शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

न्यायपालिका और गरीब

अगर किसी से भी यह पूछा जाए कि देश की न्यायपालिका के दरवाजे तक सही मायने में कितने लोग पहुंच पाते हैं? तो नि:संदेह ! उत्तर होगा ''आधे से भी कम''। वजह- हमारी न्यायिक व्यवस्था। जिसे गुलामी के दिनों में अंग्रेजों ने अपने लिए बनाया था। अंग्रेजों की न्यायिक व्यवस्था ने हमेशा से आम आदमी को इंसाफ दिलाने के बजाय अंग्रेजों का साथ दिया ताकि भारतीय उनके गुलाम बने रहें। यही वजह है कि न्यायिक प्रक्रिया के लिए न केवल अंग्रेजी भाषा इस्तेमाल की गई बल्कि उसे इतना जटिल बना दिया गया है कि आम आदमी वकीलों की मदद के बिना तो वहां तक पहुंच ही नहीं सकता। ड्रेस कोड भी जानबूझकर आम आदमी के दिलों में व्यवस्था के लिए खौफ पैदा करने के लिए बनाया गया था। किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए आदमी के लिए खुद को बचा पाना नामुमकिन है। वह पूरी तरह से पुलिस और न्यायपालिका की दया पर निर्भर है, क्योंकि उसे तो कोर्ट की भाषा समझ में आती नहीं, तो 'कोर्ट' अकेले ही सारी प्रक्रिया निपटा लेता है। इससे भी कड़वा सच तो यह है कि देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए बनाई गई न्यायिक व्यवस्था केवल कागजों पर ही नजर आती है। ऐसी व्यवस्था गरीबों को इंसाफ दिलाने का साधन हो ही नहीं सकती।70 के दशक के उत्तरार्ध्द में जब जस्टिस भगवती-कृष्ण अय्यर ने जनहित याचिका की परम्परा बनाई; तक यह सोचा गया था कि एक ऐसा यंत्र है जो गरीब की रोजी-रोटी और अधिकारों की रक्षा के लिए स्वयं नागरिकों द्वारा ही सर्वोच्च अदालत की भूमिका निभाई जाए और न्यायालय गरीबों के अधिकारों की रक्षा के लिए आम जनता की ओर से काम करे। तभी सर्वोच्च न्यायालय ने मौलिक अधिकारों को विस्तार से परिभाषित किया। यह परिभाषा खासकर संविधान के अनुच्छेद-21 में दिये गए 'जीवन के अधिकार' के संबंध में थी। अनुच्छेद 21- में 'सम्मान से जीने का अधिकार' शामिल किया गया और सम्मानपूर्वक जीने के लिए भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी होनी चाहिए।इसलिए 80 के दशक में लीक से हटकर भी कुछ फैसले लिए गए। बेगार पर रोक, कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी, बंदीकरण सुरक्षा के अधिकार, पागलखानों में सुरक्षित परिस्थितियां, बेघर-फुटपाथियों के अधिकार आदि कई मुद्दों पर न्यायालय ने सकारात्मक रवैया अपनाया। लेकिन 90 के दशक में उदारीकरण के युग में गरीबों के प्रति उच्च न्यायालयों का रूख धीरे-धीरे बदलता गया। अब तो यह आलम है कि न्यायालय आम आदमी के लिए जीविका, आवास, आजादी आदि सुविधाएं मुहैया कराने के लिए सरकार को निर्देश देने से भी पीछे हट रहे हैं। यहां तक कि अपने ही दिये हुए पुराने निर्णयों को ही नकार रहे हैं। वे निर्णय जो गरीबों के लिए आवास, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा के कोई प्रबंध न होने की वजह से पूर्व में न्यायपालिका द्वारा दिऐ गए थे।आज गरीब आदमी 'नव आर्थिक उदारीकरण' की नीतियों की मार झेल रहा है। उसकी जमीन, पानी और रोजी-रोटी राज्य द्वारा कब्जाई जा रही हैं ताकि सबकुछ बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और धन्ना-सेठों की खनन, सेज और दूसरे बड़े-बड़े प्रोजेक्टों, आदि के लिए दी जा सकें। ऐसे में न्यायालयों को उन गरीबों की मदद के लिए आगे आना चाहिए था, जिनके अधिकार छीने जा रहे हैं। गरीबों के लिए कुछ करना तो दूर, न्यायालय उन संस्थाओं और लोगों की आवाज भी नहीं सुन रहे हैं, जो इन गरीबों के लिए न्याय की गुहार लगा रहे हैं।