गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

बाबा आमटे

बाबा आमटे के योगदान को कौन भूल सकता है। २६ दिसंबर १९१४ में महाराष्‍ट्र के वर्धा जिलें एक छोटे से गांव में जन्‍मे बाबा के पिता शासकीय सेवा में लेखपाल थे। बचपन शान से बिता था। लेकिन बाबा ने सब कुछ छोड़कर गांधी के रास्ता पर जाना ही बेहतर समझा। बाबा चाहते थे तो अपनी पढ़ाई के बल पर किसी बड़ी नौकरी को पकड़ कर बडे शान से अपना जीवन बिता सकते थे। लेकिन बाबा ने ऐसा रास्ता नहीं अपनाया। देखते देखते वो पूरे देश के बाबा बन गए। गरीब, आदिवासियों और मजदूरों की आवाज थे बाबा। आज के इस आधुनिक समय में अगर किसी व्यक्ति ने उपेक्षित, पीड़ित और समाज की घोर उपेक्षा के शिकार कुष्ट रोगियों की पीड़ा और संवेदना को अगर किसी ने समझा था तो वे बाबा आमटे ही थे।
एक दिन बाबा ने एक कोढ़ी को धुआँधार बारिश में भींगते हुए देखा उसकी सहायता के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। उन्होंने सोचा कि अगर अगर इसकी जगह मैं होता तो क्या होता ? उन्होंने तत्क्षण बाबा उस रोगी को उठाया और अपने घर की ओर चल दिए। इसके बाद बाबा आमटे ने कुष्ठ रोग को जानने और समझने में ही अपना पूरा ध्यान लगा दिया। वड़ोरा के पास घने जंगल में अपनी पत्नी साधनाताई, दो पुत्रों, एक गाय एवं सात रोगियों के साथ आनंद वन की स्थापना की। यही आनंद वन आज बाबा आमटे और उनके सहयोगियों के कठिन श्रम से आज हताश और निराश कुष्ठ रोगियों के लिए आशा, जीवन और सम्मानजनक जीवन जीने का केंद्र बन चुका है। मिट्टी की सौंधी महक से आत्मीय रिश्ता रखने वाले बाबा आमटे ने चंद्रपुर जिले, महाराष्ट्र के वड़ोरा के निकट आनंदवन नामक अपने इस आश्रम को आधी सदी से अधिक समय तक विकास के विलक्षण प्रयोगों की कर्मभूमि बनाए रखा। जीवनपर्यन्त कुष्ठरोगियों, आदिवासियों और मजदूर-किसानों के साथ काम करते हुए उन्होंने वर्तमान विकास के जनविरोधी चरित्र को समझा और वैकल्पिक विकास की क्रांतिकारी जमीन तैयार की।
आनन्दवन की महत्ता चारों तरफ फैलने लगी, नए-नए रोगी आने लगे और "आनन्दवन" का महामंत्र 'श्रम ही है श्रीराम हमारा' सर्वत्र गूँजने लगा। आज "आनन्दवन" में स्वस्थ, आनन्दमयी और कर्मयोगियों की एक बस्ती बस गई है। भीख माँगनेवाले हाथ श्रम करके पसीने की कमाई उपजाने लगे हैं। किसी समय १४ रुपये में शुरु हुआ "आनन्दवन" का बजट आज करोड़ों में है। आज १८० हेक्टेयर जमीन पर फैला "आनन्दवन" अपनी आवश्यकता की हर वस्तु स्वयं पैदा कर रहा है। बाबा आम्टे ने "आनन्दवन" के अलावा और भी कई कुष्ठरोगी सेवा संस्थानों जैसे, सोमनाथ, अशोकवन आदि की स्थापना की है जहाँ हजारों रोगियों की सेवा की जाती है और उन्हें रोगी से सच्चा कर्मयोगी बनाया जाता है।
सन १९८५ में बाबा आमटे ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत जोड़ो आंदोलन भी चलाया था। इस आंदोलन को चलाने के पीछे उनका मकसद देश में एकता की भावना को बढ़ावा देना और पर्यावरण के प्रति लोगों का जागरुक करना था।

बुधवार, 2 अप्रैल 2008

मंहगाई रोकने के लिए कमिटी

अप्रैल को भारत सरकार के पाल्हे से मिडिया के पाल्हे मे एक ख़बर उछाली गई । सरकार मंहगाई रोकने के लिए कमिटी (कमीशन ) बनाने का फरमान जारी कर दिया । हमारे देश मे एक परंपरा चली आ रही है इस परंपरा को सभी सरकारें सिद्दत से निभा भी रही है कि पहले समस्या पैदा करो और जब समस्या विकराल रूप धारण करले तो उसके समाधान हेतु सुझाव प्राप्त करने के लिए एक कमिटी (कमीशन ) का गठन कर दो ।
इतिहास गवाह है कमिटीयां सरकारों को अपना रिपोर्ट देने मे अच्छा-खासा समय लगाती है " तुम मुझे समय दो मैं तुम्हे रिपोर्ट दूंगी" का टैग लटकाए ए कमिटीयां अपनी रिपोर्ट जब सरकारों को सौंपती है तो सरकारी नुमाइन्दो के पास रिपोर्ट पढ़ने का समय नही होता रिपोर्ट मे दिए गए सुझावों को लागु करना तो दूर की बात है ।
अरे भाई मंहगाई को रोकने का नाटक आम जनता के सामने क्यों कर रहे हो मंहगाई तो आप ने ही बढाया है ? अगर मंहगाई को आप नही रोक पा रहे हो तो आप की कमेटी (कमीशन ) क्या खाक मंहगाई रोकेगी ? यह समस्या तो आपने ही सरकारी खजाने को भरने के चक्कर मे खडा किया है । वायदा बाजार के नाम पर खाद्यानों की सट्टा-बाजारी कराना और उनसे भी टैक्स वसूलने के फिराक मे "कमोडिटी ट्रांजेक्शन टैक्स" ( जिसका गजट आना बाकी है ) आप मुनाफा कमाओगे तो मंहगाई बढेगी ही ।
राष्ट्रीय स्तर पर किसानों की पैरवी करने वाले सी आई एफ ए के मुख्य सचिव पी चेंगल रेड्डी ने बताया है की सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) मे कृषि की हिस्सेदारी १९८२-८३ के ३६.४ प्रतिशत से घट कर २००६-०७ मे १८.५ प्रतिशत रह गई इसीसे मंहगाई के सही तस्वीर का अंदाजा लगाया जा सकता है । आपको जानकर हैरानी होगी कि वायदा बाजार मे दो एक्सचेंज है एम् सी एक्स और एन सी डी ई एक्स पिछले महीने मे एक एक्सचेंज मे कपास के दाम ८० रूपये सस्ता था और दुसरे मे ८० रूपये मंहगा हम सरकार से जानना चाहते है कि फॉरवर्ड मार्केट कमीशन (एफ एम् सी ) का रोल क्या है ? एफ एम् सी ने कुछ चुनिंदा मंडियों और वायदा कारोबारियों को खाद्यानों के भाव के उतार-चढाव को नियंत्रित करने छूट क्यों दे रक्खी है ?
दरसल सरकार मंहगाई को नियंत्रित करने के लिए यह कसरत नही कर रही है । उसकी गिद्धदृष्टि लोकसभा के चुनावों को लेकर है उसे यह पता है कि अगर उसने मंहगाई रोकने के लिए जनता के समक्ष दिखावा नही करेगी तो जनता उसे लोकसभा चुनावों मे सस्ते मे ही निपटा देंगी ।

