कि अकेली महिला, अपंग या वृद्ध व्यक्ति, सड़कों पर पलनेवाले बच्चे, बंधुआ मजदूर, खेतिहर मजदूर और कचरा बीननेवाले लोगों समेत शहरी बेघर लोग ।
उनकी इस पहल पर ब्राजील के राष्ट्रपति लुला द सिल्वा के शब्दों की झलक थी जब उनके देश ने इसी तरह से एक खाद्य गारंटी योजना हंगर जीरो लांच की थी। लुला ने विश्वास जताते हए कहा था- हम अपने देश के लोगों के लिए यह संभव कर देंगे कि उन्हें रोज तीन वक्त खाने को मिले जिसके लिए किसी को हाथ न फ़ैलाना पड़े ब्राजील इस तरह की विषमता के साथ और आगे नहीं जा सकता हमें भूख, गरीबी और सामाजिक विषमता पर काबू पाना होगा । हमारी जंग किसी को मारने के लिए नहीं है यह जिंदगी बचाने के लिए है । ब्राजील की खाद्य सुरक्षा नीति का उपशीर्षक भी उतना ही जबरदस्त है -ऐसे ब्राजीली नागरिक, जिन्हें भोजन नसीब होता है वे उनकी मदद करें जिनके पास भोजन नहीं है । यदि भारत को फ़िर से इतिहास लिखना है तो उसे ऐसी नैतिक और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के आधार पर ही भोजन का अधिकार कानून बनाना होगा ।
सवाल सिर्फ पेट भरने का ही नहीं है, सवाल समुचित पोषक तत्वों के शरीर में पहुंचने का भी है, ताकि शरीर इतना स्वस्थ बने कि व्यक्ति रोटी कमाने के लायक बन सके। अपेक्षित क़ानून में इस बात की गारंटी होनी चाहिये कि न केवल सबको पर्याप्त भोजन मिलेगा, बल्कि सबको पर्याप्त भोजन अर्जित करने का अवसर भी उपलब्ध कराया जायेगा। इस दृष्टि से देखें तो यह अधिकार व्यापक सन्दर्भों वाला बन जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ बरसों से भूख की समस्या से जूझने का संकल्प दुहराता रहा है और इसे मूल मानवीय अधिकारों का हिस्सा बताता रहा है। आज भी भूख एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा है लेकिन इतना कह देने से बात बनती नहीं। हर देश को अपने स्तर पर इस समस्या से जूझना है। कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में इस आशय की बात कही थी।
देश में कुपोषण और भुखमरी की भयावह स्थिति तथा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में भ्रष्टाचार एवं लापरवाही को देखते हुए २००१ में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पी.यू.सी.एल.), राजस्थान ने भोजन के अधिकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित चायिका दायर की। यह याचिका उस समय दायर की गई, जब एक ओर देश के सरकारी गोदामों में अनाज का भरपूर भंडार था, वहीं दूसरी ओर देश के विभिन्न हिस्सों में सूखे की स्थिति एवं भूख से मौत के मामले सामने आ रहे थे। इस केस को भोजन के अधिकार केस के नाम से जाना जाता है। भोजन के अधिकार को न्यायिक अधिकार बनाने के लिए विभिन्न संस्थाएं, संगठन लगातार संघर्ष कर रही है। पी.यू.सी.एल. द्वारा दायर की गयी इस याचिका का आधार संविधान का अनुच्छेद २१ है जो व्यक्ति को जीने का अधिकार देता है। जीने का अर्थ गरिमापूर्ण जीवन से है और यह भूख और कुपोषण से जूझ रहे व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। यह एक मौलिक अधिकार है। सरकार का दायित्व है इसकी रक्षा करना। सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार जीने के अधिकार को परिभाषित किया है, इसमें इज्जत से जीवन जीने का अधिकार और रोटी के अधिकार आदि शामिल हैं।
जब हम जीने के अधिकार की बात करते हैं, तो प्रकारांतर से वैयक्तिक और सामाजिक सुरक्षा को ही रेखांकित करते हैं। भोजन का अधिकार देने का मतलब सबको सस्ती दरों पर कुछ अनाज मुहैया करा देना ही नहीं, इसका अर्थ बेहतर जिंदगी की गारंटी देना है। सब स्वस्थ हों, शिक्षित हों, जीविका उपार्जन में समर्थ हों, इसके लिए उन स्थितियों का निर्माण ज़रूरी है, जिनमें यह सब संभव हो सकता है। भोजन का अधिकार देना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम होगा। ऐसे क़दम की सार्थकता ब्राजील प्रमाणित कर चुका है। अब देखना यह है कि हमारी सरकार चला रहे नेतागण अपने चुनावी घोषणापत्र में किये गये (राइट टू फ़ूड) भोजन के अधिकार विषय पर वायदे का विधेयक लाने और उसे लोकसभा में पास कराने जैसी नैतिक जिम्मेदारी कितनी जल्दी पूरा करते है ।

