गुरुवार, 12 जून 2008

धारा ३७७ और मानव अधिकारों का उल्लंघन

दिल्ली उच्च न्यायालय में वयस्कों के बीच सहमति से बनाये गए यौन संवंध को गैर-आपराधिक घोषित करने के लिए नांज फाउंडेशन इंडिया द्वारा दायर याचिका के जबाव में भारत सरकार नें कहा है कि धारा ३७७ भारतीय दंड संहिता को बदला नहीं जा सकता, क्योकि अधिकतर भारतीय समाज समलैंगिकता को अनुचित समझता है । इस स्पष्टीकरण में सरकार यह पहचानने में असफल रही कि बहुसंख्यक जनता की लोकप्रिय भावना जिसका वो दावा करती है का लिहाज किए बिना इस देश के कानून का काम है कि सभी नागरिकों के मानव अधिकारों को सुरक्षित रखना व उन्हें बल देना बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के तौर से बात करना वैसे ही कठिन है खासकर यह ध्यान में रखते हुए कि 'अप्राकृतिक' समझी जाने वाली यौन क्रियाओं में मुख व गुदा मैथुन शामिल है, चाहे ये क्रियाएँ पुरूष-पुरूष, महिला-महिला या महिला पुरूष के बीच ही क्यो न हो रही हो ।
ऐसे मामलों में भी जहाँ राज्य स्वयं प्रत्यक्ष रूप से उत्पीडन नहीं करता, धारा ३७७ कानून का विद्यमान होना ही संविधान के तीसरे भाग द्वारा सुनिश्चित बहुत से मौलिक अधिकारों का अनादर करता है । इसमें शामिल है -जीवन तथा स्वतंत्रता का अधिकार जैसा कि अनुच्छेद २१ में दिया गया है ( इसके अंतर्गत स्वास्थ्य तथा एकांतता का अधिकार भी आता है ) अनुच्छेद १४ के तहत दिया गया समानता का अधिकार और अनुच्छेद १९ के अंतर्गत बोलने, आने-जाने, इकट्ठा होने, व्यवसाय या व्यापर करने तथा रहने का अधिकार शामिल है । जैसा कि इस पूरे दस्तावेज में साक्ष्यों से पता चलता है - जबरदस्ती ठीक करने के लिए अपनाई गई चिकित्सा, नौकरी या घर छीन जाने अथवा स्वतंत्र रूप से बोलने या इकट्ठा होने की असमर्थता की कहानियों के माध्यम से-धारा ३७७ एक ऐसा कानून है जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है । जैसा कि संविधान में कहा गया है ऐसे कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर देना चाहिए ।
धारा ३७७ अन्याय की संस्कृति बनाये रखने में भी योगदान देती है । भेद-भावपूर्ण सामाजिक मनोवृत्तियों को 'कानूनी' करार देकर यह धारा उन सामाजिक नजरिये को मजबूत बनाती है जो चुपचाप, चतुराई से हम सबकों अपनी लपेट में लेती है, धारा ३७७ जिन मूल्यों को बढावा देती है, वे यौनिकता के इर्दगिर्द शर्म, गोपनीयता और अपराधबोध पैदा करना चाहते है ये वे हथियार है जो पित्रसत्ता के लिए बहुत फायदेमंद साबित हुए है क्योकि इनके द्वारा यह सुनिश्चित हुआ है कि महिलाये अपना चुनाव न कर सकें । धारा ३७७ नागरिकों को उन अधिकारों, जिन्हें सकारात्मक रूप से यौनिक अधिकारों के रूप में परिभाषित किया जाता है, का प्रयोग करने की स्वीकृति नहीं देती । किस तरह की यौनिकता को हम 'सहज' 'साधारण' और 'मान्य' मानेगें -यह तय करने के मापदंड गढ़ती है धारा ३७७ लेकिन जहाँ यह कानून सभी यौनिकताओं के लिए मापदंडों का निर्माण करने में सफल रहा है, वही इसने समलैंगिक इच्छा रखने वाले लोगों व समुदायों के लिए खास तरह की परेशानिया खड़ी की है ।
यौनिक अल्पसंख्यकों के मानव अधिकारों का उल्लंघन कैसे किया जाता है, यह देखने के लिए हमे यह जानना जरूरी है कि राज्य के साथ-साथ उल्लंघन करने वालों में शामिल है कई तरह के गैर राजकीय दावेदार जैसे परिवार, मीडिया और चिकित्सक । राज्य द्वारा किए जाने वाले भेदभाव और सामाजिक भेदभाव में स्पष्ट रूप से ऐसा संबंध है जो एक दुसरे के द्वारा किए गए भेदभाव को बढावा देता है । उचित सचेतना ( Due diligence ) का सिद्धांत भारत सरकार द्वारा केवल कथनी में दिखता है, करनी में नहीं । यह मांग करता है कि राज्य गैर-राजकीय दावेदारों के द्वारा किए जा रहे उल्लंघनों की रोकथाम करें, उनकी जांच करें, मुकदमा चलाए और क्षतिपूर्ति करें । लेकिन वास्तविकता यह है कि निजी तौर पर नागरिकों द्वारा किए जाने वाले उल्लंघनों में राज्य की भी भागीदारी रहती है । समलैगिक इच्छा रखने वाले लोगों व समुदायों को मानव अधिकार उल्लंघन से सुरक्षा प्रदान करने में राज्य की अनिच्छा साफ नजर आती है धारा ३७७ जैसे कानून इस गैर-कानूनी और अन्यायपूर्ण व्यवस्था को केवल एक औपचारिक रूप देते है ।
जो विषमलैगिक ढांचे के अनुसार नहीं चलते, उनकी स्थिति का काफी दस्तावेजीकरण हो रहा है, बहुत सी रिपोर्टें, जिसमें पीपल्स यूनियन आफ सिविल लिबर्टीज़, कर्नाटक ( पी यू सी एल के ) द्वारा प्रकाशित रिपोर्टें भी शामिल है यह दिखाती है कि गे, लेस्बियन, हिजडा, ट्रांसजैन्डर्ड और बाईसेक्स्युअल लोगों की मानव प्रतिष्ठा का बार-बार किस प्रकार उल्लंघन किया जाता है । उल्लंघनों का क्षेत्र बहुत ब्यापक है- पुलिसवालों द्वारा हिजडों के बार-बार बलात्कार से लेकर एक समलैगिक छात्र की व्यथा तक जिसके माता-पिता नें उसे बेघर कर दिया और उस व्यक्ति की यंत्रणा तक जिसे समलैंगिकता का 'इलाज' करने के लिए दर्दनाक चिकित्सा पद्धति से गुजरने के लिए मजबूर किया जाता है । पुलिस द्वारा समलैंगिक पुरुषों को लगातार तंग किया जाना और बडी संख्या में उन दोनों महिलाओं द्वारा आत्महत्या जो अपना जीवन साथ-साथ गुजारना चाहती थी - ऐसे किस्से डर, उत्पीडन और हिंसा की एक दुःख भरी तस्वीर पेश करते है । भारत में यौनिक अल्पसंख्यक इसी माहौल में अपना जीवन व्यतीत करते है ।