शनिवार, 29 मार्च 2008

जनता शर्मिंदा है

महाराष्ट्र राज्य विधान सभा ने महाराष्ट्र राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त नन्दलाल को जेल भेज दिया गया महाराष्ट्र राज्य विधान सभा एक संवैधानिक संस्था है तो क्या महाराष्ट्र चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था नही है ? मेरी जानकारी मे महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग भी एक संवैधानिक संस्था है । हमारा मतलब यहाँ नन्दलाल नामक व्यक्ति से कत्तई नही है हमारा मतलब तो महाराष्ट्र के चुनाव आयुक्त से है । यहाँ पर अपने पद की गरिमा का ध्यान नही रखा जा रहा है और न ही दुसरे के पद की गरिमा को स्वीकार किया जा रहा है ।
नन्दलाल को कल १०.३० बजे आर्थर रोड जेल से छोड़ दिया गया इसके पश्चात वे महाराष्ट्र राज्य विधान सभा की विशेषाधिकार समिति द्वारा दी गई सजा के खिलाफ मुम्बई उच्च न्यायालय मे चले गए इधर महाराष्ट्र राज्य विधान सभा ने प्रस्ताव पास कर दिया कि न्यायालय की कोई नोटिस विधान सभा स्वीकार नही करेगी न्यायालय भी एक संवैधानिक संस्था है ।
विधान सभा भी एक संवैधानिक संस्था है...महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग भी एक संवैधानिक संस्था है.....मुम्बई उच्च न्यायालय भी एक संवैधानिक संस्था है.................
यहाँ अपनी मर्यादा का आदर नही, दूसरो के मर्यादा का आदर नही, कोई संयम नही, कोई अनुशासन नही महाराष्ट्र के जनप्रतिनिधियों का यह व्यवहार उन्हें शर्मिंदा नही कर रहा है ? उनके इस कृत्य से महाराष्ट्र का प्रबुद्ध वर्ग और जनता जरुर शर्मिंदा है ।

गुरुवार, 13 मार्च 2008

मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा

10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की समान्य सभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया । इसका पूर्ण पाठ आगे के पृष्ठों में दिया गया है । इस ऐतिहासिक कार्य के बाद ही सभा ने सभी सदस्य देशों से पुनरावेदन किया कि वे इस घोषणा का प्रचार करें और देशों अथवा प्रदेशों की राजनैतिक स्थिति पर आधारित भेदभाव का विचार किए बिना, विशेषतः विद्यालयों और अन्य शिक्षा संस्थाओं में, इसके प्रचार, प्रदर्शन, पठन और व्याख्या का प्रबंध करें । इसी घोषणा का सरकारी पाठ संयुक्त राष्ट्रों की इन पांच भाषाओं में प्राप्य है ः अंग्रेज़ी, चीनी, फ़्रांसीसी, रूसी और स्पेनी । अनुवाद का जो पाठ यहां दिया गया है, वह भारत सरकार द्वारा स्वीकृत है ।
प्रस्तावना :
चूंकि मानव परिवार के सभी सदस्यों के जन्मजात गौरव और समान तथा अविच्छिन्न अधिकार की स्वीकृति ही विश्व-शांति, न्याय और स्वतंत्रता की बुनियाद है,

चूंकि मानव अधिकारों के प्रति उपेक्षा और घृणा के फलस्वरूप ही ऐसे बर्बर कार्य हुय जिनसे मनुष्य की आत्मा पर अत्याचार किया गया, चूंकि एक ऐसी विश्व-व्यवस्था की उस स्थापना को (जिसमें लोगों को भाषण और धर्म की आजादी तथा भय और अभव से मुक्ति मिलेगी) सर्वसाधारण के लिए सर्वोच्च आकांक्षा घोषित किया गया है,

चूंकि अगर अन्याययुक्त शासन और जुल्म के विरुद्ध लोगों को विद्रोह करने के लिय - उसे ही अंतिम उपाय समझकर - मजबूर नहीं हो जाना है, तो कनून द्वारा नियम बनाकर मानव अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है,

चूंकि राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ाना जरूरी है,

चूंकि संयुक्त राष्ट्रों के सदस्य देशों की जनताओं ने बुनियादी मानव अधिकारों में, मानव व्यक्तित्व के गौरव और योग्यता में और नर-नारियों के समान अधिकारों में अपने विश्वास को अधिकार-पत्र में दहुराया है और यह निश्चय किया है कि अधिक व्यापक स्वतंत्रता के अंतर्गत सामाजिक प्रगति एवं जीवन के बेहतर स्तर को ऊंचा किया जाएं,

चूंकि सदस्य देशों ने यह प्रतिज्ञा की है कि वे संयुक्त राष्ट्रों के सहयोग से मानव अधिकारों और बुनियादी आजादियों के प्रति सार्वभौम सम्मान की वृद्धि करेंगे,

चूंकि इस प्रतिज्ञा को पूरी तरह से निभाने के लिए इन अधिकारों और आजादियों का स्वरूप ठीक-ठीक समझना सबसे जरूरी है ।

इसलिए, अब,

समान्य सभा

घोषित करती है कि मानव अधिकारों की यह सार्वभौम घोषणा सभी देशों और सभी लोगों की समान सफलता है । इसका उद्देश्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति और समाज का प्रत्येक भाग इस घोषणा को लगातार दृष्टि में रखते हुए अध्यापन और शिक्षा के द्वारा यह प्रयत्न करेगा कि इन अधिकारों और आजादियों के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत हो, और उत्तरोत्तर ऐसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय उपाय किए जाएं जिनसे सदस्य देशों की जनता तथा उनके द्वारा अधिकृत प्रदेशों की जनता इन अधिकारों की सार्वभौम और प्रभावोत्पादक स्वीकृति दे और उनका पालन कराएं ।

अनुच्छेद 1
सभी मनुष्यों को गौरव और अधिकारों के मामले में जन्मजात स्वतंत्रता और समानता प्राप्त है । उन्हें बुद्धि और अंतरात्मा की देन प्राप्त है और परस्पर उन्हें भाईचारे के भाव से बर्ताव करना चाहिए ।