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

अदालतों में लंबित मामलों से हो रहा है मानव अधिकारों का हनन

पिछले दिनों प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह नई दिल्ली में राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के एक संयुक्त सम्मेलन संबोधित करते हुए बताया कि कानून और न्याय मंत्रालय न्यायिक सुधारों के बारे में एक रूप रेखा तैयार कर रहा है उन्होंने न्यायपालिका से ३००० खाली पदों को तत्काल भरने को कहा उन्होंने बताया कि भारत दुनिया का ऐसा देश है जहां सबसे अधिक संख्या में मामलों पर निर्णय होना बाकी है। उन्होंने कहा कि अधीनस्थ न्यायालयों में बीस से पच्चीस फीसदी तक न्यायिक पद खाली पड़े हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की क्षमता का विकास करने के लिए राज्यों की न्यायिक अकादमियों को सुदृढ़ करने की जरूरत है।बहुत जल्द नई दिल्ली में न्यायवादियों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ बातचीत की जाएगी। इससे एक सीमा और पुनर्गठन तैयार हो जाएगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने न्यायिक अधिकारियों की बहुत अधिक कमी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इसकी वजह से विचाराधीन मामलों की बढ़ती हुए संख्या से निपटने के प्रयासों में बाधा पहुंच रही है। उन्होंने यह भी कहा कि ढ़ांचागत अड़चनों के कारण कानून के प्रतिभाशाली स्नातक न्यायिक सेवाओं में शामिल नहीं हो पाते और अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक अधिकारियों के सत्रह प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हैं। इस सम्मेलन का लब्बोलुआब यह रहा कि प्रधानमंत्री नें न्यायपालिका को रिक्त न्यायिक पदों को भरने को कह कर गेंद न्यायपालिका के पाले में डाल दिया तो भारत के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने ढ़ांचागत अड़चनों का हवाला देते हुए गेंद को पुनः सरकार की तरफ उछाल दिया ।
यह बात भारत सरकार के मुखिया डा. मनमोहन और न्यायपालिका के शीर्ष पुरुष के जी बालाकृष्णन दोनों को पता है कि भारत की अदालतों में लंबित मामलों नें उसकी न्यायिक प्रक्रिया के सही इस्तेमाल को लेकर सवालिया निशान खड़े किए हैं ? देश का एक प्रबुद्ध नागरिक तब अपना माथा ठोक लेता है जब उसे पता चलता है कि भारतीय अदालतों में न्याय की आस लिए करोडों मामले अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे है । गौरतलब है कि देश भर के उच्च न्यायालयों में ३१ दिसंबर २००८ तक ३९,१४,६६९ मामले लंबित थे। जबकि ३१ मार्च २००९ तक उच्चतम न्यायालय में ५०१६३ मामले लंबित थे। देश भर की निचली अदालतों में वर्ष २००८ के अंत तक लंबित मामलों की संख्या २,६४,०९०११ थी जिसमें १,८८,६९,१६३ मामले क्रिमिनल, और ७५,३९,८४८ मामले सिविल से संबंधित हैं।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने देश की अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित मुकदमों के विषय पर चिंता जाहिर करते हुए जल्द निस्तारण के लिए कानूनों में बदलाव की वकालत की है। महाराष्ट्र न्यायिक अकादमी के उद्घाटन समारोह के मौके पर राष्ट्रपति ने यहां कहा कि न्यायालयों के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या लंबित मुकदमों की है। मुकदमों पर निर्णय आने में काफी वक्त लगता है, तब तक मुकदमे से जुडे लोग सामान्य जीवन नहीं जी पाते। उन्होंने कहा, 'ऐसे लोगों की समस्या का समाधान खोजने की जरूरत है, जो लंबे समय से न्याय पाने का इंतजार कर रहे हैं।
पॉँच वर्ष, दस वर्ष या पंद्रह वर्ष तक एक मुकद्दमें का जारी रहना तो आम बात है कई कई मामले के निपटारे में तो ३५ से ४० वर्ष तक लग जाते है इसलिए भारत की कुछ जेलों में यह हाल है कि वहां तिल धरने की जगह नहीं है मध्य-प्रदेश के कुछ कारावासों में तो बंदी बारी बारी सोते हैं, यानि सबके लेटने तक की जगह नहीं है लंबित मुकद्दमों की अंतिम सुनवाई एवं न्याय की आस लिए मर रहे एवं मानसिक संतुलन खो रहे लोगो की जवाबदेही किस पर है ? सरकार और न्यायपालिका दोनों की तरफ से जजों की कमी का रोना रोया जाता है । मुकद्दमें के निपटारे के देरी के लिए चाहे सरकार जिम्मेदार हो या न्यायपालिका किन्तु यह आम आदमी के ही "मानव अधिकारों का हनन" है ।