न्यायालयों में आजकल गरीब विरोधी निर्णयों का तो फैशन ही चल पड़ा है। मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग द्वारा दायर किए जनहित मुकद्मों में जो न्यायालय गरीब-पक्षधर सकारात्मक रूख अपनाते थे, दुर्भाग्यवश आज वे ही अपने फैसलों से गरीबों से आवास, व्यवसाय, रोजी और यहां तक कि आजादी भी छीन रहे हैं। बहुत से मामलों में तो देखा यह जा रहा है कि कोर्ट गरीबों को नोटिस तक देने की जहमत नहीं उठा रहे हैं, जिनके घरों को उनके फैसले पर उजाड़ दिया गया, रोजी छीन ली गई है और आजीविका एक ही पल में मिट्टी कर दिए गए और इस सबको 'कानून का शासन' नाम का जामा पहनाया जा रहा है। अमीरों को साफ-सुथरा पर्यावरण देने के कानून के लिए शासन के नाम पर गरीबों को सरकारी जमीन पर बने उनके मकानों में रहने से रोका जाता रहा है। जैसे कि दिल्ली और मुम्बई में हमने देखा कि एक ओर तो उच्च-मध्यम वर्ग की कॉलोनियों के पास बनी गरीबों की झुग्गियों की उजाड़ दिया गया तो दूसरी ओर दिल्ली की सड़कों से साइकिल और रिक्शा चलाने वालों को महज इसलिए हटा दिया गया, ताकि मध्यम और उच्च वर्ग के अमीरजादों को कार में घूमने का रास्ता साफ/क्लियर मिल सके।ऐसा लगता है कि इन निर्देशों के पीछे 'कोर्ट' और सरकार की मिलीभगत है, क्योंकि सरकार दिल्ली में यमुना पुश्ता पर बनी झुग्गियों को हटाना चाहती थी ताकि उस जमीन पर फाइव स्टार होटल और शॉपिंग माल्स बनाए जा सकें। सरकार में इतना दम नहीं था कि वह राजनीतिक रूप से इन झुग्गियों को हटाती। वजह, चुनाव में हर पांच साल बाद वोट भी तो लेने होते हैं। सो इसने न्यायपालिका के कंधे पर रखकर बंदूक चलाई, क्योंकि न्यायपालिका लोकतांत्रिक या अन्य किसी भी तरह से, किसी भी प्रकार के संस्थान के प्रति जवाबदेह नहीं है। यह बड़ी आसानी से ऐसे आर्डर पास कर सकती थी, खासकर तब; जबकि फैसले इस वर्ग (न्यायपालिका के इलीट वर्ग) के भी अनुकूल थे। पिछले कुछ सालों से जिस तरीके से कामगारों और मजदूरों के लिए बने कानूनों को बिगाड़ा है। उससे सरकार और न्यायपालिका की जालसाजियों की सारी पोल खोल दी है। जैसे ही आर्थिक नीतियों का उदारीकरण किया गया और विदेशी कंपनियों को भारत में दुकानें खोलने के लिए बुलाया गया तो उद्योगों ने श्रम कानूनों को भी कम करने के लिए कदम उठाए और हवाला दिया कि देश को नए श्रम सुधारों की जरूरत है। इन सुधारों से श्रमिकों को मिली हुई सुरक्षा खत्म हो जाएगी और उन्हें अपने मालिकों की दया पर जीना होगा।इसके बाद की सरकारों के लिए श्रम कानूनों को खत्म करना जरा मुश्किल था क्योंकि वे सभी वामपंथी पाटियों के सहयोग पर निर्भर थीं या फिर उन्हें कामगारों और गरीबों से अगले चुनावों में वोट न मिलने का भी खतरा था। लेकिन तभी फिर से 'न्यायपालिका' में सुविधाजनक रास्ता खोज लिया गया और न्यायपालिका ने बड़ी ही सफाई से मजदूरों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों पर अपनी कैंची चला दी। इन कानूनों की नई परिभाषाएं देकर गरीब मजदूरों को कर्ज और मुफलिसी की जिंदगी के जीने का फरमान सुना दिया। 'कांट्रेक्ट लेबर एक्ट' तो एक तरह से खत्म ही हो गया है, क्योंकि एक के बाद एक मुकद्मे होने के बावजूद भी न्यायालय इसे लागू करने से इनकार कर रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय तो इनसे भी एक कदम आगे चला गया और कहा कि 'न्यायालय अपनी राज्य सरकार की आर्थिक नीतियों के अनुसार श्रम कानूनों को परिभाषित कर सकती हैं।' इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय की एक अन्य बेंच ने भी सरकार के उस फैसले को उचित ठहराया जिसमें उसने मॉरिशस में रजिस्टर्ड किसी 'एक पोस्ट बॉक्स कम्पनी' को 'इण्डो-मॉरिशस डबल टैक्सेशन अवाइडेंस एग्रीमेंट' का लाभ उठाने की अनुमति दे दी और इस तरह भारत को कोई भी टैक्स न देने का रास्ता साफ कर दिया। अब यह भारत में काम कर रही सभी विदेशी कंपनियां इसी रास्ते पर चल रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अब सरकार ऐसे आदेश देकर कम्पनियों को कर से छूट दे सकती है। यह तो एक व्यवस्थित संसदीय-प्रक्रिया का भी माखौल है क्योंकि संसद केवल वित्त विधेयक द्वारा ही करों में छूट आदि के कानून बना सकती है।