अनुच्छेद 2
सभी को इस घोषणा में सन्निहित सभी अधिकरों और आजादियों को प्राप्त करने का हक है और इस मामले में जाति, वर्ण, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य विचार-प्रणाली, किसी देश या समाज विशेष में जन्म, संपत्ति या किसी प्रकार की अन्य मर्यादा आदि के कारण भेदभाव का विचार न किया जाएगा । इसके अतिरिक्त, चाहे कोई देश या प्रदेश स्वतंत्र हो, संरक्षित हो, या स्वशासन रहित हो, या परिमित प्रभुसत्ता वाला हो, उस देश या प्रदेश की राजनैतिक क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के आधार पर वहां के निवासियों के प्रति कोई फ़रक न रखा जाएगा ।

अनुच्छेद 3
प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वाधीनता और वैयक्तिक सुरक्षा का अधिकार है ।


अनुच्छेद 4
कोई भी गुलामी या दासता की हालत में न रखा जाएगा, गुलामी-प्रथा और गुलामों का व्यापार अपने सभी रूपों में निषिद्ध होगा ।

अनुच्छेद 5
किसी को भी शारीरिक यातना न गी जाएगी और न किसी के भी प्रति निर्दय, अमानुषिक या अपमानजनक व्यबहार होगा ।

अनुच्छेद 6
हर किसी को हर जगह कानून की निगाह में व्यक्ति के रूप में स्वीकृति-प्राप्ति का अधिकार है ।


अनुच्छेद 7
कानून की निगाह में सभी समान हैं और सभी बिना भेदभाव के समान कानूनी सुरक्षा के अधिकारी हैं । यदि इस घोषणा का अतिक्रमण करके कोई भी भेदभाव किया जाए या उस प्रकार के भेदभाव को किसी प्रकार से उकसाया जाए, तो उसके विरुद्ध समान सुरक्षण का अधिकार सभी को प्राप्त है ।

अनुच्छेद 8
सभी को संविधान या कानून द्वारा प्राप्त बुनियादी अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले कार्यों के विरुद्ध समुचित राष्ट्रीय अदालतों की कारगर सहायता पाने का हक है ।

अनुच्छेद 9
किसी को भी मनमाने ढंग से गिरफ्तार, नजरबंद, या देश-निष्कसित न किया जाएगा ।


अनुच्छेद 10
सभी को पूर्ण्तः समान रूप से हक है कि उनके अधिकारों और कर्तव्यों के निश्चय करने के मामले में और उन पर आरोपित फौजदारी के किसी मामले में उनकी सुनवाई न्यायोचित और सार्वजनिक रूप से निरपेक्ष एवं निष्पक्ष अदालत द्वारा हो ।

अनुच्छेद 11
1. प्रत्येक व्यक्ति, जिस पर दंडनीय अपरोध का आरोप किया गया हो, तब तक निरपराध माना जाएगा, जब तक उसे ऐसी खुली अदालत में, जहां उसे अपनी सफाई की सभी आवश्यक सुविधाएं प्राप्त हों , कानून के अनुसार अपराधी न सिद्ध कर दिया जाए ।
2। कोई भी व्यक्ति किसी भी ऐसे कृत या अकृत (अपराध) के कारण उस दंडनीय अपराध का अपराधी न माना जाएगा, जिसे तत्कालीन प्रचलित राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार दंडनीय अपराध न माना जाए और न अससे अधिक भारी दंड दिया जा सकेगा, जो उस समय दिया जाता जिस समय वह दंडनीय अपराध किया गया था ।

अनुच्छेद 12
किसी व्यक्ति की एकांतता, परिवार, घर, या पत्रव्यवहार के प्रति कोई मनमाना हस्तक्षेप न किया जाएगा, न किसी के सम्मान और ख्याति पर कोई आक्षेप हो सकेगा । ऐसे हस्तक्षेप या आक्षेपों के विरुद्ध प्रत्येक को कनूनी रक्षा का अधिकार प्राप्त है ।

अनुच्छेद 13
1. प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक देश की सीमाओं के अंदर स्वतंत्रतापूर्वक आने, जाने, और बसने का अधिकार है ।
2। प्रत्येक व्यक्ति को अपने या पराए किसी भी देश को छोड़ने और अपने देश वापस आने का अधिकार है ।

अनुच्छेद 14
1. प्रत्येक व्यक्ति को स्ताए जाने पर दूसरे देशों में शरण लेने और रहने का अधिकार है ।
2। इस अधिकार का लाभ ऐसे मामलों में नहीं मिलेगा जो वास्तव में गैर-राजनीतिक अपराधों से संबंधित हैं, या जो संयुक्त राष्ट्रों के उद्देश्यों और सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य हैं ।

अनुच्छेद 15
1. प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी राष्ट्र-विशेष को नागरिकता का अधिकार है ।
2। किसी को भी मनमाने ढंग से अपने राष्ट्र की नागरिकता से वंचित न किया जाएगा या नागरिकता का परिवर्तन करने से मना न किया जाएगा ।

अनुच्छेद 16
1. बालिग स्त्री-पुरुषों को बिना किसी जाति, राष्ट्रीयता या दर्म की रुकावटों के आपस में विवाह करने और परिवार स्थापन करने का अधिकार है । उन्हें विवाह के विषय में वैवाहिक जीवन में, तथा विवाह विच्छेद के बारे में समान अधिकार है ।
2. विवाह का इरादा रखने वाले स्त्री-पुरुषों की पूर्ण और स्वतंत्र सहमति पर ही विवाह हो सकेगा ।
3। परिवार समाज का स्वाभाविक और बुनियादी सामूहिक इकाई है और उसे समाज तथा राज्य द्वारा संरक्षण पाने का अधिकार है ।

अनुच्छेद 17
1। प्रत्येक व्यक्ति को अकेले और दूसरों के साथ मिलकर संपत्ति रखने का अधिकार है । 2. किसी को भी मनमाने ढंग से अपनी संपत्ति से वंचित न किया जाएगा ।

अनुच्छेद 18
प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अंतरात्मा और धर्म की आजादी का अधिकार है । इस अधिकार के अंतर्गत अपना धर्म या विश्वास बदलने और अकेले या दूसरों के साथ मिलकर तथा सार्वजनिक रूप में अथवा निजी तर पर अपने धर्म या विश्वास को शिक्षा, क्रिया, उपसाना, तथा व्यवहार के द्वारा प्रकट करने की स्वतंत्रता है ।

अनुच्छेद 19
प्रत्येक व्यक्ति को विचार और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है । इसके अंतर्गत बिना हस्तक्षेप के कोई राय रखना और किसी भी माध्यम के जरिए से तथा सीमाओं की परवाह न करके किसी की सूचना और धारणा का अन्वेषण, ग्रहण तथा प्रदान सम्मिलित है ।