जिन विशेष उल्लंघनों का सामना गे, लेस्बियन, हिजडा, ट्रांसजैन्डर्ड और बाईसेक्स्युअल लोग करते है, उन्हें मुद्दे के रूप में उठाने की आवश्यकता को अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार समुदाय के अधिवक्ताओं नें पहचाना है । इस महसूस की गई जरूरत को प्रतिज्ञापत्रों और घोषणाओं द्वारा समर्थन मिला है । सन १९९१ में एमनेस्टी इन्टरनेशनल नें उन लोगों के अधिकारों की सहायता के लिए एक नीति बनाई, जिन्हें (एकांत में ) समलैगिक क्रियाओं में भाग लेने के कारण कैद में डाला गया था । 'टूटन बनाम तिस्मानिया राज्य' के मामले में निर्णय के बाद यौनिक अल्पसंख्यक अधिकारों के बारे में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिंताओं नें जोर पकड़ा इस निर्णय के मुताबिक तिस्मानिया का वह कानून जो गुदा मैथुन को गैर-कानूनी ठहरता है, ( काफी हद तक भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७ के समान ) तिस्मानिया द्वारा हस्ताक्षरित अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार समझौते के अंतर्गत समान सुरक्षा और एकांत से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन करता है । दक्षिण अफ्रीका में भी हाल ही में संवैधानिक न्यायालय नें गुदा मैथुन विरोधी कानून को असंवैधानिक घोषित किया है क्योकि यह समलैगिक लोगों की गरिमा और एकांत से जुड़े अधिकारों का उल्लंघन करता है । अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तनों में दक्षिण अफ्रीकी संविधान का एक संशोधन शामिल है जो यौनिक अभिरूचि के आधार पर भेद-भाव पर रोक लगता है । इसके अलावा यूरोपियन यूनियन की शर्त भी है जिसके तहत यूरोपियन यूनियन के सभी सदस्य हर उस कानून को हटाए जो गे, लेस्बियन, और बाईसेक्स्युअल लोगों के खिलाफ भेद-भाव करता है ।
नागरिक समाज की ओर नजर घुमाये तो अपने आप को उदार व अति प्रगतिशील कहने वाले लोगों में भी यौनिकता को एक तुच्छ, हल्का या बुर्जुआ मुद्दा कहकर उसपर ध्यान नहीं दिया जाता । ऐसी परिस्थिति में समलैगिकता को कुल मिलाकर इस तरह देखा जाता है जैसे वह कुछ 'असामान्य' हो । ज्यादा से ज्यादा उसे एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दे के रूप में देखा जाता है, मानव अधिकार के रूप में नहीं । सामान्य यौनिक अन्तर पर आधारित उत्पीडन के मुकाबले गरीबी, वर्ग और जाति से जुड़े उत्पीडन के मुद्दे को अधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है । लेकिन यह इस सत्य को अनदेखा कर देता है कि यौनिक का सभी सामाजिक उत्पीड़नों (जैसे कि पित्रसत्ता, पूजीवाद, जातिप्रथा और धार्मिक उन्माद या कट्टरता ) से गहरा जुडाव है । विडंबना यह है कि सभी अधिकार मूल-रूप से एक दुसरे से जुड़े हुए है और उन्हें अलग-थलग नहीं किया जा सकता- इन सिद्धांतों का समर्थन करने वाले मानव अधिकार कार्यकर्ता यौनिक अधिकारों को अलग से अल्पसंख्यक अधिकारों का दर्जा देकर छोटा बना देते है । हमें यह पहचानने में गलती नहीं करनी चाहिए कि यौनिक अधिकारों की मांग कोई अलग मांग नहीं है -और वास्तव में यह आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक न्याय के व्यापक मानव अधिकार संघर्ष का एक अटूट हिस्सा है ।
धारा ३७७ मानव अधिकारों के अंतर्राष्ट्रीय घोषणापत्र का भी उल्लंघन करता है :
* मानव अधिकारों का विश्वव्यापी घोषणा :- ' कोई भी व्यक्ति यंत्रणा या क्रूर अमानवीय, अपमानजनक व्यवहार या फ़िर दंड का विषय नहीं होना चाहिए ( अनुच्छेद ५)
* संयुक्त राष्ट्र की मानव अधिकार समिति :- नें एक मामले में नोट किया कि आई सी सी पी आर ( इन्टरनेशनल काविनेन्ट आन सिविल एंड पोलिटिकल राइट्स - नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय शपथपत्र ) की गैर भेद-भाव वाली धारा में किए गए यौन के उल्लेख में 'यौनिक अभिरूचि' को भी शामिल किया जाना चाहिए ।
* संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार आयोग ने :- सब राज्यों से अपील की है कि वे न केवल समलैगिकता को आपराधिक मानने वाले कानूनों को रद्द करें, वल्कि अपने संविधानों या अन्य मौलिक कानूनों में यौनिक अभिरूचि पर आधारित भेद-भाव के निषेध को प्रतिष्ठापित करें ।
* बीजिंग पी ऍफ़ ए :- महिलाओं के मानव अधिकारों में उनकी यौनिकता से संवंधी बातो में जिम्मेदारी व स्वतंत्रता से निर्णय लेने और नियंत्रण का अधिकार शामिल है । इसमे बिना जबरदस्ती, बिना भेद-भाव और बिना हिंसा के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य भी शामिल है ।