नक्सलियों, माओवादियों या फिर मानव अधिकारों के लिए लड़ने वालों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं के मामलों में भी न्यायालयों का अनुदारवादी और फासीवादी रूख नजर आ रहा है। राज्यों ने जिन लोगों को नक्सलवादी और माओवादी करार दिया, उनकी अपीलों के साथ जिस तरह न्यायालय ने व्यवहार किया और जिस तरीके से समाजसेवी डॉ. विनायक सेन की जमानत नामंजूर की, वह सब इस बात की तरफ इशारा करता है कि कुछ न्यायधीशों ने फासीवादी रूख अपनाने का मन ही बना लिया है।अब यह बात साफ हो गई है कि अब न्यायपालिका गरीबों पर अत्याचार करने, भयभीत करने और यहां तक कि गरीबों से सबकुछ छीन लेने वाला तंत्र बनकर रह गई है। वह भी आम-जन को डराने और अत्याचार करने वाली संस्था बन गई है। ठीक वैसे ही जैसे पुलिस और नौकरशाही; आज विदेशी कंपनियों के पिट्ठू बनकर आम आदमी पर अत्याचार कर रहे हैं।न्यायपालिका के जन-विरोधी रूख के लिये दरअसल इसका ढांचा ही जिम्मेदार है। इसमें वर्गीय प्रतिनिधित्व, चयन की प्रक्रिया और सदस्यों का स्थायित्व आदि कई खामियों ने न्यायपालिका को जनता की पहुंच से दूर कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय में ज्यादातर जज ऊंची जाति और उच्च मध्यम वर्ग से आते हैं। इसलिए गरीबों के प्रति सहानुभूति तो शायद ही उनके मनों में होती है। न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया में ही अपारदर्शिता, निरंकुशता और भाई-भतीजावाद चलता है। जो व्यक्ति या अधिवक्ता उनके संघ के साथ मेल नहीं खाता और शासक वर्ग के साथ जिसका तालमेल नहीं है उसे चयन की प्रक्रिया से ही बाहर कर दिया जाता है। 1993 में न्यायपालिका ने संविधान की नई व्याख्या करके जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को कार्यपालिका के हाथों से छीन लिया और कार्यपालिका से स्वयं को 'मुक्त' करने के लिए न्यायपालिका ने सब किया। यह सब किया आजादी के नाम पर लेकिन गौर किया जाए तो इस सबसे न्यायपालिका की न तो स्वतंत्रता बढ़ी है; न ही न्यायपालिका में कोई सुधार ही हुआ है।अब देश की जनता के लिए समय आ गया है कि वह वर्तमान न्यायिक व्यवस्था और उस प्रक्रिया के खिलाफ आवाज उठाए, जिससे वह गरीबों को न्याय और अधिकारों की रक्षा करने के बजाय अत्याचारी शासक बन गई है।न्यायपालिका के सभी पक्षों और सारी कारगुजारियों को ध्यान में रखकर और विमर्श करके ही यह निर्णय लिया जाना चाहिए कि अब क्या किया जाए, इसी को ध्यान में रखते हुए गरीब और न्यायपालिका पर चर्चा के लिए यह सभा आयोजित की गई है। इस सभा में हम न्यायपालिका के ढांचे, कार्यों, कार्यवाहियों और व्यवहार पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यह चर्चा खासतौर पर गरीबों के प्रति न्यायपालिका के व्यवहार पर होगी। चर्चा में न्यायपालिका के कार्यों में बदलाव लाने वाले, ढांचागत परिवर्तनों का जवाब ढूढ़ने की कोशिश की जाएगी ताकि न्यायपालिका आम आदमी के अधिकारों को लागू और रक्षा करने वाली बनें। इन परिवर्तनों को लागू करने के लिए हमें अफसरों पर दबाव डालने के लिए एक अभियान और राजनीतिक स्ट्रेटेजी बनाने की जरूरत है।हमें उम्मीद है कि जन आंदोलनों के प्रतिनिधि, ग्रासरूट संस्थाएं और दूसरे वे सभी लोग जो देश में न्यायपालिका की हालत पर चिन्तित हैं, इस सभा में जरूर भागीदारी करेंगें।