अनुच्छेद 20
1. प्रत्येक व्यक्ति को शांति पूर्ण सभा करने या समित्ति बनाने की स्वतंत्रता का अधिकार है ।
2। किसी को भी किसी संस्था का सदस्य बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता ।

अनुच्छेद 21
1. प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश के शासन में प्रत्यक्ष रूप से या स्वतंत्र रूप से चुने गए प्रतिनिधिओं के जरिए हिस्सा लेन का अधिकार है ।
2. प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश की सरकारी नौकरियों को प्राप्त करने का समान अधिकार है ।
३। सरकार की सत्ता का आधार जनता की इच्छा होगी । इस इच्छा का प्रकटन समय-समय पर और असली चुनावों द्वारा होगा । ये चुनावों सार्वभौम और समान मताधिकार द्वारा होंगे और गुप्त मतदान द्वारा या किसी अन्य समान स्वतंत्र मतदान पद्धति से कराए जाएंगे ।

अनुच्छेद 22
समाज के एक सदस्य के रूप में प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा का अधिकार है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के उस स्वतंत्र विकास तथा गौरव के लिए - जो राष्ट्रीय प्रयत्न या अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा प्रत्येक राज्य के संगठन एवं साधनों के अनुकूल हो - अनिवार्यतः आवश्यक आर्थिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक अधिकारों की प्राप्ति का हक है ।

अनुच्छेद 23
1. प्रत्येक व्यक्ति को काम करने, इच्छानुसार रोजगार के चुनाव, काम की उचित और सुविधाजनक परिस्थितियों को प्राप्त करने और बेकारी से संरक्षण पाने का हक है ।
2. प्रत्येक व्यक्ति को समान कार्य के लिएअ बिना किसी भेदभव के समान मजदूरी पाने का अधिकार है ।
3. प्रत्येक व्यक्ति को जो काम करता है, अधिकार है कि वह इतनी उचित और अनुकूल लजदूरी पाए, जिससे वह अपने लिए और अपने परिवार के लिए ऐसी आजीविका का प्रबंध कर सके, जो मानवीय गौरव के योग्य हो तथा आवश्यकता होने पर उसकी पूर्ति अन्य प्रकार के सामाजिक संरक्षणों द्वारा हो सके ।
4। प्रत्येक व्यक्ति को अपने हितों की रक्षा के लिए श्रमजीवी संघ बनाने और उनमें भाग लेने का अधिकार है ।

अनुच्छेद 24
प्रत्येक ब्यक्ति को विश्राम और अवकाश का अधिकार है । इसके अंतर्गत काम के घंटों की उचित हदबंदी और समय-समय पर मजदूरी सहित छुट्टियां सम्मिलित है ।

अनुच्छेद 25
1.प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे जीवनस्तर को प्राप्त करने का अधिकार है जो उसे और उसके परिवार के स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए पर्याप्त हो । इसके अंतर्गत खाना, कपड़ा, मकान, चिकित्सा-संबंधी सुविधाएं और आवश्यक सामाजिक सेवाएं सम्मिलित है । सभी को बेकारी, बीमारी, असमर्था, वैधव्य, बुढ़ापे या अन्य किसी ऐसी परिस्थिति में आजीविका का साधन न होने पर जो उसके काबू के बाहर हो, सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है ।
2। जच्चा और बच्चा को खास सहायता और सुविधा का हक है । प्रत्येक बच्चे को चाहे वह विवाहिता माता से जन्मा हो या अविवाहिता से, समान सामाजिक संरक्षण प्राप्त है ।

अनुच्छेद 26
1. प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है । शिक्षा कम से कम प्रारंभिक और बुनियादी अवस्थाओं में निःशुल्क होगी । प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य होगी । टेक्निकल, यांत्रिक और पेशों-संबंधी शिक्षा साधारण रूप से प्राप्त होगी और उच्चतर शिक्षा सभी को योग्यता के आधार पर समान रूप से उपलब्ध होगी ।
2. शिक्षा का उद्देश्य होगा मानव व्यक्तित्व का पूर्ण विकास और मानव अधिकारों तथा बुनियादी स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान की पुष्टि । शिक्षा द्वारा राष्ट्रों, जातियों, अथवा धार्मिक समूहों के बीच आपसी सद्भावना, सहिष्णुता और मैत्री का विकास होगा और शांति बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्रों के प्रयत्नों को आगे बढ़ाया जाएगा ।
3। माता-पिता को सबसे पहले इस बात का अधिकार है कि वह चुनाव कर सकें कि किस किस्म की शिक्षा उनके बच्चों को दी जाएगी ।

अनुच्छेद 27
1. प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता-पूर्वक समाज के सांस्कृतिक जीवन में हिस्सा लेने, कलाओं का आनंद लेने, तथा वैज्ञानिक उन्नति और उसकी सुविशाओं में भाग लेने का हक है ।
2। प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी ऐसी वैज्ञानिक साहित्यिक या कलात्मक कृति से उत्पन्न नैतिक और आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार है जिसका रचयिता वह स्वयं है ।

अनुच्छेद 28
प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की प्राप्ति का अधिकार है जिसमें उस घोष्णा में उल्लिखित अधिकारों और स्वतंत्रताओं का पूर्णतः प्राप्त किया जा सके ।

अनुच्छेद 29
1. प्रत्येक व्यक्ति का उसी समाज प्रति कर्तव्य है जिसमें रहकर उसके व्यक्तित्व का स्वतंत्र और पूर्ण विकास संभव हो ।
2. अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपयोग करते हुए प्रत्येक व्यक्ति केवल ऐसी ही सीमाओं द्वारा बंध होगा, जो कानून द्वारा निश्चित की जाएंगी और जिनका एकमात्र उद्देश्य दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं के लिए आदर और समुचित स्वीकृति की प्राप्ति होगा तथा जिनकी आवश्यकता एक प्रजातंत्रात्मक समाज में नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और समान्य कल्याण की उचित आवश्यकताओं को पूरा करना होगा ।
3। इन अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपयोग किसी प्रकार से भी संयुक्त राष्ट्रों के सिद्धांतों और उद्देश्यों के विरुद्ध नहीं किया जाएगा ।

अनुच्छेद 30
इस घोष्णा में उल्लिखित किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए जिससे य प्रतीत हो कि किसी भी राज्य, समूह या ब्यक्ति को किसी ऐसे प्रयत्न में संलग्न होने या ऐसा कार्य करने का अधिकार है, जिसका उद्देश्य यहां बताए गए अधिकारों और स्वतंत्रताओं में से किसी का भी विनाश करना हो ।



शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

न्यायपालिका और गरीब

अगर किसी से भी यह पूछा जाए कि देश की न्यायपालिका के दरवाजे तक सही मायने में कितने लोग पहुंच पाते हैं? तो नि:संदेह ! उत्तर होगा ''आधे से भी कम''। वजह- हमारी न्यायिक व्यवस्था। जिसे गुलामी के दिनों में अंग्रेजों ने अपने लिए बनाया था। अंग्रेजों की न्यायिक व्यवस्था ने हमेशा से आम आदमी को इंसाफ दिलाने के बजाय अंग्रेजों का साथ दिया ताकि भारतीय उनके गुलाम बने रहें। यही वजह है कि न्यायिक प्रक्रिया के लिए न केवल अंग्रेजी भाषा इस्तेमाल की गई बल्कि उसे इतना जटिल बना दिया गया है कि आम आदमी वकीलों की मदद के बिना तो वहां तक पहुंच ही नहीं सकता। ड्रेस कोड भी जानबूझकर आम आदमी के दिलों में व्यवस्था के लिए खौफ पैदा करने के लिए बनाया गया था। किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए आदमी के लिए खुद को बचा पाना नामुमकिन है। वह पूरी तरह से पुलिस और न्यायपालिका की दया पर निर्भर है, क्योंकि उसे तो कोर्ट की भाषा समझ में आती नहीं, तो 'कोर्ट' अकेले ही सारी प्रक्रिया निपटा लेता है। इससे भी कड़वा सच तो यह है कि देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए बनाई गई न्यायिक व्यवस्था केवल कागजों पर ही नजर आती है। ऐसी व्यवस्था गरीबों को इंसाफ दिलाने का साधन हो ही नहीं सकती।70 के दशक के उत्तरार्ध्द में जब जस्टिस भगवती-कृष्ण अय्यर ने जनहित याचिका की परम्परा बनाई; तक यह सोचा गया था कि एक ऐसा यंत्र है जो गरीब की रोजी-रोटी और अधिकारों की रक्षा के लिए स्वयं नागरिकों द्वारा ही सर्वोच्च अदालत की भूमिका निभाई जाए और न्यायालय गरीबों के अधिकारों की रक्षा के लिए आम जनता की ओर से काम करे। तभी सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों को विस्तार से परिभाषित किया। यह परिभाषा खासकर संविधान के अनुच्छेद-21 में दिये गए 'जीवन के अधिकार' के संबंध में थी। अनुच्छेद 21- में 'सम्मान से जीने का अधिकार' शामिल किया गया और सम्मानपूर्वक जीने के लिए भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए।इसलिए 80 के दशक में लीक से हटकर भी कुछ फैसले लिए गए। बेगार पर रोक, कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी, बंदीकरण सुरक्षा के अधिकार, पागलखानों में सुरक्षित परिस्थितियां, बेघर-फुटपाथियों के अधिकार आदि कई मुद्दों पर न्यायालय ने सकारात्मक रवैया अपनाया। लेकिन 90 के दशक में उदारीकरण के युग में गरीबों के प्रति उच्च न्यायालयों का रूख धीरे-धीरे बदलता गया। अब तो यह आलम है कि न्यायालय आम आदमी के लिए जीविका, आवास, आजादी आदि सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सरकार को निर्देश देने से भी पीछे हट रहे हैं। यहां तक कि अपने ही दिये हुए पुराने निर्णयों को ही नकार रहे हैं। वे निर्णय जो गरीबों के लिए आवास, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा के कोई प्रबंध न होने की वजह से पूर्व में न्यायपालिका द्वारा दिऐ गए थे।आज गरीब आदमी 'नव आर्थिक उदारीकरण' की नीतियों की मार झेल रहा है। उसकी जमीन, पानी और रोजी-रोटी राज्य द्वारा कब्जाई जा रही हैं ताकि सबकुछ बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और धन्ना-सेठों की खनन, सेज और दूसरे बड़े-बड़े प्रोजेक्टों, आदि के लिए दी जा सकें। ऐसे में न्यायालयों को उन गरीबों की मदद के लिए आगे आना चाहिए था, जिनके अधिकार छीने जा रहे हैं। गरीबों के लिए कुछ करना तो दूर, न्यायालय उन संस्थाओं और लोगों की आवाज भी नहीं सुन रहे हैं, जो इन गरीबों के लिए न्याय की गुहार लगा रहे हैं।न्यायालयों में आजकल गरीब विरोधी निर्णयों का तो फैशन ही चल पड़ा है। मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग द्वारा दायर किए जनहित मुकद्मों में जो न्यायालय गरीब-पक्षधर सकारात्मक रूख अपनाते थे, दुर्भाग्यवश आज वे ही अपने फैसलों से गरीबों से आवास, व्यवसाय, रोजी और यहां तक कि आजादी भी छीन रहे हैं। बहुत से मामलों में तो देखा यह जा रहा है कि कोर्ट गरीबों को नोटिस तक देने की जहमत नहीं उठा रहे हैं, जिनके घरों को उनके फैसले पर उजाड़ दिया गया, रोजी छीन ली गई है और आजीविका एक ही पल में मिट्टी कर दिए गए और इस सबको 'कानून का शासन' नाम का जामा पहनाया जा रहा है। अमीरों को साफ-सुथरा पर्यावरण देने के कानून के लिए शासन के नाम पर गरीबों को सरकारी जमीन पर बने उनके मकानों में रहने से रोका जाता रहा है। जैसे कि दिल्ली और मुम्बई में हमने देखा कि एक ओर तो उच्च-मध्यम वर्ग की कॉलोनियों के पास बनी गरीबों की झुग्गियों की उजाड़ दिया गया तो दूसरी ओर दिल्ली की सड़कों से साइकिल और रिक्शा चलाने वालों को महज इसलिए हटा दिया गया, ताकि मध्यम और उच्च वर्ग के अमीरजादों को कार में घूमने का रास्ता साफ/क्लियर मिल सके।ऐसा लगता है कि इन निर्देशों के पीछे 'कोर्ट' और सरकार की मिलीभगत है, क्योंकि सरकार दिल्ली में यमुना पुश्ता पर बनी झुग्गियों को हटाना चाहती थी ताकि उस जमीन पर फाइव स्टार होटल और शॉपिंग माल्स बनाए जा सकें। सरकार में इतना दम नहीं था कि वह राजनीतिक रूप से इन झुग्गियों को हटाती। वजह, चुनाव में हर पांच साल बाद वोट भी तो लेने होते हैं। सो इसने न्यायपालिका के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई, क्योंकि न्यायपालिका लोकतांत्रिक या अन्य किसी भी तरह से, किसी भी प्रकार के संस्थान के प्रति जवाबदेह नहीं है। यह बड़ी आसानी से ऐसे आर्डर पास कर सकती थी, खासकर तब; जबकि फैसले इस वर्ग (न्यायपालिका के इलीट वर्ग) के भी अनुकूल थे। पिछले कुछ सालों से जिस तरीके से कामगारों और मजदूरों के लिए बने कानूनों को बिगाड़ा है। उससे सरकार और न्यायपालिका की जालसाजियों की सारी पोल खोल दी है। जैसे ही आर्थिक नीतियों का उदारीकरण किया गया और विदेशी कंपनियों को भारत में दुकानें खोलने के लिए बुलाया गया तो उद्योगों ने श्रम कानूनों को भी कम करने के लिए कदम उठाए और हवाला दिया कि देश को नए श्रम सुधारों की जरूरत है। इन सुधारों से श्रमिकों को मिली हुई सुरक्षा खत्म हो जाएगी और उन्हें अपने मालिकों की दया पर जीना होगा।