शुक्रवार, 6 जून 2008

संभाव्य एवं सुदृढ़ विकास बनाम पर्यावरण एक संतुलित अवधारणा

विकास बनाम पर्यावरण की संतुलित अवधारणा या पर्यावरण बनाम विकास की परंपरागत अवधारणा परस्पर विरोधाभाषी है । पहले तात्पर्य यह था कि या तो पर्यावरण अथवा विकास । किंतु आधुनिक समय में उपरोक्त अवधारणा सुसंगत नहीं है इस दुविधात्मक परिस्थिति का हल है "संभाव्य सुदृढ़ विकास" जो पर्यावरण के संवंध में सकारात्मक है "संभाव्य सुदृढ़ विकास" के अंतर्गत ही संपूर्णतया निर्धारित किया जा सकता है कि आथिक ढांचे के सभी विभागों के विकास के लिए क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए, कब करना चाहिए, और क्यों करना चाहिए जो उचित और आवश्यक है ।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर "संभाव्य सुदृढ़ विकास" की व्याख्या का सर्वप्रथम उद्भव १९७२ में स्टोक होल्म उदघोषणा में हुआ था इसके पश्चात वर्ष १९८७ में विश्व पर्यावरण और विकास आयोग ( World Commission on Environment and Development) ने अपने रिपोर्ट में "संभाव्य सुदृढ़ विकास" की व्याख्या को प्रमाणित स्वरूप दिया था । तत्पश्चात विश्व पर्यावरण और विकास आयोग को समर्थन देते हुए, "सर्वमान्य और सर्वसामान्य भविष्य" नामक अपने रिपोर्ट में प्रकृति के लिए विश्व निधी ( World Wide Fund for Nature ) नें भी पृथ्वी के लिए देख-भाल ( Caring for the Eardh ) साथ में "संभाव्य सुदृढ़ विकास" ( Sustainable Development ) की अवधारणा को पुष्ट किया ।
जून १९९२ में, रियो-डी-जेनेरो में आयोजित पृथ्वी शिखर समिती नें " संभाव्य सुदृढ़ विकास" पर मोहर लगायी । साथ में समिती नें हस्ताक्षर द्वारा प्रस्ताओं को प्रमाणित करते हुए दो मुख्य लक्ष्य हासिल किए ।
(१) समिती नें जीवसृष्टि की विविधता का विस्तृत रिपोर्ट पेश किया । साथ ही
(२) वातावरण एवं पर्यावरण परिवर्तन पर अपने सघन विचार प्रकट किए ।
तत्पश्चात इन दस्तावेजों पर १५३ राष्ट्रों नें अपने हस्ताक्षर किए । साथ में समिती के प्रतिनिधि मंडल नें तीन महालेख भी सर्वानुमति से प्रकाशित किए (१) वन्य सिद्धांतों का विवरण (२) पर्यावरण नीति एवं विकास की भूमिका संवंधी सिद्धांतों की उदघोषणा (३) एजेंडा २१ इक्कीसवी सदी में पर्यावरण के हेतु क्या करना चाहिए उसके लिए रचनात्मक सूचनाये एवं निर्देश ।
" संभाव्य सुदृढ़ विकास" की व्याख्या का प्रारम्भ १९७२ में स्टोक-होल्म में हुआ था और इस विचारधारा नें अपना वास्तविक स्वरूप १९९२ में रियो-डी-जेनेरो में प्राप्त किया । मौजूदा समय में हम जानते है कि "संभाव्य सुदृढ़ विकास" के अंतर्गत पर्यावरण और विकास की परस्पर मर्यादा निभाते हुए मानव जीवन के सर्वांगीण विकास हेतु, अज्ञान के कारण पैदा हुई गरीबी का निर्मूलन कैसे किया जाय । और समस्त विश्व के राष्ट्र इस व्याख्या के अंतर्गत अपना विकास करने हेतु निरंतर प्रयासरत है ।
"संभाव्य सुदृढ़ विकास" के माने स्पष्ट है कि (१) पर्यावरण के संतुलन ही "संभाव्य सुदृढ़ विकास" की बुनियाद है । (२) इसलिए विकास के नाम पर पर्यावरण और जीवसृष्टि की प्राथमिक या अंधाधुंध अवहेलना नहीं की जायेगी (३) पर्यावरण का संतुलन या विकास का आयोजन एक ही सिक्के के दो पहलू है । (४) पर्यावरण बनाम विकास या विकास बनाम पर्यावरण, दोनों ही "संभाव्य सुदृढ़ विकास" के परिपक्व अन्वेषण से परस्पर सहायक और पूरक है ।