बुधवार, 2 जनवरी 2008

मानव अधिकार हनन के मामले पर मनमोहन की बेटी ने बुश प्रशासन को घेरा

अमरीका में मानवाधिकार मामलों की संस्था अमेरिकन सिविल लिबर्टीज़ यूनियन या (एसीएलयू) की वकील अमृत सिंह ने क़ैदियों की प्रताड़ना पर बुश प्रशासन को कठघरे में खड़ा किया है.............

अमृत सिंह भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी है. उन्होंने एक किताब लिखी है जिसमें अमरीका के बुश प्रशासन को सीधे तौर पर क़ैदियों को प्रताड़ित करने का ज़िम्मेदार ठहराया गया है. इस किताब की ख़ास बात यह है कि इसमें जो भी आरोप लगाए गए हैं उनके सबूत ख़ुद अमरीकी सरकार के दस्तावेज़ों के आधार पर पेश किए गए हैं. इस पुस्तक में पिछले कई सालों में अमरीकी हिरासत में लिए गए क़ैदियों को प्रताड़ित किए जाने का लेखा-जोखा है. एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ़ टॉर्चर नाम की इस किताब में कहा गया है कि ख़ुद बुश प्रशासन के ही आला अफ़सरों ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए क़ैदियों को प्रताड़ित करने के निर्देश दिए थे. अमृत सिंह और एसीएलयू के ही दूसरे वकील जमील जाफ़र ने मिलकर यह किताब लिखी है. यह दोनों ही वकील एसीएलयू की ओर से मानवाधिकार के विभिन्न मामलों में अमरीकी सरकार के खिलाफ़ मुक़दमे लड़ते रहे हैं.
"बुश प्रशासन जनतंत्र और मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता की क़सम खाता है लेकिन ये दस्तावेज़ दिखाते हैं कि इस प्रशासन ने क़ैदियों के साथ मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले प्रताड़ना के विभिन्न तरीक़े अपनाए हैं. और इस किताब का मक़सद यही है कि सरकारी दस्तावेज़ों के ज़रिए ही हम सच्चाई अधिक से अधिक लोगों के सामने रखें"
इस नई किताब में कहा गया है कि बुश प्रशासन के यह कहने के बावजूद कि कैदियों को प्रताड़ित किए जाने के छिटपुट मामले ही हुए हैं, उसी के सरकारी दस्तावेज़ दूसरी ही कहानी कहते हैं। अमृत सिंह कहती हैं, "एक दस्तावेज़ जिसको अलबर्टो गोंज़ालेज़ ने लिखा था उसमें कहा गया है कि चूँकि अमरीका आतंकवाद से जूझ रहा है इसलिए जिनेवा कन्वेंशन के हिसाब से काम करना ज़रूरी नहीं है। और जो क़ैदी अमरीका ने पकड़े हैं उन पर जिनेवा कन्वेंशन के नियम लागू नहीं होते।" किताब के मुताबिक प्रताड़ना के मामले व्यापक पैमाने पर सामने आए हैं जिनमें सिर्फ़ इराक की अबू ग़रेब जेल, अफ़ग़ानिस्तान और ग्वांतानामो बे ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों की जेलों में क़ैदियों के साथ दुर्व्यहवार किया गया। अमृत सिंह का कहना है कि अगर अबू ग़रेब जेल की तस्वीरें सामने न आतीं तो क़ैदियों को यातनाएँ देने और प्रताड़ित करने के बारे में अंतरराष्ट्रीय सुमदाय को जानकारी न मिलती. अमृत सिंह का कहना है, "हैरत की बात यह थी कि एक मामले में तो कुछ एफ़बीआई के एजेंटों ने सैनिकों की इन कार्रवाई को देखकर कहा भी कि इस तरह प्रताड़ना देना ग़ैरक़ानूनी है, अनैतिक है और बेमतलब है. लेकिन यातनाएँ दी जाती रहीं. इस तरह बुश प्रशासन का सीधे तौर पर इस मामले में हाथ नज़र आता है." कुल 456 पन्नों की इस किताब में कई जेलों में क़ैदियों को तरह-तरह से यातनाएँ दिए जाने के मामलों को विस्तार से छापा गया है. एक लाख से ज़्यादा सरकारी दस्तावेज़ों का इस्तेमाल इस किताब में किया गया है जिनके आधार पर प्रताड़ना के इन मामलों में बुश प्रशासन की नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. जिन दस्तावेज़ों का इस्तेमाल इस किताब में किया गया है उनमें से करीब 350 दस्तावेज़ तो असली शक्ल में हू-ब-हू वैसे ही छापे गए है .
इन सरकारी दस्तावेज़ों में बुश प्रशासन के निर्देशों की प्रतियाँ, मुर्दा क़ैदियों के पंचनामों की रिपोर्टें, अमरीकी जांच संस्था एफ़बीआई के ईमेल और सरकारी जाँच रिपोर्टें भी शामिल हैं। किताब में प्रयोग किए गए यह दस्तावेज़ एसीएलयू संस्था ने सूचना के अधिकार संबंधित क़ानून के ज़रिए अमरीकी सरकार से ही हासिल किए थे। इस पुस्तक में हज़ारों की संख्या में इन दस्तावेज़ों के सहारे ही कैदियों को यातनाएँ देने के मामलों को सीधे बुश प्रशासन के उच्च अधिकारियों औऱ प्रशासन की नीतियों से जोड़ा गया है। अमृत सिंह और जमील जाफ़र ने किताब में लिखा है कि क़ैदियों के साथ बदसलूकी बुश प्रशासन की नीतियों के बावजूद नहीं बल्कि नीतियों के चलते ही की गई। उनका कहना है कि इस मामले में अमरीकी सेना के आला अप़सरों के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल थे। कुछ सरकारी जाँच एजेंसियों के एजेंट अपनी रिपोर्टों में कैदियों को प्रताड़ित करने की बात लिख कर अधिकारियों को भेजते भी थे लेकिन उनपर कोई अमल नहीं होता था। कैदियों को यातनाएँ दिए जाने का सिलसिला जारी रहा और उसके लिए उच्च अधिकारियों की हिमायत भी जारी रही। जिन आला अफ़सरों के खुलकर नाम लिए गए हैं उनमें पूर्व अमरीकी रक्षा मंत्री डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड, अमरीकी सेना के जनरल माइकल डन्लेवी, मेजर जनरल जेफ़री मिलर और रक्षा मंत्रालय के अन्य कई उच्च अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं। किताब में लिखा गया है, "बुश प्रशासन जनतंत्र और मानवाधिकार के प्रति कटिबद्वता की कसम खाता है लेकिन ये दस्तावेज़ दिखाते हैं कि इस प्रशासन ने क़ैदियों के साथ मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले प्रताड़ना के विभिन्न तरीक़े अपनाए हैं। और इस किताब का मक़सद यही है कि सरकारी दस्तावेज़ों के ज़रिए ही हम सच्चाई अधिक से अधिक लोगों के सामने रखें।" क़ैदियों के साथ बदसलूकी के मामलों में बुश प्रशासन की जांच से भी अमृत सिंह संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि अमरीकी कांग्रेस को चाहिए कि वह इस सारे मामले की गहन जाँच कराए और दोषियों को सज़ा दिलवाए।