इसके बाद की सरकारों के लिए श्रम कानूनों को खत्म करना जरा मुश्किल था क्योंकि वे सभी वामपंथी पाटियों के सहयोग पर निर्भर थीं या फिर उन्हें कामगारों और गरीबों से अगले चुनावों में वोट न मिलने का भी खतरा था। लेकिन तभी फिर से 'न्यायपालिका' में सुविधाजनक रास्ता खोज लिया गया और न्यायपालिका ने बड़ी ही सफाई से मजदूरों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर अपनी कैंची चला दी। इन कानूनों की नई परिभाषाएं देकर गरीब मजदूरों को कर्ज और मुफलिसी की जिंदगी के जीने का फरमान सुना दिया। 'कांट्रेक्ट लेबर एक्ट' तो एक तरह से खत्म ही हो गया है, क्योंकि एक के बाद एक मुकद्मे होने के बावजूद भी न्यायालय इसे लागू करने से इनकार कर रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय तो इनसे भी एक कदम आगे चला गया और कहा कि 'न्यायालय अपनी राज्य सरकार की आर्थिक नीतियों के अनुसार श्रम कानूनों को परिभाषित कर सकती हैं।' इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय की एक अन्य बेंच ने भी सरकार के उस फैसले को उचित ठहराया जिसमें उसने मॉरिशस में रजिस्टर्ड किसी 'एक पोस्ट बॉक्स कम्पनी' को 'इण्डो-मॉरिशस डबल टैक्सेशन अवाइडेंस एग्रीमेंट' का लाभ उठाने की अनुमति दे दी और इस तरह भारत को कोई भी टैक्स न देने का रास्ता साफ कर दिया। अब यह भारत में काम कर रही सभी विदेशी कंपनियां इसी रास्ते पर चल रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अब सरकार ऐसे आदेश देकर कम्पनियों को कर से छूट दे सकती है। यह तो एक व्यवस्थित संसदीय-प्रक्रिया का भी माखौल है क्योंकि संसद केवल वित्त विधेयक द्वारा ही करों में छूट आदि के कानून बना सकती है।नक्सलियों, माओवादियों या फिर मानव अधिकारों के लिए लड़ने वालों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं के मामलों में भी न्यायालयों का अनुदारवादी और फासीवादी रूख नजर आ रहा है। राज्यों ने जिन लोगों को नक्सलवादी और माओवादी करार दिया, उनकी अपीलों के साथ जिस तरह न्यायालय ने व्यवहार किया और जिस तरीके से समाजसेवी डॉ. विनायक सेन की जमानत नामंजूर की, वह सब इस बात की तरफ इशारा करता है कि कुछ न्यायधीशों ने फासीवादी रूख अपनाने का मन ही बना लिया है।अब यह बात साफ हो गई है कि अब न्यायपालिका गरीबों पर अत्याचार करने, भयभीत करने और यहां तक कि गरीबों से सबकुछ छीन लेने वाला तंत्र बनकर रह गई है। वह भी आम-जन को डराने और अत्याचार करने वाली संस्था बन गई है। ठीक वैसे ही जैसे पुलिस और नौकरशाही; आज विदेशी कंपनियों के पिट्ठू बनकर आम आदमी पर अत्याचार कर रहे हैं।न्यायपालिका के जन-विरोधी रूख के लिये दरअसल इसका ढांचा ही जिम्मेदार है। इसमें वर्गीय प्रतिनिधित्व, चयन की प्रक्रिया और सदस्यों का स्थायित्व आदि कई खामियों ने न्यायपालिका को जनता की पहुंच से दूर कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय में ज्यादातर जज ऊंची जाति और उच्च मध्यम वर्ग से आते हैं। इसलिए गरीबों के प्रति सहानुभूति तो शायद ही उनके मनों में होती है। न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया में ही अपारदर्शिता, निरंकुशता और भाई-भतीजावाद चलता है। जो व्यक्ति या अधिवक्ता उनके संघ के साथ मेल नहीं खाता और शासक वर्ग के साथ जिसका तालमेल नहीं है उसे चयन की प्रक्रिया से ही बाहर कर दिया जाता है। 1993 में न्यायपालिका ने संविधान की नई व्याख्या करके जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को कार्यपालिका के हाथों से छीन लिया और कार्यपालिका से स्वयं को 'मुक्त' करने के लिए न्यायपालिका ने सब किया। यह सब किया आजादी के नाम पर लेकिन गौर किया जाए तो इस सबसे न्यायपालिका की न तो स्वतंत्रता बढ़ी है; न ही न्यायपालिका में कोई सुधार ही हुआ है।अब देश की जनता के लिए समय आ गया है कि वह वर्तमान न्यायिक व्यवस्था और उस प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठाए, जिससे वह गरीबों को न्याय और अधिकारों की रक्षा करने के बजाय अत्याचारी शासक बन गई है।न्यायपालिका के सभी पक्षों और सारी कारगुजारियों को ध्यान में रखकर और विमर्श करके ही यह निर्णय लिया जाना चाहिए कि अब क्या किया जाए, इसी को ध्यान में रखते हुए गरीब और न्यायपालिका पर चर्चा के लिए यह सभा आयोजित की गई है। इस सभा में हम न्यायपालिका के ढांचे, कार्यों, कार्यवाहियों और व्यवहार पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह चर्चा खासतौर पर गरीबों के प्रति न्यायपालिका के व्यवहार पर होगी। चर्चा में न्यायपालिका के कार्यों में बदलाव लाने वाले, ढांचागत परिवर्तनों का जवाब ढूढ़ने की कोशिश की जाएगी ताकि न्यायपालिका आम आदमी के अधिकारों को लागू और रक्षा करने वाली बनें। इन परिवर्तनों को लागू करने के लिए हमें अफसरों पर दबाव डालने के लिए एक अभियान और राजनीतिक स्ट्रेटेजी बनाने की जरूरत है।हमें उम्मीद है कि जन आंदोलनों के प्रतिनिधि, ग्रासरूट संस्थाएं और दूसरे वे सभी लोग जो देश में न्यायपालिका की हालत पर चिन्तित हैं, इस सभा में जरूर भागीदारी करेंगें।