गुरुवार, 5 जून 2008

पर्यावरण दिवस पर पर्यावरणीय चिंता

प्रकृति और मानव का संवंध चिरकालिक और शाश्वत है । प्रकृति ईश्वर का रूप है जिसे हम देख भी सकते है । प्रकृति की गोंद में खेलते हुए मानव नें उन्नति की है सभ्यता के प्रारम्भ में मानव प्रकृति के बहुत निकट था परन्तु जैसे-जैसे पृथ्वी महाद्वीपों, देशों, और शहरों में विभक्त होने लगी और कंक्रीट के जंगल खड़े होने लगे, धीरे-धीरे मानव प्रकृति से दूर होता गया और उसने प्रकृति की उपेक्षा करनी शुरू कर दी है । हमारे पूर्वज पंचमहाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, और वायु के महत्व को जानते थे क्योकि प्राणीमात्र की संरचना में यही उपदान के कारण है । वैदिक काल से ही प्रकृति को उच्च भाव से देखा गया है प्रकृति व मानव अन्योंन्याश्रित है इसीलिए प्राणिमात्र वन, उपवन, हरे-भरे वृक्षों, लताओं और वनस्पतियों, झरनों व नदियों में कल-कल बहते शुद्ध जल का लाभ उठाता है । किंतु आज यह सारा पर्यावरण दूषित हो गया है और पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय हो गया है । हमारी लापरवाही के कारण मानो प्रकृति हमसे क्षुब्ध हो गई है और बाढ़, सूखा, भूकंप, भूस्खलन, आदि अनेक प्राकृतिक आपदाओं के रूप में अपना रोष प्रकट कर रही है । इसी वजह से मानव घबराया हुआ है और दिन ब दिन पर्यावरण के प्रति सचेत होता जा रहा है । आज इस् दिशा में अनेक नियम और कानून बनाये जा रहे है । और सरकारें करोडों अरबों रूपया खर्च करके पर्यावरण को प्रदूषण से बचाना चाहती है पर कुछ लोगों के व्यावसायिक स्वार्थ इस दिशा में अवरोध बनकर खड़े है ।
प्रकृति मानव तथा पर्यावरण सृष्टि रूपी त्रिभुज के त्रिकोण है प्रदुषण कई प्रकार से प्रकट होता है जैसे जल, वायु, मृदा, ध्वनि, व रेडियोधर्मी प्रदुषण । जनसंख्या विस्फोट से भी प्रदुषण होता है मानव द्वारा फैलाये जा रहे प्रदुषण से आज प्रकृति की आत्मा कराह उठी है । वृक्षों की अनवरत कटान, भूमि का तेजी से क्षरण, औद्योगीकरण, पश्चिमी जीवन शैली से उपजा प्रदुषण, वनस्पतियों तथा अपार वन संपदा का ह्रास, जीव जंतुओं का विलुप्तिकरण, नदी व भूक्षरण, परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न जल, वायु तथा भूमि में प्रदुषण, पालीथीन का प्रचुर मात्रा में बढ़ता उपयोग, शहरों में बढ़ता कूडा-करकट, अस्पतालों से निकला कचरा, नदियों में कूडा-करकट फेकने से उपजा जल प्रदुषण, शहरों में बढ़ता ध्वनि प्रदुषण, पेट्रोल-डीजल के जलने से उपजा वायु प्रदुषण, ओजोन की परत में क्षरण, ग्लोबल वार्मिंग तथा न्युक्लियर फाल आउट आदि के गंभीर परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ी को भुगतना पडेगा ।
आत्म-संयम और विवेक, प्रकृति प्रेम व उसके प्रति सहभागिता का भाव हमारे लिए सच्चे समाधान जुटा सकता है भौतिकवादी जीवन को मूर्तरूप देने की ललक में मानव प्रकृति व पर्यावरण का क्रूरता पूर्वक शोषण कर रहा है । अनियंत्रित औद्योगीकरण आज पर्यावरण प्रदूषण का मुख्य कारण है । यद्यपि सरकार नें पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बनाया हुआ है जिससे अनापत्ति प्रमाण-पत्र लिए बिना किसी उद्योग को चलाने की अनुमति नही दी जाती यह बोर्ड जांच करता है कि कारखाने से निकलने वाले रासायनिक धुआं, कचरा आदि के निस्तारण की इस प्रकार व्यवस्था हो कि प्रदूषण न फैले । किंतु पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण संवंधी विभागों में फैले भरी मात्रा में भ्रष्टाचार ने उद्योगपतियों को प्रदूषण फैलाने की अबाध एवं खुली छुट दे रखी है । इनके कारखानों से निकला विषाक्त कचरा व रसायन पास के नदी-नाले अथवा समुद्र के पानी को लगातार एवं भयावह रूप से प्रदूषित कर रहे है परिणाम स्वरूप जल में पाई जाने वाली मछलियाँ व जीव-जंतु लुप्त होने लगे है जो लोग इस प्रदूषित पानी का उपयोग करते है रोगग्रस्त हो जाते है । आलम यह है कि ऐसे प्रदूषित पानी की मछलियों के खाने से भी बीमारियाँ फ़ैल रही है कोलकाता की एक रिपोर्ट के अनुसार वहां के पानी में आर्सेनिक की मात्रा पाई गई है जिसके लम्बे समय तक प्रयोग से कैंसर जैसी घातक बीमारी हो सकती है । इतना ही नहीं भारत में तमाम औद्योगिक इकईयाँ रासायनिक कचरायुक्त पानी को जमीन के निचे पानी की सतह में लगातार फेंक रहें है जिसके कारण उस औद्योगिक इकाई के आस-पास के कस्बों अथवा गाँवो के नागरिकों द्वारा भूगर्भीय जल का इस्तेमाल करने से वे घातक बीमारियों से ग्रस्त हो रहे है किंतु स्थानीय पर्यावरण नियंत्रण विभाग इन औद्योगिक इकाईयों द्वारा किए जा रहे पर्यावरणीय विनाशक अपराध के प्रति आँखें बंद किए बैठा है ।
पालीथीन का प्रयोग भी आज देश के लिए एक बडी समस्या बन चुका है ये आसानी से नष्ट नहीं होते इसके खाने से अनेक गाये मर चुकी है चूँकि लोग खाने का सामान इसमे रख कर बाहर फेंक देंते है । बहुराष्ट्रीय प्लास्टिक उद्योग भारत में २ मिलियन टन प्लास्टिक बनाता है जो बाद में कचरे में परिवर्तित हो जाता है इसमे से एक मिलियन टन वह कंटेनर है जिसमें भोज्य पदार्थ, दवाएं, कास्मेटिक्स सीमेंट बैग आदि होते है, जो एक बार प्रयोग के बाद बेकार हो जाते है । इन्हे कौन उठाकर फ़िर से रीसायकिल करेगा ? २५००० करोड़ का यह सनराईज उद्योग जो कि १० से १५ प्रतिशत की दर से वृद्धि कर रहा है पर्यावरण दुष्प्रभाव के नाम से भी चिढ़ता है । इन लोगों को देश के उन छोटे-छोटे कारीगरों, कुम्हारों, डलिया व जूट बनाने वाले श्रमिकों से क्या मतलब जिनकी रोटी इनके कारण छीन सी गई है । इनके लिए तो पर्यावरण की बात करने वाले लोग भी पसंद नही है । स्वीडन, नार्वे व जर्मनी में ऐसे नियम बनाए गए है कि प्लास्टिक कंपनियों द्वारा बनाए गए प्लास्टिक कचरे को एकत्र करके उसे रीसाईकल करने की जिम्मेदारी इन्ही कंपनियों की है । भारत में रंगनाथन कमेटी ने कहा था कि प्लास्टिक उद्योग अपने द्वारा उत्पादित १५००० टन बोतलों के कचरे का १००० केन्द्रों द्वारा एकत्र करके रीसाईकिल करे पर कोई नहीं जनता कि इस दिशा में क्या प्रगति हुई । सरकार ने ३ बार रीसाईकिल उत्पाद नियम के द्वारा २० माईक्रोन से कम के ८ गुणे १२ के छोटे प्लास्टिक लिफाफे बनाने पर प्रतिबन्ध लगाया है चूकि यह इधर-उधर उड़ते है और गंदगी फैलाते है पर क्या मात्र इस प्रतिबन्ध से समस्या हल हो जायेगी ?
अस्पतालों से निकला कचरा जैसे प्लास्टिक की ग्लूकोज की बोतलें, दवाये, प्लास्टिक आफ पेरिस व अन्य विषाक्त वस्तुए समाज के लिए बहुत ही खतरनाक है इन्हे नष्ट करने के लिए इनसिनेटर नामक मशीन आती है इस मशीन की जरूरत आज हर बडे अस्पतालों में है पर हमारी सरकार इस दिशा में कितना कार्य कर पाई है पर्यावरण की सुरक्षा आज हमारी परम आवश्यकता बन चूकी है इसके लिए केवल सरकार पर निर्भर नही रहा जा सकता इस् लिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद २१ एवं अनुच्छेद ५१-अ (ग ) के तहत आम नागरिकों को भी पर्यावरण वायु एवं जल प्रदूषण से आने वाली पीढ़ी के लिए पैदा हुए गंभीर खतरे को रोकने हेतु अनिवार्य रूप से कार्य करना होगा अन्यथा पर्यावरण प्रदूषण मानवता के लिए गंभीर खतरे का रूप ले चुका है ।