सोमवार, 31 दिसंबर 2007

मानव अधिकारों के संघर्ष के रास्ते में नई चुनौती

मानव अधिकार के हनन में लगा महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग---------
वर्ष १९९६ में जब आल इंडिया ह्यूमन राइट्स एंड सिटीझन आफ्शन नामक संस्था की नीव रखी तो उस समय संस्था के उद्देश्यों में महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग की गठन के मांग को सबसे ऊपर रखा गया था । आयोग के गठन की मांग को लेकर संस्था ने वर्ष १९९६ से लेकर जब तक आयोग का गठन नही हो गया तब तक संघर्ष किया, रैलियां की, जनसभाए की, धरने-प्रदर्शन किए राज्य स्तरिय मानव अधिकार आयोग के गठन के लिए ज्ञापन दिए किन्तु यह सब करते समय हमे यह मालूम न था कि महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन हो जाने के पश्चात यह मानव अधिकार आयोग हम जैसे मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्य कर रहे मानव अधिकार कार्यकर्ताओं तथा स्वयंसेवी संगठनों एवं संस्थाओं को कुचलना ही अपना मुख्य उद्देश्य बना लेगा ।इस् विषय का हमे तब पता चला जब महाराष्ट्र के मंत्रालय में मैं उपस्थित था वहाँ मौजूद कुछ सचिव स्तर के अधिकारियों द्वारा महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग को "मलाईदार महकमा" के नाम से संबोधित करते हुए सुना तो हमे यह आभास हो गया कि किस तरह महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है । सरकारी महकमे मसलन पुलिस, महसूल, परिवहन, एवं महानगरपालिका आदि के अधिकारियों के विरुद्ध आयोग में आयी हुई शिकायतों को रफा-दफा करने हेतु सौदे किये जाने लगे है । आम आदमी जो यह समझता था कि कही न्याय मिले न मिले लेकिन मानव अधिकार आयोग में न्याय अवश्य मिलेगा आयोग द्वारा उनके इस् विश्वास को छला जाने लगा । आम आदमी को तो यह पता ही नही था कि उसके द्वारा कि गयी शिकायत मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ के तहत सुनवाई के योग्य है या नही इसका लाभ लेकर आयोग के सदस्यों ने उन सभी शिकायतों को यह कह कर खारिज करना शुरू कर दिया कि यह शिकायत मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ के तहत सुनवाई के योग्य नही है । और तो और पुलिस द्वारा व्यवसायी पर मकोका लगाए जाने के मामले को यह कह कर खारिज कर दिया गया कि यह दीवानी का मामला है । जिन मामलों में वे ऐसा नही कर पाए उन मामलों में शिकायतकर्ताओं को यह कह कर शिकायत पीछे लेने हेतु दबाव डाला जाने लगा कि पुलिस से अथवा सरकारी अधिकारियों से दुश्मनी मत मोल लो शिकायत वापस लेलो नही तो तुम्हे आगे काफी तकलीफ आयेगी, इतना ही नहीं आयोग द्वारा बिचौलिए की भूमिका निभाते हुए पुलिस अधिकारियों से पीड़ित को पैसे दिलाकर मामले को रफा-दफा किये जाने की बात होने लगी है, तथा शिकायतकर्ताओं को बिना सूचित किये सुनवाई बंद की जाने लगी ।मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ में यह कलमबद्ध किया गया है कि मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनो, संस्थाओं को मानव अधिकार आयोगों द्वारा प्रोत्साहित किया जायेगा किन्तु महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग द्वारा स्थिति उलट दी गयी । जब कोई स्वयंसेवी संगठन जो कि मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे है उनके द्वारा रखे गए सेमिनार में वक्ता के रूप में मौजूद आयोग के सदस्य या कर्मचारी मसलन मानव अधिकार हनन के मामलों कि जांच के लिए आयोग में नियुक्त पुलिस अधिकारी अपने भाषण में यह कहना शुरू कर दिया है कि मानव अधिकार आयोग का किसी स्वयंसेवी संगठन या संस्था से कोई संबंध नहीं है यहाँ यह विचारणीय है कि अगर ये आयोग जनसंगठनो या संस्थाओं से संबंधों को नकार रहे है तो क्या वे आम जनता के मानव अधिकारों के लिए कार्य करेगे ? इसमें संशय है । आयोग के सदस्य और कर्मचारीगण स्वयम यह साबित करना शुरू कर दिया है कि "मानव अधिकार जो कि आम नागरिक का मुद्दा था उसे व्यवस्था द्वारा हड़प लिया गया है" उन्होने मानव अधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनो तथा संस्थाओं पर हमले तेज कर दिए है उनके इन हमलों से पता चलता है कि मानव अधिकार आयोगों को ऐसे गैर सरकारी संगठन या संस्था जो कि मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत है और आयोग के क्रियाकलापों पर नजर रख सकते है उनके द्वारा गलत किये जाने पर ऊँगली भी उठा सकते है ।
दु:ख की बात यह है की महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग इससे भी दो कदम आगे जाकर मानव अधिकारों के क्षेत्र में पिछले १५ वर्षों से कार्यरत मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस के माध्यम से झूठे एफ.आई.आर. दर्ज कराने शुरू कर दिए है तथा मानव अधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों की जांच के नाम पर संगठनों, संस्थाओं के कार्यकर्ताओं को प्रताडित करना शुरू कर दिया है । यह सब आयोग में बैठे आयोग के सदस्यों एवं आयोग के जांच विभाग में बैठाये गए पुलिस कर्मचारियों के इशारे पर हो रहा है आयोग के सदस्य के द्वारा तो यहाँ तक कहते सुना गया है कि ऐसे सभी स्वयं सेवी संगठनों को बंद कराना है जो मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे है । प्रश्न यह है कि आखिर महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग की मंशा क्या है मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध झूठे एफ।आई.आर. दर्ज कराने से लेकर, जांच के नाम पर मानव अधिकार संगठनों को प्रताडित करना क्या यही मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ का उद्देश्य था, क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानव अधिकार विश्वघोषणा का उद्देश्य यही है ? जो महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग का उद्देश्य बनता नजर आ रहा है जब रक्षक भक्षक बन जाये तो उसके विरुद्ध उठ खडे हो जाना नितांत आवश्यक हो जाता है । ब्यवस्था की खामियों से संघर्ष करना ही मानव अधिकार आंदोलनों का पहला चरण है अब वह समय आ गया है जब हम सभी मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनो एवं संस्थाओं तथा कार्यकर्ता एकजुट हों और महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग द्वारा भारी पैमाने पर किये जा रहे मानव अधिकार हनन के विरुद्ध संघर्ष शुरू करे ।