बुधवार, 2 जनवरी 2008

मानव अधिकार हनन के मामले पर मनमोहन की बेटी ने बुश प्रशासन को घेरा

अमरीका में मानवाधिकार मामलों की संस्था अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन या (एसीएलयू) की वकील अमृत सिंह ने क़ैदियों की प्रताड़ना पर बुश प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है.............

अमृत सिंह भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी है. उन्होंने एक किताब लिखी है जिसमें अमरीका के बुश प्रशासन को सीधे तौर पर क़ैदियों को प्रताड़ित करने का ज़िम्मेदार ठहराया गया है. इस किताब की ख़ास बात यह है कि इसमें जो भी आरोप लगाए गए हैं उनके सबूत ख़ुद अमरीकी सरकार के दस्तावेज़ों के आधार पर पेश किए गए हैं. इस पुस्तक में पिछले कई सालों में अमरीकी हिरासत में लिए गए क़ैदियों को प्रताड़ित किए जाने का लेखा-जोखा है. एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ टॉर्चर नाम की इस किताब में कहा गया है कि ख़ुद बुश प्रशासन के ही आला अफ़सरों ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए क़ैदियों को प्रताड़ित करने के निर्देश दिए थे. अमृत सिंह और एसीएलयू के ही दूसरे वकील जमील जाफ़र ने मिलकर यह किताब लिखी है. यह दोनों ही वकील एसीएलयू की ओर से मानवाधिकार के विभिन्न मामलों में अमरीकी सरकार के खिलाफ़ मुक़दमे लड़ते रहे हैं.
"बुश प्रशासन जनतंत्र और मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता की क़सम खाता है लेकिन ये दस्तावेज़ दिखाते हैं कि इस प्रशासन ने क़ैदियों के साथ मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले प्रताड़ना के विभिन्न तरीक़े अपनाए हैं. और इस किताब का मक़सद यही है कि सरकारी दस्तावेज़ों के ज़रिए ही हम सच्चाई अधिक से अधिक लोगों के सामने रखें"
इस नई किताब में कहा गया है कि बुश प्रशासन के यह कहने के बावजूद कि कैदियों को प्रताड़ित किए जाने के छिटपुट मामले ही हुए हैं, उसी के सरकारी दस्तावेज़ दूसरी ही कहानी कहते हैं। अमृत सिंह कहती हैं, "एक दस्तावेज़ जिसको अलबर्टो गोंज़ालेज़ ने लिखा था उसमें कहा गया है कि चूँकि अमरीका आतंकवाद से जूझ रहा है इसलिए जिनेवा कन्वेंशन के हिसाब से काम करना ज़रूरी नहीं है। और जो क़ैदी अमरीका ने पकड़े हैं उन पर जिनेवा कन्वेंशन के नियम लागू नहीं होते।" किताब के मुताबिक प्रताड़ना के मामले व्यापक पैमाने पर सामने आए हैं जिनमें सिर्फ़ इराक की अबू ग़रेब जेल, अफ़ग़ानिस्तान और ग्वांतानामो बे ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों की जेलों में क़ैदियों के साथ दुर्व्यहवार किया गया। अमृत सिंह का कहना है कि अगर अबू ग़रेब जेल की तस्वीरें सामने न आतीं तो क़ैदियों को यातनाएँ देने और प्रताड़ित करने के बारे में अंतरराष्ट्रीय सुमदाय को जानकारी न मिलती. अमृत सिंह का कहना है, "हैरत की बात यह थी कि एक मामले में तो कुछ एफ़बीआई के एजेंटों ने सैनिकों की इन कार्रवाई को देखकर कहा भी कि इस तरह प्रताड़ना देना ग़ैरक़ानूनी है, अनैतिक है और बेमतलब है. लेकिन यातनाएँ दी जाती रहीं. इस तरह बुश प्रशासन का सीधे तौर पर इस मामले में हाथ नज़र आता है." कुल 456 पन्नों की इस किताब में कई जेलों में क़ैदियों को तरह-तरह से यातनाएँ दिए जाने के मामलों को विस्तार से छापा गया है. एक लाख से ज़्यादा सरकारी दस्तावेज़ों का इस्तेमाल इस किताब में किया गया है जिनके आधार पर प्रताड़ना के इन मामलों में बुश प्रशासन की नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. जिन दस्तावेज़ों का इस्तेमाल इस किताब में किया गया है उनमें से करीब 350 दस्तावेज़ तो असली शक्ल में हू-ब-हू वैसे ही छापे गए है .
इन सरकारी दस्तावेज़ों में बुश प्रशासन के निर्देशों की प्रतियाँ, मुर्दा क़ैदियों के पंचनामों की रिपोर्टें, अमरीकी जांच संस्था एफ़बीआई के ईमेल और सरकारी जाँच रिपोर्टें भी शामिल हैं। किताब में प्रयोग किए गए यह दस्तावेज़ एसीएलयू संस्था ने सूचना के अधिकार संबंधित क़ानून के ज़रिए अमरीकी सरकार से ही हासिल किए थे। इस पुस्तक में हज़ारों की संख्या में इन दस्तावेज़ों के सहारे ही कैदियों को यातनाएँ देने के मामलों को सीधे बुश प्रशासन के उच्च अधिकारियों औऱ प्रशासन की नीतियों से जोड़ा गया है। अमृत सिंह और जमील जाफ़र ने किताब में लिखा है कि क़ैदियों के साथ बदसलूकी बुश प्रशासन की नीतियों के बावजूद नहीं बल्कि नीतियों के चलते ही की गई। उनका कहना है कि इस मामले में अमरीकी सेना के आला अप़सरों के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल थे। कुछ सरकारी जाँच एजेंसियों के एजेंट अपनी रिपोर्टों में कैदियों को प्रताड़ित करने की बात लिख कर अधिकारियों को भेजते भी थे लेकिन उनपर कोई अमल नहीं होता था। कैदियों को यातनाएँ दिए जाने का सिलसिला जारी रहा और उसके लिए उच्च अधिकारियों की हिमायत भी जारी रही। जिन आला अफ़सरों के खुलकर नाम लिए गए हैं उनमें पूर्व अमरीकी रक्षा मंत्री डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड, अमरीकी सेना के जनरल माइकल डन्लेवी, मेजर जनरल जेफ़री मिलर और रक्षा मंत्रालय के अन्य कई उच्च अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं। किताब में लिखा गया है, "बुश प्रशासन जनतंत्र और मानवाधिकार के प्रति कटिबद्वता की कसम खाता है लेकिन ये दस्तावेज़ दिखाते हैं कि इस प्रशासन ने क़ैदियों के साथ मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले प्रताड़ना के विभिन्न तरीक़े अपनाए हैं। और इस किताब का मक़सद यही है कि सरकारी दस्तावेज़ों के ज़रिए ही हम सच्चाई अधिक से अधिक लोगों के सामने रखें।" क़ैदियों के साथ बदसलूकी के मामलों में बुश प्रशासन की जांच से भी अमृत सिंह संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि अमरीकी कांग्रेस को चाहिए कि वह इस सारे मामले की गहन जाँच कराए और दोषियों को सज़ा दिलवाए।