सोमवार, 2 जून 2008

अपराध कानून और मानवाधिकार

अपराध का प्राकृतिक स्वरूप :
मानवता के आरंभिक चरण में भी मनुष्य अपराधों का निवारण करता था । तथा वह स्वयं शत्रुओं से बदला लेता था इस कार्य में आवश्यकतानुसार उसके बंधू और मित्र भी सहयोग करते थे लेकिन इस अवस्था में प्रत्येक मनुष्य के प्राण हथेली पर रहते थे उस समय प्रत्येक मनुष्य अपने मामले में स्वयं न्यायाधीश होता था और शारीरिक बल ही एकमात्र न्याय का मापदंड था इसलिए उस समय आवश्यक नही था कि अपराध के लिए निश्चित रूप से दंड दिया ही जाएगा अथवा निरपराध को अपनी सफाई में कुछ बोलने के अवसर या अधिकार प्राप्त होंगे ।
उस समय एक अपराध दुसरे अपराध को जन्म देता था और आनुषंगिक अपराध केवल अपराधी तक ही सीमित नही होता था बल्कि उसके साथ उसके परिवार एवं उसके कबीलों को भी प्रतिरोध का शिकार बनना पड़ता था इस तरह समूहों और कबीलों में संघर्ष छिड़ जाता था जो कई व्यक्तियों और उसके संबंधियों को प्रभावित करता था तथा साथ ही कई-कई पीढियों तक चलता रहता था यह संघर्ष व्यापक रूप से कष्टकारी एवं विध्वंसकारी एवं रक्तरंजित होता था सभ्यता के विकास के साथ-साथ ही इस न्याय के मापदंड में बदलाव आया इन संघर्षों में होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की गई यहाँ तक कि हत्या तक के मामलों में मरने वाले व्यक्ति के संबंधियों को उस व्यक्ति के महत्व के अनुसार रक्त द्रव्य के रूप में धन अदा किया जाने लगा इस प्रकार न्याय प्रशासन ने निश्चित नियमों के तहत एक निश्चित दिशा की तरफ़ कदम बढाया ।
इसके बाद राज्य के उदय होने के साथ ही आपराधिक प्रशासन में भी परिवर्तन आया तथा अपराध नियंत्रण का अधिकार व्यक्ति के हांथों से निकल कर राज्य के हांथों में चला गया उस युग की यह धारणा थी कि अपराध का सम्बन्ध केवल अपराधी और उससे आहत व्यक्ति तक ही सीमित है धूमिल पड़ने लगा और यह भावना कि समाज विरोधी कार्य केवल व्यक्ति के विरुद्ध ही नही वरन राज्य के विरुद्ध अपराध है प्रबल होती गई ।
मनुष्य जब सामाजिक जीवन व्यतीत करना शुरू किया है तभी से समाज में अपराध भी अनेक रूपों से अस्तित्व में आया अन्तर केवल इतना है मानव समाज के विकास के साथ-साथ विकास के अर्थों तथा प्रारूपों में अन्तर होता चला गया दुसरे अन्य व्यवहारों की भांति आपराधिक व्यवहार भी मानव व्यवहार का अंग बन गया इसीलिए मानव व्यवहार का ही एक अंग होने के कारण सामाजिक नियमों, आदर्शों एवं मूल्यों में परिवर्तन के साथ-साथ यह भी बदलता चला गया अर्थात अपराध की अवधारणा अपराध के कारण, प्रकार व करने के ढंग की सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवर्तित होते चले गए ।
इस तरह यह मानने से इंकार नही किया जा सकता कि अपराध एक वास्तविक सामाजिक समस्या है जिसकी प्रवित्ति को समझना तथा उसके विरोध का उपाय करना प्रत्येक समाज का कर्तव्य है मानव समाज में सायद ही कभी ऐसा समय रहा हो जबकि अपराध का अस्तित्व न रहा हो । भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग भी अपराधों से विषाक्त थे यह कहा जाता है कि उस समय लोग चोरी नही करते थे इस लिए उस समय लोग अपने घरों में ताले नही लगाते थे लेकिन इसका तात्पर्य यह कदापि नही कि उस समय लोग चोरी नही करते थे वास्तविकता यह थी कि उस समय कानून बहुत कठोर थे तथा उसका पालन भी शक्ति से किया जाता था लेकिन आज तो अपराध निरंतर अबाध गति से बढ़ते ही जा रहे है साधारण तथा सर्वत्र अपराध की प्रवित्ति भी बढ़ती जा रही है ।
अपराधों को रोकने के लिए रोज नये-नये उपाय किए जाने के बावजूद भी उसमे निरंतर बढोत्तरी ही हो रही है जिसे देखते हुए प्रो टेटन बाम का कथन संभवतः सही प्रतीक होता है कि "अपराध को समाज से अलग नही किया जा सकता" इसी प्रकार के विचार फ्रांसीसी समाज शास्त्री दुर्खिम ने व्यक्त किए है कि "पाप के समान अपराध भी समाज की एक सामान्य घटना है और मनुष्य द्वारा निर्मित कानून और प्रथाये असामान्य" दुर्खिम ने अपराध को समाज के लिए उपयोगी बताते हुए कहा है कि अपराध समाज के लिए आवश्यक है सामाजिक जीवन की आधार भूत दशाओं से संबंधित होने के कारण यह इसके लिए उपयोगी भी है "।
ठीक इसी प्रकार डा परिपूर्णानन्द वर्मा का कथन है कि "अपराध हीन समाज कल्याण से परे की वस्तु है । जब नियम बनेंगें तो उसको तोड़ने वाले भी पैदा होंगे नियम की रचना समाज की रचना के साथ होती है दोनों एक दुसरे के साथ साधन और साध्य के समान मिले हुए है अतः इस संबंध में कुछ भी नई बात या नया निदान खोज निकलने का प्रयत्न करना अनंत यात्रा करना है निष्कलंक मनुष्य अथवा निष्कलंक समाज सायद ही कभी मिले चूँकि हम ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते है इस लिए हमें केवल भगवान ही निष्कलंक तथा पाप-पुण्य से परे नजर आता है जो लोग प्रभु की सत्ता को नहीं मानते उनके लिए तो यह सहारा भी नही है ।
यद्यपि अपराध समाज की एक अमूर्त अवधारणा है लेकिन कोई भी ऐसा समाज नही है जिसमें किसी न किसी रूप में प्रत्येक काल में अपराध विद्यमान न रहा हो इसलिए इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि एक काल्पनिक एवं मिथ्या समाज को छोड़ कर अपराध को विल्कुल मिटाया नहीं जा सकता ज्यों-ज्यों मानव सभ्यता ने उन्नति की है यह अनुभव किया जाने लगा है कि समाज में कुछ लोग ऐसा व्यवहार करते है जिसके कारण सामाजिक हितों को चोट पहुंचती है । इस प्रकार के कृत्य केवल सामाजिक एकता एवं संगठन को ही नुकसान नहीं पहुँचाते वरन उसके अस्तित्व को ही खतरा पैदा कर देते है ।
अपराध की परिभाषा :
साधारण बोल-चाल की भाषा में "अपराध" शब्द का अभिप्राय उस कार्य से है जिसे समाज अनैतिक व अनुचित मानता है और समझता है तथा जिसको सामाजिक शान्ति का विनाशक मानता है प्रत्येक समाज की निश्चित व्यवस्था होती है इस व्यवस्था के बने रहने में ही अधिकाधिक समाज कल्याण की आशा की जा सकती है तथा समाज भी प्रगति की दिशा की ओर बढ़ सकता है इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कुछ वैधानिक प्रतिमान बना दिए जाते है जिसके पालन पर ही समाज की आन्तरिक संरचना और बाहरी व्यवस्था निर्भर करती है जो व्यक्ति इन नियमों का पालन नहीं करते अथवा दुसरे शब्दों में जो व्यक्ति समाज के नियमों का पालन नहीं करते अथवा दुसरे शब्दों में जो व्यक्ति समाज के नियमों, आदर्शों एवं मूल्यों के विरुद्ध आचरण करते है और समाज की व्यवस्था को धक्का पहुचाते है तथा सामाजिक संगठन को छिन्न-भिन्न करने का खतरा पैदा करते है उनके इस विशेष व्यवहार को अपराध कहा जाता है ।
लेकिन अगर इसको वास्तविक रूप से समझा जाए तो इसका अर्थ बहुत व्यापक है जिसकी व्याख्या करना बडा कठिन कार्य है वस्तुतः समाज विरोधी व्यवहार ही अपराध है जिन समाजों में कानून की विकसित व्यवस्था होती है वहां उसी आचरण को अपराध कहते है जो कि कानून की दृष्टि में अपराध है, कानून का उल्लंघन है इसी प्रकार जिन समुदायों में आचरण संहिता का बोलबाला होता है उसमे नैतिकता के नियमों का उल्लंघन अपराध कहलाता है इस विषय पर अटेबरी व हंट का कहना है कि "अपराध वह कार्य है जो कि किसी निर्दिष्ट समय में अथवा निर्दिष्ट स्थान पर किसी समूह के पूर्व स्थापित व्यवहारों का विरोध करता है" जब अपराध की व्याख्या समाज विरोधी व्यवहार के रूप में की जाती है । तो इसका आरंभ वास्तव में अनैतिक अथवा अवांछनीय अथवा अपेक्षित व्यवहार के रूप में की जाती है परन्तु क्या सभी नैतिक मूल्यों को प्रभावित करने वाले कृत्य अपराध है ? उदाहरण के तौर पर बच्चे द्वारा माता पिता की आज्ञा का पालन न करना नैतिकता के खिलाफ तो हो सकता है लेकिन क्या इसे अपराध कहा जा सकता है ? संभवतः नहीं ।
आगे जारी..........................