रविवार, 16 दिसंबर 2007

संघर्ष के दायरे

भारत मे नागरिक अधिकार आन्दोलन की शुरुआत स्वतंत्रता के के पहले ही हो गई थी । वर्ष १९३६ मे सिविल लिबर्टीज यूनियन (सी. एल. यू.) का गठन हुआ था इसके गठन मे पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रमुख भूमिका रही पर आजादी मिलने के कुछ वर्षों के भीतर ही सी. एल. यू. निष्क्रिय एवं अंततः समाप्त हो गई इसका मुख्य कारण नेहरू एवं अन्य अधिकांश नेताओं का यह खयाल था कि स्वतंत्रता मिल जाने और लोकतांत्रिक संविधान लागू नो जाने के बाद नागरिक अधिकार आन्दोलन की आवश्यकता नही रह गई है ।इसके बाद १९६० के दशक मे कुछ संगठन बने इनमे पश्चिम बंगाल मे एसोसिएशन फार द प्रोटेक्शन आफ डेमोक्रेटिक राइट्स ( ए. पी. डी. आर. ), आन्ध्र प्रदेश मे आन्ध्र प्रदेश सिविल लिबर्टीज कमेटी ( ए. पी. सी. एल. सी. ), और पंजाब मे एसोसिएशन फार द डेमोक्रेटिक राइट्स ( ए. एफ. डी. आर.), प्रारंभिक है । इन संगठनों ने ग्रामीण इलाको मे दमन और शोषण के मुद्दे उठाए तथा राज्य की शक्ति से संघर्ष भी किया । लेकिन व्यापक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार आन्दोलन को स्वरूप देने एवं राज्य व्यवस्था के वास्तविक चरित्र का खुलासा करने मे इनकी भूमिका सीमित ही रही ।देश मे पहला राष्ट्रीय स्तर का मानवाधिकार संगठन जयप्रकाश नारायण की पहल और प्रेरणा से १९७५ मे बना यह था पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज एंड डेमोक्रेटिक राइट्स ( पी. यू. सी. एल. डी. आर. ) इस संगठन ने आपात काल के पहले और आपात काल के दौरान इंदिरा गाँधी के नेतृत्व मे सामने आए भारतीय राज्य के तानाशाही स्वरूप से प्रभावशाली संघर्ष किया लेकिन १९७७ मे इंदिरा गाँधी की पराजय और जनता पार्टी की सरकार के सत्ता मे आने के साथ ही यह संगठन भी लगभग निष्क्रिय हो गया । कारण यह रहा की संगठन के नीति निदेशकों सहित भारी पैमाने पर इसके सक्रिय कार्यकर्ताओं को सत्ता का सुख मिल गया अर्थात संसद मे पहुच गए और सरकार मे भी शामिल हो गए तो उन्हें ऐसा लगा कि हम सत्ता मे पहुचे तो लोकतंत्र स्थापित हो गया, बात को और स्पष्ट करें तो यह धारणा बन गई कि लोकतंत्र कि बहाली के बाद अब नागरिक और लोकतांत्रिक अधिकार के संघर्षों कि आवश्यकता नही रह गई है । बहरहाल १९८० मे इंदिरा गाँधी के सत्ता मे वापस आते ही यह धारणा टूट गई । तब दिल्ली मे (पी. यू. सी. एल. डी. आर. ) का सम्मेलन बुलाया गया इस सम्मेलन मे यह संगठन विभाजित हो गया पी.यू. सी. एल. और पी. यू. डी. आर. नामके दो संगठन आस्तित्व में आए पी.यू.सी.एल. का सांगठनिक ढांचा राष्ट्रीय स्तर का रहा जबकि पी.यू.डी.आर. का दिल्ली आधारित ८० के दशक में भारतीय राज्य व्यवस्था के गहराते संकठ के साथ देश के विभिन्न इलाकों में कई और मानवाधिकार संगठन बने उनमे अनेक आज भी सक्रिय है । और मानवाधिकार आन्दोलन में अपनी भूमिका निभा रहे है ।