शनिवार, 22 अगस्त 2009

फर्जी एनकाउंटर मामले में १४ पुलिसवालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज

मुम्बई : सन् २००६ के विवादास्पद एन्काउंटर मामले में गुरुवार को १७ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। इनमे १४ पुलिस वाले हैं। इन सबके खिलाफ आईपीसी की धारा ३०२, ३६४ और ३४ के तहत वसोर्वा पुलिस में मामला दर्ज किया गया है।
जिन पुलिस वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई, उनमें एमआईडीसी के सीनियर इंस्पेक्टर प्रदीप सूर्यवंशी, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा, अरविंद सरवडकर, नितिन सरतपे, अंकुश पलांडे, गणेश हरगुडे आदि का नाम प्रमुख है।
एफआईआर दर्ज पुलिस वालों में पांच पीआई, एक एपीआई और दो पीएसआई हैं। इसके अलावा एक हेड कांस्टेबल, एक पुलिस नाईक और पांच कांस्टेबल भी हैं। पुलिस विभाग से अलहदा भी तीन पुलिस वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।
यहां बताना जरूरी है कि बंबई उच्च न्यायालय ने कथित फर्जी मुठभेड़ में छोटा राजन गिरोह के एक संदिग्ध सदस्य की मौत के मामले की प्राथमिकी दर्ज कराने तथा मामले की जांच पुलिस उपायुक्त के तहत एक विशेष जांच दल से कराने का निर्देश गुरुवार को पुलिस को दिया था।।
जस्टिस बी. एच. मारलापल्ली और रौशन दलवी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने तब कहा था कि पुलिस उपायुक्त के एम एम प्रसन्ना की अध्यक्षता वाला विशेष जांच दल (एसआईटी) जांच करेगी और चार हफ्ते के भीतर अदालत को रिपोर्ट देगी।
छोटा राजन गिरोह का कथित सदस्य रामनारायण नवंबर २००६ में डी एन नगर पुलिस स्टेशन के अधिकारियों के हाथों मारा गया था। उसके भाई एडवोकेट रामप्रसाद गुप्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि रामनारायण को पुलिस ११ नवंबर को घर से उठा ले गई और फर्जी मुठभेड़ में उसे मार डाला गया।
हाई कोर्ट ने पहले एक मैजिस्ट्रेट से जांच कराने का आदेश दिया था जिसने बताया कि रामनारायण की मौत हिरासत में हुई। यह निष्कर्ष पुलिस के इस दावे के विपरीत था कि पुलिस के साथ मुठभेड़ में वह मारा गया। खंडपीठ ने आदेश दिया था कि रामप्रसाद गुप्ता का बयान रिकार्ड किया जाए और उसे प्राथमिकी के रूप में लिया जाए।

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

वयस्कों द्वारा बनाये गये स्वैच्छिक समलैंगिक सम्बन्ध अब संवैधानिक मूल अधिकार

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा आज २ जुलाई, २००९ को दिए गए ऐतिहासिक निर्णय द्वारा भारत में वयस्कों के बीच स्वैच्छिक समलैंगिक सम्बन्धों को संवैधानिक मूल अधिकारों के अंतर्गत मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७ को इस हद तक शून्य घोषित कर दिया है। अब सहमति से वयस्क समलैंगिकों के बीच संबंध को इस धारा के अंतर्गत दण्डनीय नहीं माना जाएगा।
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय कुल १०५ पृष्ठों, १३५ चरणों और २६३९७ शब्दों का है। इस संपूर्ण निर्णय को किसी ब्लाग की एक पोस्ट पर प्रकाशित कर पाना संभव नहीं है। लेकिन इस निर्णय के चरण संख्या १२९ से १३२ में निर्णय का निष्कर्ष है। यदि आप चाहें तो यह निष्कर्ष तीसरा खंबा के सहयोगी अंग्रेजी ब्लाग LEGALLIB पर जा कर इसे यहाँ पढ़ सकते हैं।