रविवार, 1 जून 2008

परमात्मा की दानशीलता

मैंने भगवान से मांगी शक्ति,
उसने मुझे दी कठिनाइयां,
हिम्मत बढाने के लिए ।

मैंने भगवान से मांगी बुद्धि,
उसने मुझे दी उलझनें,
सुलझाने के लिए ।

मैंने भगवान से मांगी संवृद्धि
उसने मुझे दी समझ,
काम करने के लिए ।

मैंने भगवान से माँगा प्यार,
उसने मुझे दिए दुखी लोग,
मदद करने के लिए ।

मैंने भगवान से मांगी हिम्मत,
उसने मुझे दी परेशानियाँ,
उबर पाने के लिए ।

मैंने भगवान से मांगे वरदान,
उसने मुझे दिए अवसर,
उन्हें पाने के लिए ।

वो मुझे नही मिला जो मैंने माँगा था ,
मुझे वो मिल गया जो मुझे चाहिए था

शुक्रवार, 30 मई 2008

विश्व तम्बाकू रोधी दिवस ( जिन्दगी चुनें तम्बाकू नहीं )

आज ३१ मई २००८ विश्व तम्बाकू रोधी दिवस है भारत सरकार ने अखबारों तथा अन्य प्रसार माध्यमों के मध्यम से बडे-बडे इश्तिहार देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली इन इस्तिहारों में यह कह दिया गया कि "धूम्र पान जानलेवा है" कही-कही यह भी लिख दिया गया कि "तम्बाकू से कैंसर होता है" एक और जुमला फेका गया "तम्बाकू दर्दनाक मृत्यु का कारण है" इसी के साथ कुछ मुह के कैंसर से पीड़ित लोगों फोटो लगा दिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डा अम्बुमणि रामदौस एवं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री श्रीमती पानाबाका लक्ष्मी का भी अखबारी एड के माध्यम से प्रचार हो गया विश्व तम्बाकू रोधी दिवस पर केवल एड में करोडों रूपये खर्च कर दिए गए सवाल यह है कि कितने लोगों ने इस् एड को देखा या पढा ? क्या एक दिन के एड से अथवा एक दिन विश्व तम्बाकू रोधी दिवस मना लेने भर से इस् बडे खतरे से मानवता निजाद पा लेगी ? मुझे नही लगता कि केवल इतना करने मात्र से हमे कुछ हासिल होगा बल्कि इस समस्या से अगर समाज को बचाना है तो हमारे समाज एवं हमारी सरकारों को तम्बाकू मुक्त समाज आन्दोलन अथवा मुहीम चलानी होगी ठीक उसी तरह जैसे हमारे देश में पोलियो के विरुद्ध अभियान चलाया जा रहा है ।
सरकारी आकडे के अनुसार हमारे देश में तम्बाकू जनित रोगों के कारण प्रतिवर्ष १० लाख लोगों की मौत हो जाती है । स्वास्थ्य मंत्रालय एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ ) और अन्य स्वतंत्र विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर के ५० प्रतिशत से अधिक मामले तम्बाकू के सेवन से होते है । मौजूदा समय में तम्बाकू मानवता का सबसे बडा हत्यारा है । अभी तक हमारी सरकारों ने केवल इस समस्या के बारे में सतही तौर पर खानापूर्ति करती ही दिखती है । इस् विषय पर सरकार की कार्रवाईयों को देख कर लगता है कि तम्बाकू उत्पादों के खतरे का ढिंढोरा पीटने के पीछे केवल एक मकसद होता है इन उत्पादों पर कर बढा देना जिससे सरकारी खजाने में बढोत्तरी हो सके । तम्बाकू का उत्पाद बनाने वाली कंपनिया इन बातों से परिचित है । हमारी सरकार की तरफ़ से अभी तक तम्बाकू का उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के विरुद्ध क्यो कोई सख्त कदम नही उठाया गया ? क्या केवल इन कंपनियों द्वारा अपने उत्पादों पर " तम्बाकू का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है" इतना लिख देने मात्र से उनका अपराध ख़त्म हो जाता है ? ये कंपनिया भ्रामक विज्ञापन, उत्पादों के इस्तेमाल हेतु प्रोत्साहन, एवं प्रचार-प्रसार में लगभग १० अरब सालाना रूपये खर्च करती है ।
"तम्बाकू २६ प्रकार से भी अधिक जानलेवा बीमारियो का जनक है"। तम्बाकू में मौजूद तत्व निकोटीन अधिक नशीला होता है। और आदि बनाने वाला होता है इसलिए इस नशे को त्यागने में लोग अक्सर असफल हो जातें हैं। इन सभी बातों से पता चलता है समस्या की जडें कितनी गहरी है तो क्या सतही तौर पर कार्रवाई से समस्या का समाधान हो सकेगा । अभी हल में ही देश के स्वास्थ्य मंत्री डा अम्बुमणि रामदौस ने अपने एक बयान में कहा है कि "अब बिना विलम्ब आकस्मिक तौर पर ६० करोड़ भारतीयों को, जिनकी उम्र ३० साल से कम है उनकों तम्बाकू, शराब, और फास्ट फ़ूड से बचना है" लेकिन हमारे स्वास्थ्य मंत्री कैसे बचायेगे इन युवाओं को ? क्या कोई ठोस रणनीति है स्वास्थ्य मंत्रालय के पास या फ़िर यह केवल कोरी बयानबाजी है यह तो स्वास्थ्य मंत्री ही जानते होंगे ।
मैं तो केवल आप सभी पाठकों से यही अपील कर सकता हूँ कि "जिन्दगी चुनें तम्बाकू नहीं"