मौजूदा समय में मानवाधिकार आन्दोलन के सामने अनेक चुनौतियां है ऐसे अनेक क्षेत्र है जिनका मानवाधिकार से सीधा संबंध है । और जिनमे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को काम करना चाहिए मानवाधिकारों की रक्षा तभी हो सकती है जब उसके लिए उपयुक्त सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, एवं सांस्कृतिक परिस्थितियाँ हों एक वाक्य में कहे तो इन अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण के लिए काम करना मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कार्य है । दरसल हमारे जैसे समाजों में मानवाधिकार एक संभावना ही बने हुए है यथार्थ में इन्हें उतरना अभी बाकी है । क्या भारतीय मानवाधिकार संगठन यह कार्य कर पा रहे है ? अगर नही तो उसके क्या कारण है ? आइए इस प्रश्न की विवेचना करे ।सबसे पहले हमे यह ध्यान रखना होगा कि भारत में मानवाधिकार आन्दोलन भले ही तीन दशक पुराना हो गया हो पर अभी यह शैशवावस्था में ही है । ऊपर यह बताया जा चुका है कि मानवाधिकार आन्दोलन की कोई स्वतंत्र एवं देसी विचारधारा अभी विकसित नही की जा सकी है । पर अब यह महसूस किया जा रहा है । काफी संख्या में मानवाधिकार कार्यकर्ता इसकी बेहद जरूरत महसूस करने लगे है । जाहिर है इस दिशा में बहुत ही आरंभिक स्तर पर ही सही लेकिन चिंतन मनन की प्रक्रिया शुरू हो गई है । गैट वार्ता और विश्वबाज़ार संगठन के गठन, विश्वबैंक एवं एशियाटिक बैंक की नीतियाँ, एवं उसकी कार्य सूचियों के संदर्भ में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के वीच हुई तीखी बहस इसका प्रमाण है ऐसी ही बहस पर्यावरण एवं विकास की नीति से जुडे मुद्दों पर भी देखने को मिली पिछले तीन दशकों में भारतीय राज्य व्यवस्था के निरंकुश कदमों के गंभीर संकठ पैदा होते रहे और उनपर तात्कालिक प्रतिक्रिया एवं कार्य करने की मजबूरीयों के बीच भी अगर बहस आज इस् स्तर पर पहुंच चुकी है तो यह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के सक्रियता की देन है एवं इसे आशाजनक कहा जा सकता है ।
मानवाधिकार संगठनो को किन सीमाओं और सीमित संसाधनों के बीच काम करना पड़ता है इसपर भी ध्यान देना जरुरी है । तीन दशक पहले पी.यू.सी.एल.डी.आर. की स्थापना के समय बड़ी संख्या में लोग उसमे सामिल हो गए उसमे समाज के सम्पन्न तबकों के लोग भी थे विचार धारा की वैसी स्पष्टता भी नहीं थी एक तरह से तब यह संगठन आपातकाल और इंदिरा गाँधी की निरंकुशता के खिलाफ एक मोर्चा बन गया था जनसंघ यानी आज की भारतीय जनता पार्टी से जुडे लोग भी उसमे थे जाहिर है की तब इसका प्रसार ज्यादा था, लेकिन जब मुद्दे बदल गए तो वह बात नही रही । व्यवस्था का संकट जैसे-जैसे गंभीर होता गया मानवाधिकारों की अवधारणा स्पष्ट होती गई और हितों के टकराव के बीच किसका साथ देना है । यह प्रतिबद्धता साफ होती गई, यथास्थितिवादी एवं प्रक्रियावादी लोग इससे अलग हो गए खासकर पंजाब और कश्मीर के समस्याओं के संदर्भ में ए प्रक्रियाए तिब्रता से हुई । ऐसे में संगठन का सीमित होना स्वाभाविक था मगर इन प्रक्रियाओं से मानवाधिकार की अधिक सुसंगत समझ बनी और मानवाधिकार संगठनों के सामने अधिक स्पष्ट विचारधारा एवं कार्यसूची आगई इसलिए बाद के दिनों में इन्होने भले ही कम कार्य किये पर वे अधिक प्रभावशाली साबित हुए ।