सोमवार, 31 दिसंबर 2007

मानव अधिकारों के संघर्ष के रास्ते में नई चुनौती

मानव अधिकार के हनन में लगा महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग---------
वर्ष १९९६ में जब आल इंडिया ह्यूमन राइट्स एंड सिटीझन आफ्शन नामक संस्था की नीव रखी तो उस समय संस्था के उद्देश्यों में महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग की गठन के मांग को सबसे ऊपर रखा गया था । आयोग के गठन की मांग को लेकर संस्था ने वर्ष १९९६ से लेकर जब तक आयोग का गठन नही हो गया तब तक संघर्ष किया, रैलियां की, जनसभाए की, धरने-प्रदर्शन किए राज्य स्तरिय मानव अधिकार आयोग के गठन के लिए ज्ञापन दिए किन्तु यह सब करते समय हमे यह मालूम न था कि महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन हो जाने के पश्चात यह मानव अधिकार आयोग हम जैसे मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्य कर रहे मानव अधिकार कार्यकर्ताओं तथा स्वयंसेवी संगठनों एवं संस्थाओं को कुचलना ही अपना मुख्य उद्देश्य बना लेगा ।इस् विषय का हमे तब पता चला जब महाराष्ट्र के मंत्रालय में मैं उपस्थित था वहाँ मौजूद कुछ सचिव स्तर के अधिकारियों द्वारा महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग को "मलाईदार महकमा" के नाम से संबोधित करते हुए सुना तो हमे यह आभास हो गया कि किस तरह महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है । सरकारी महकमे मसलन पुलिस, महसूल, परिवहन, एवं महानगरपालिका आदि के अधिकारियों के विरुद्ध आयोग में आयी हुई शिकायतों को रफा-दफा करने हेतु सौदे किये जाने लगे है । आम आदमी जो यह समझता था कि कही न्याय मिले न मिले लेकिन मानव अधिकार आयोग में न्याय अवश्य मिलेगा आयोग द्वारा उनके इस् विश्वास को छला जाने लगा । आम आदमी को तो यह पता ही नही था कि उसके द्वारा कि गयी शिकायत मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ के तहत सुनवाई के योग्य है या नही इसका लाभ लेकर आयोग के सदस्यों ने उन सभी शिकायतों को यह कह कर खारिज करना शुरू कर दिया कि यह शिकायत मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ के तहत सुनवाई के योग्य नही है । और तो और पुलिस द्वारा व्यवसायी पर मकोका लगाए जाने के मामले को यह कह कर खारिज कर दिया गया कि यह दीवानी का मामला है । जिन मामलों में वे ऐसा नही कर पाए उन मामलों में शिकायतकर्ताओं को यह कह कर शिकायत पीछे लेने हेतु दबाव डाला जाने लगा कि पुलिस से अथवा सरकारी अधिकारियों से दुश्मनी मत मोल लो शिकायत वापस लेलो नही तो तुम्हे आगे काफी तकलीफ आयेगी, इतना ही नहीं आयोग द्वारा बिचौलिए की भूमिका निभाते हुए पुलिस अधिकारियों से पीड़ित को पैसे दिलाकर मामले को रफा-दफा किये जाने की बात होने लगी है, तथा शिकायतकर्ताओं को बिना सूचित किये सुनवाई बंद की जाने लगी ।मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ में यह कलमबद्ध किया गया है कि मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनो, संस्थाओं को मानव अधिकार आयोगों द्वारा प्रोत्साहित किया जायेगा किन्तु महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग द्वारा स्थिति उलट दी गयी । जब कोई स्वयंसेवी संगठन जो कि मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे है उनके द्वारा रखे गए सेमिनार में वक्ता के रूप में मौजूद आयोग के सदस्य या कर्मचारी मसलन मानव अधिकार हनन के मामलों कि जांच के लिए आयोग में नियुक्त पुलिस अधिकारी अपने भाषण में यह कहना शुरू कर दिया है कि मानव अधिकार आयोग का किसी स्वयंसेवी संगठन या संस्था से कोई संबंध नहीं है यहाँ यह विचारणीय है कि अगर ये आयोग जनसंगठनो या संस्थाओं से संबंधों को नकार रहे है तो क्या वे आम जनता के मानव अधिकारों के लिए कार्य करेगे ? इसमें संशय है । आयोग के सदस्य और कर्मचारीगण स्वयम यह साबित करना शुरू कर दिया है कि "मानव अधिकार जो कि आम नागरिक का मुद्दा था उसे व्यवस्था द्वारा हड़प लिया गया है" उन्होने मानव अधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनो तथा संस्थाओं पर हमले तेज कर दिए है उनके इन हमलों से पता चलता है कि मानव अधिकार आयोगों को ऐसे गैर सरकारी संगठन या संस्था जो कि मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत है और आयोग के क्रियाकलापों पर नजर रख सकते है उनके द्वारा गलत किये जाने पर ऊँगली भी उठा सकते है ।
दु:ख की बात यह है की महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग इससे भी दो कदम आगे जाकर मानव अधिकारों के क्षेत्र में पिछले १५ वर्षों से कार्यरत मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस के माध्यम से झूठे एफ.आई.आर. दर्ज कराने शुरू कर दिए है तथा मानव अधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों की जांच के नाम पर संगठनों, संस्थाओं के कार्यकर्ताओं को प्रताडित करना शुरू कर दिया है । यह सब आयोग में बैठे आयोग के सदस्यों एवं आयोग के जांच विभाग में बैठाये गए पुलिस कर्मचारियों के इशारे पर हो रहा है आयोग के सदस्य के द्वारा तो यहाँ तक कहते सुना गया है कि ऐसे सभी स्वयं सेवी संगठनों को बंद कराना है जो मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे है । प्रश्न यह है कि आखिर महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग की मंशा क्या है मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध झूठे एफ।आई.आर. दर्ज कराने से लेकर, जांच के नाम पर मानव अधिकार संगठनों को प्रताडित करना क्या यही मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ का उद्देश्य था, क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानव अधिकार विश्वघोषणा का उद्देश्य यही है ? जो महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग का उद्देश्य बनता नजर आ रहा है जब रक्षक भक्षक बन जाये तो उसके विरुद्ध उठ खडे हो जाना नितांत आवश्यक हो जाता है । ब्यवस्था की खामियों से संघर्ष करना ही मानव अधिकार आंदोलनों का पहला चरण है अब वह समय आ गया है जब हम सभी मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनो एवं संस्थाओं तथा कार्यकर्ता एकजुट हों और महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग द्वारा भारी पैमाने पर किये जा रहे मानव अधिकार हनन के विरुद्ध संघर्ष शुरू करे ।