बुधवार, 28 मई 2008

पुलिस की निरंकुशता मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन

अब तो पुलिस और जांच एजेंसियों का शिर्फ़ एक ही मकसद रह गया है कि वे किसी तरह से राजनैतिक नेताओं का विश्वास हासिल कर लें आज निर्धन एवं सम्पन्न लोगों के लिए पुलिस अलग अलग दृष्टिकोण अपनाए हुए है अगर कोई साधन हीन गरीब व्यक्ति थाने जाता है तो उसका (एफ आई आर ) प्रथम सूचना रिपोर्ट तक नही लिखी जाती । उसे डाट कर थाने से भगा दिया जाता है और यदि किसी तरह (एफ आई आर ) लिख भी लिया जाता है तो भी मामले की जांच कार्रवाई नही होती । वही दूसरी तरफ़ यदि कोई साधन सम्पन्न व्यक्ति थाने जाता है तो पुलिस का दृष्टिकोण अचानक बदल जाता है । स्वाधीनता के बासठ वर्ष बीत चुके है लेकिन अब तक न तो पुलिस को मानवीय बनाया गया, और न ही उसे एहसास कराया गया कि उसके लिए सभी नागरिक समान है ।

पुलिस को आम भाषा में "वर्दी वाला गुंडा" तक कहा जाता है, फ़िर भी पुलिस के आचरण में कोई अन्तर नही आ रहा है पुलिस चाहे पंजाब की हो, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, अथवा दिल्ली की पुलिस पुलिस के बारे में आम नागरिकों की राय अच्छी नही है अब भी लोग पुलिस को उसी दृष्टिकोण से देखते है जैसे अंग्रेजों के समय पुलिस को निर्दयी मानते थे । पुलिस अत्याचार की जो कहानियाँ प्रायः प्रकाशित होती रहती है उसके कारण आम लोगों और पुलिस में अब भी उसी तरह की दुरी बनी हुई है पुलिस और जनता के दुरी के कई कारण है उसमे एक पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें भी है, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार २००४-२००५ में हिरासतीय मौतों के अकडों में पुलिस हिरासत में १३६ मौतें तथा न्यायिक हिरासत में १३५७ मौतें अर्थात हिरासत में कुल १४९३ मौतों की रिपोर्ट दी है ।

देश की आम जनता के प्रति पुलिस का रवैया कभी भी दोस्ताना नही रहा, कोई भी ऐसा राज्य नही है जहाँ पुलिस पर ऊँगली न उठाई गई हो हालांकि दिल्ली की पुलिस को अपेक्षाकृत अधिक सतर्क और मानवीय माना जाता है लेकिन यहाँ भी पुलिस अत्याचारों, मानवाधिकार हनन की कहानियाँ अक्सर सामने आती रहतीं है । पैसों के लिए लोगों को प्रताडित करना, झूठे केसों में फ़साने की धमकी देकर पैसा ऐठ्ना, शिकायतकर्ता को उल्टे झूठे केस में फसा देना, पैसा लेकर आरोपियों को छोड़ देना पुलिस के लिए आम बात है । पुलिस कितनी निरंकुश एवं कितनी निर्भीक है उसके द्वारा किए जा रहे दमनात्मक कार्रवाईयों से पता चलता है । निचले स्तर के पुलिसकर्मी दूकानदारों तथा फुटपाथ पर धंधा करने वालों से हप्ता वसूली और न देने पर उनके साथ अत्याचार, पैसा लेकर अनैतिक कार्यों को प्रोत्साहन देना, असामाजिक तत्वों का संरक्षण, भोले-भाले आम नागरिकों के साथ अमानवीय व्यवहार, किसी भी नागरिक पर बिना वजह डंडे बरसाना एवं थानें में लेजाकर पिटाई करने की धमकी, घिनौनी गालियों से लोगों का स्वागत इनके लिए साधारण बात है । इतना ही नही बल्कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी अमानवीय अत्याचार और अपराध करने के मामले में पीछे नही है उदाहरण के लिए पंजाब के पुलिस प्रमुख गिल के द्वारा की गई वरिष्ठ महिला अधिकारी के साथ छेड़खानी का हो, दिल्ली पुलिस आयुक्त जसपाल सिंह द्वारा किया गया हत्या का मामला अथवा अभी हाल में मुम्बई के मशहूर भवन निर्माता चतुर्वेदी को फर्जी मामले में फंसाये जाने का मामला लोगों के समक्ष है ।

मैंने एक समाचार पत्र में पुलिस के प्रति एक व्यंग पढा था की किसी देश में दुनिया के हर देशों की पुलिस के उत्कृष्टता हेतु या सर्वोच्च काविलियत के प्रदर्शन हेतु प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, उसमे विभिन्न देशों की पुलिस सामिल हुई । आयोजकों ने बड़े जंगल में एक शेर को छोड़ा और उपस्थित पुलिसवालों से कहा कि जिस देश की पुलिस सबसे पहले शेर को जंगल से पकड़ कर लाएगी उसे ही सर्वोच्च एवं उत्कृष्ट माना जाएगा । अन्य देशों की पुलिस अपने-अपने तरीकों से शेर को ढूढने में लग गई, मगर भारतीय पुलिस शेर को ढूढने जंगल में घुसी तथा जंगल में घुसते ही उसने एक भेडिये को पकड़ लिया और उसकी पिटाई शुरू कर दी कि कबूल कर कि तू भेडिया नही शेर है, विचारा भेडिया पिटाई से बचने के लिए अपने आप को शेर होना कबूल किया और तुरत-फुरत में भेडिये को शेर बनाकर आयोजकों के समक्ष पेश कर दिया भेद खुलने पर भले ही किरकिरी हुई तो ये है हमारी भारतीय पुलिस इसका अर्थ है कि हमारी पुलिस में इतना दम है कि वह जो भी चाहे किसी से कबूल करवा सकती है । यह अंग्रेजों की बनाई पुलिस सायद यह भूल गई किउस समय यदि उसे असीमित अधिकार प्राप्त थे तो नौकरी भी पल में चली जाती थी । देश आजाद हुआ तो पुलिस को चाहिए कि वह लोगों को एहसास भी कराए कि वह अंग्रेजों की नही आजाद भारत की पुलिस है ।