शनिवार, 15 सितंबर 2007

मानव अधिकारों के संघर्ष को कुचलने हेतु सरकारें सिद्दत से जुटी है

मानव अधिकारों के संघर्ष को कुचलने हेतु सरकारें सिद्दत से जुटी है


न केवल मानव अधिकार कार्यकर्ता और शिशु रोग विशेषज्ञ डा विनायक सेन को छत्तीसगढ़ सरकार प्रताड़ित कर रही है बल्कि आज पुरे देश में मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया जा रहा है. पुलिस अपराधियों के बजाय मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को अपना दुश्मन नम्बर 1, मान रही है. पुलिस जब मानव अधिकारों का हनन करती है तो राजनेताओं सहित तमाम लोग यह कहते हुए सुने जाते है की मुद्दे को उछालने से पुलिस का मनोबल गिरेगा उन्हें देश के नागरिकों के मनोबल की चिन्ता नही है. हमारा देश जब गुलाम था उस समय अंग्रेजों ने भारतीय पुलिस की रचना आम भारतीयों को कायर बनाने के लिए किया था इस दिशा में पुलिस आज भी तल्लीनता से जुटी है. इधर सन १९९६ में अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते भारत सरकार ने "the Protection of Human Rights Act." बिल संसद में पास किया जिसका मकसद था देश के आम नागरिक के मानव अधिकारों की रक्षा करने और ऐसे स्वयं सेवी संगठनो (NGOs) एवं (Activisto) कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन देना जो मानव अधिकारों के रक्षा के एवं उसके प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रहे है किंतु यह करके मानव अधिकार जो की आम नागरिक का मुद्दा था भारत सरकार ने हड़प लिया आज स्थिति यह है की राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं राज्यस्तरीय मानव अधिकार आयोग, आयोग नही बल्कि लालफीताशाही के प्रतीक बनकर रह गए है जो पुलिस मानव अधिकारों का हनन कर रही है वही पुलिस मानव अधिकार के हनन के मामले के जांच के लिये आयोग में बैठा दी गई है ( यानि घोडा घास की रखवाली के लिए नियुक्त है ) और आयोग में पहुची शिकायतों की लीपापोती करके शिकायतकर्ता को थकाकर अथवा पुलिस का डर दिखा कर चुप करा दिया जा रहा है. इतना ही नही अगर कोई मानव अधिकार कार्यकर्त्ता के खिलाफ झूठी सिकायत इन मानव अधिकार अयोगो को कर रहा है तो ये आयोग मानव अधिकार कार्यकर्ता के खिलाफ तत्काल कड़ी कार्रवाई के लिए हायर पुलिस अधिकारी को पत्र लिख रहे है और पुलिस अयोगो का इशारा पाते ही मानव अधिकार कार्यकर्ता पर भूखे शिकारी की तरह टूट पड़ती है यह सब योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध राष्ट्रिय स्तर पर षड्यंत्र रचने और उन्हें कुचलने के लिए जो करवाईयां की जा रही है वे विचलित करने वाली है आये दिन इन्हे extortion, personation, imprisonment for life or other imprisonment, unlawful organisation prohibition act, आदि तमाम कानूनों के तहत देश भरके मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को फसाया जा रहा है इस विषय पर मिडिया भी अपवाद के रूप एकाध मामलों को छोड़ कर मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ घटीं पुरी घटना को जानने के बजाय पुलिस अधिकारीयों के बयानों को जनता के समक्ष पेश कर रही है जिसमे मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को विलेन के रूप में दिखाया जा रहा है. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है की इतने पर भी देश के सभी मानव अधिकार कार्यकर्ता एकजुट नही हो रहे है आज मुद्दा मानव अधिकारों के हनन को रोकने का नही बल्कि मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के अस्तित्व को बचाने का है. क्योकि यही ओ लोग है जो व्यवस्था में अंकुश-संतुलन को कायम रखने का कार्य करते है यही आम जनता के बीच जाकर उनके मानव अधिकारों के सुरक्षा के लिए कार्य कर रहे है