कहा जाता है कि वर्तमान पुलिस की बुनियाद व शैली अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गई थी आजादी मिलने के बाद पुलिस व्यवस्था में कोई बदलाव न करते हुए गोरों का स्थान भारतीयों ने ले लिया वर्तमान सत्ता के दलालों या भ्रष्ट राजनीतिबाजों की मानसिकता में कोई परिवर्तन नही आया अंग्रेजों के जमाने में तो पुलिस का मुख्य काम अंग्रेजों के सत्ता की रक्षा करना व भारतीयों के आन्दोलन को किसी भी प्रकार से कुचलना होता था, परन्तु यदि अन्य अपराधों से निपटने के बारे में आज की पुलिस से तब की कारगुजारियों की तुलना करें तो पायेगें कि उस समय की पुलिस काफी निष्पक्ष, कारगर, समर्थ, व दयालू थी जबकि आज उसकी इन्हीं कार्रवाईयों में भारी गिरावट आई है हालांकि तब छोटे पदों पर अधिकांश भारतीय ही थे यदि हम अंग्रेजों के सत्ता हितों की रक्षा को अलग रक्खे तो पुलिस में केस दर्ज करवाने से जांच तक प्रत्येक स्तर पर कानून का कठोरता से पालन होता था कई बार पक्षपात करने पर भारतीय पुलिस अधिकारियों को अंग्रेज अफसरों द्वारा दण्डित या अपमानित भी किया जाता था । हमारी कानून व्यवस्था इंग्लैंड के कानून प्रणाली पर आधारित है तथा अंग्रेज सामाजिक न्याय के लिए दुनिया भर में ऊँचा स्थान रखतें है, पर हम उनकी नक़ल करते हुए उनकी बुराइयों को तो अपना लिए, और अच्छाइयों को दरकिनार कर दिया ।

अंग्रेजों के समय में पुलिस व न्याय के मामले में आज की तरह राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं था, हालांकि तब भी पुलिस को काफी अधिकार प्राप्त थे लेकिन आज जितना भ्रष्टाचार तब भी नहीं था, सायद इसी कारण देख या सुन कर यह सवाल जेहन में पैदा हो जाता है कि क्या हम स्वतंत्र भारत के नागरिक है ? अंग्रेजों ने अपने समय में पुलिस संस्था को इस् ढंग से व्यवस्थित किया था उस समय की पुलिस को काफी अधिकार देने के साथ एक और अच्छी बात यह थी कि भ्रष्ट पुलिस अधिकारी को नौकरी से तुरंत बर्खास्त करने के साथ-साथ उसकी जायजाद भी जप्त कर लेने का प्रावधान भी था, उस समय आज-कल के संविधान की धारा ३२२ नहीं थी अतः नौकरी तत्काल खोनी पड़ सकती थी बात भी सही थी रक्षक को भक्षक बनने का हक़ क्यों मिले ।

आजादी के बाद के पुलिस की छवि गालियाँ देने वाले व यातना देने वाले वहशी की बन चुकी है क्या कभी स्वयं पुलिस वाले या इसमें सबसे ज्यादा दोषी मौजूदा राजनीतिबाजों ने सोचा है ? आज पुलिस का अपराधीकरण होने के साथ-साथ साम्प्रदायीकरण भी हो चुका है जो देश के लिए अत्यन्त खतरनाक है । पिछले ३० वर्षों से हमारा समाज पहले से कही अधिक मानवीय मूल्यों से परे हो गया है देश की चुनावी राजनीति धर्म-जाति मतदाताओं पर बंटी हुई है, जिस क्षेत्र में जिस जाति या धर्म के लोग ज्यादा वोट हो उसी धर्म या जाति के व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया जाता है फ़िर वही नेता विधायक या मंत्री बनकर अपनी ही जाति या धर्म के पुलिस अधिकारियों को उस क्षेत्र में तैनात करवाकर अपने विरोधियों से बदला लेने या अपने लोगों की स्वार्थ पूर्ति कराने हेतु उक्त पुलिस अधिकारियों का उपयोग करते है ।

विश्व के सबसे बडे प्रजातंत्र का संचालन व प्रबंध आज भी ब्रिटिशों द्वारा बनाये ढांचों व कानूनों से किया जा रहा है । समय बदला आवश्यकताए बदली लेकिन हमारा कानून व पुलिस का ढांचा विगड़ता चला गया, अंग्रेजों से विरासत में मिले इस कानून व प्रशासनिक ढांचे का एक दुखद पहलू यह भी है कि पुलिस सत्ताधारी शासकों व पूंजीपतियों की कठपुतली बन कर रह गई है, तथा इसमें क्रूर प्रवित्ति बढ़ती जा रही है अपने असीमित अधिकारों का पुलिस द्वारा भारी दुरूपयोग किया जाने लगा है, इन बातों से पुलिस संस्था को अपने छवि की कोई चिंता नही है, आज की पुलिस एक अत्याचारी संस्था का रूप ले चुकी है । और यही आज बडे पैमाने पर मानवाधिकारों का हनन करती दिखाई दे रही है । पुलिस संस्था में सुधार या उसे पुरी तरह बदलने के लिए बडे-बडे सुझाव आए, पुलिस में सुधार के लिए धर्मवीर की अध्यक्षता में पुलिस आयोग का गठन भी किया गया लेकिन सायद हमारे राजनीतिक ही नही चाहते कि पुलिस संस्था को सुधार कर उसे जनानुकूल बनाया जाए ।

पुलिस सुधार के लिए कुछ आवश्यक सुझाव :

(१) पुलिस प्रक्रिया पर राजनैतिक हस्तक्षेप से बचाव हो ।

(२) राज्य सुरक्षा आयोग जैसी स्वतंत्र इकाई का गठन किया जाय ।

(३) पुलिस प्रमुख के चयन की प्रक्रिया पारदर्शी हो और उनका सुनिश्चित कार्यकाल हो ।

(४) आन्तरिक अनुशासन के लिए एक विशेष तंत्र की व्यवस्था हो ।

(५) पुलिस द्वारा किए गए ग़लत कार्यों हेतु सुनिश्चित दंड की व्यवस्था हो ।

(६) अनियमित कार्यो को परिभाषित कर सार्वजनिक किया जाय ।

(७) स्पष्ट, निष्पक्ष एवं पारदर्शी अनुशासनात्मक प्रक्रिया का अनुपालन हो ।

(८) पुलिस अपराधों की स्पष्ट व्याख्या हो ।

(९) जनता की शिकायतों के लिए स्वतंत्र इकाई बने जोकि पुलिस प्रभाव से मुक्त हो जो केवल पुलिस के विरुद्ध शिकायतों पर ही ध्यान दे ।

(१०) जनता के शिकायतों के लिए बनी इकाई में जनता के तरफ़ से अपने प्रतिनिधि चुन कर भेजे जाय तथा यह चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी हो ।

(११) जिला और राज्य स्तर तक बनी इन इकाईयों तक आम आदमी आसानी से पहुँच सके ।

(१२) इन इकाईयों को अधिकार हो कि एफ आई आर दर्ज और विभागीय कार्यवाही कराने के लिए प्रभावी निर्देश दे सके तथा पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति राशि दिलाने में सक्षम हों ।

(१३) पुलिस के दिन प्रतिदिन के कार्यों कि गुणवत्ता में सुधार हो ।

(१४) पुलिस के कार्यों एवं कर्तव्यों की स्पष्ट व्याख्या हो ।

(१५) कानून व्यवस्था बनाये रखने तथा अपराधिक जांच के कार्यों के लिए पृथक पुलिस दल हो ।