इस् ब्लॉग के माध्यम से मैं कोशिश करूँगा कि एकत्र किए गये आलेखों से लोगों के समक्ष मानव अधिकारों से जुड़ी हुई बातें एवं हनन के मामलों को ला सकूं
शनिवार, 2 फ़रवरी 2008
न्यायपालिका और गरीब
बुधवार, 2 जनवरी 2008
मानव अधिकार हनन के मामले पर मनमोहन की बेटी ने बुश प्रशासन को घेरा
"बुश प्रशासन जनतंत्र और मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता की क़सम खाता है लेकिन ये दस्तावेज़ दिखाते हैं कि इस प्रशासन ने क़ैदियों के साथ मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाले प्रताड़ना के विभिन्न तरीक़े अपनाए हैं. और इस किताब का मक़सद यही है कि सरकारी दस्तावेज़ों के ज़रिए ही हम सच्चाई अधिक से अधिक लोगों के सामने रखें"
इस नई किताब में कहा गया है कि बुश प्रशासन के यह कहने के बावजूद कि कैदियों को प्रताड़ित किए जाने के छिटपुट मामले ही हुए हैं, उसी के सरकारी दस्तावेज़ दूसरी ही कहानी कहते हैं। अमृत सिंह कहती हैं, "एक दस्तावेज़ जिसको अलबर्टो गोंज़ालेज़ ने लिखा था उसमें कहा गया है कि चूँकि अमरीका आतंकवाद से जूझ रहा है इसलिए जिनेवा कन्वेंशन के हिसाब से काम करना ज़रूरी नहीं है। और जो क़ैदी अमरीका ने पकड़े हैं उन पर जिनेवा कन्वेंशन के नियम लागू नहीं होते।" किताब के मुताबिक प्रताड़ना के मामले व्यापक पैमाने पर सामने आए हैं जिनमें सिर्फ़ इराक की अबू ग़रेब जेल, अफ़ग़ानिस्तान और ग्वांतानामो बे ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों की जेलों में क़ैदियों के साथ दुर्व्यहवार किया गया। अमृत सिंह का कहना है कि अगर अबू ग़रेब जेल की तस्वीरें सामने न आतीं तो क़ैदियों को यातनाएँ देने और प्रताड़ित करने के बारे में अंतरराष्ट्रीय सुमदाय को जानकारी न मिलती. अमृत सिंह का कहना है, "हैरत की बात यह थी कि एक मामले में तो कुछ एफ़बीआई के एजेंटों ने सैनिकों की इन कार्रवाई को देखकर कहा भी कि इस तरह प्रताड़ना देना ग़ैरक़ानूनी है, अनैतिक है और बेमतलब है. लेकिन यातनाएँ दी जाती रहीं. इस तरह बुश प्रशासन का सीधे तौर पर इस मामले में हाथ नज़र आता है." कुल 456 पन्नों की इस किताब में कई जेलों में क़ैदियों को तरह-तरह से यातनाएँ दिए जाने के मामलों को विस्तार से छापा गया है. एक लाख से ज़्यादा सरकारी दस्तावेज़ों का इस्तेमाल इस किताब में किया गया है जिनके आधार पर प्रताड़ना के इन मामलों में बुश प्रशासन की नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. जिन दस्तावेज़ों का इस्तेमाल इस किताब में किया गया है उनमें से करीब 350 दस्तावेज़ तो असली शक्ल में हू-ब-हू वैसे ही छापे गए है .
सोमवार, 31 दिसंबर 2007
मानव अधिकारों के संघर्ष के रास्ते में नई चुनौती
वर्ष १९९६ में जब आल इंडिया ह्यूमन राइट्स एंड सिटीझन आफ्शन नामक संस्था की नीव रखी तो उस समय संस्था के उद्देश्यों में महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग की गठन के मांग को सबसे ऊपर रखा गया था । आयोग के गठन की मांग को लेकर संस्था ने वर्ष १९९६ से लेकर जब तक आयोग का गठन नही हो गया तब तक संघर्ष किया, रैलियां की, जनसभाए की, धरने-प्रदर्शन किए राज्य स्तरिय मानव अधिकार आयोग के गठन के लिए ज्ञापन दिए किन्तु यह सब करते समय हमे यह मालूम न था कि महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग का गठन हो जाने के पश्चात यह मानव अधिकार आयोग हम जैसे मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्य कर रहे मानव अधिकार कार्यकर्ताओं तथा स्वयंसेवी संगठनों एवं संस्थाओं को कुचलना ही अपना मुख्य उद्देश्य बना लेगा ।इस् विषय का हमे तब पता चला जब महाराष्ट्र के मंत्रालय में मैं उपस्थित था वहाँ मौजूद कुछ सचिव स्तर के अधिकारियों द्वारा महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग को "मलाईदार महकमा" के नाम से संबोधित करते हुए सुना तो हमे यह आभास हो गया कि किस तरह महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है । सरकारी महकमे मसलन पुलिस, महसूल, परिवहन, एवं महानगरपालिका आदि के अधिकारियों के विरुद्ध आयोग में आयी हुई शिकायतों को रफा-दफा करने हेतु सौदे किये जाने लगे है । आम आदमी जो यह समझता था कि कही न्याय मिले न मिले लेकिन मानव अधिकार आयोग में न्याय अवश्य मिलेगा आयोग द्वारा उनके इस् विश्वास को छला जाने लगा । आम आदमी को तो यह पता ही नही था कि उसके द्वारा कि गयी शिकायत मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ के तहत सुनवाई के योग्य है या नही इसका लाभ लेकर आयोग के सदस्यों ने उन सभी शिकायतों को यह कह कर खारिज करना शुरू कर दिया कि यह शिकायत मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ के तहत सुनवाई के योग्य नही है । और तो और पुलिस द्वारा व्यवसायी पर मकोका लगाए जाने के मामले को यह कह कर खारिज कर दिया गया कि यह दीवानी का मामला है । जिन मामलों में वे ऐसा नही कर पाए उन मामलों में शिकायतकर्ताओं को यह कह कर शिकायत पीछे लेने हेतु दबाव डाला जाने लगा कि पुलिस से अथवा सरकारी अधिकारियों से दुश्मनी मत मोल लो शिकायत वापस लेलो नही तो तुम्हे आगे काफी तकलीफ आयेगी, इतना ही नहीं आयोग द्वारा बिचौलिए की भूमिका निभाते हुए पुलिस अधिकारियों से पीड़ित को पैसे दिलाकर मामले को रफा-दफा किये जाने की बात होने लगी है, तथा शिकायतकर्ताओं को बिना सूचित किये सुनवाई बंद की जाने लगी ।मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ में यह कलमबद्ध किया गया है कि मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनो, संस्थाओं को मानव अधिकार आयोगों द्वारा प्रोत्साहित किया जायेगा किन्तु महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग द्वारा स्थिति उलट दी गयी । जब कोई स्वयंसेवी संगठन जो कि मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे है उनके द्वारा रखे गए सेमिनार में वक्ता के रूप में मौजूद आयोग के सदस्य या कर्मचारी मसलन मानव अधिकार हनन के मामलों कि जांच के लिए आयोग में नियुक्त पुलिस अधिकारी अपने भाषण में यह कहना शुरू कर दिया है कि मानव अधिकार आयोग का किसी स्वयंसेवी संगठन या संस्था से कोई संबंध नहीं है यहाँ यह विचारणीय है कि अगर ये आयोग जनसंगठनो या संस्थाओं से संबंधों को नकार रहे है तो क्या वे आम जनता के मानव अधिकारों के लिए कार्य करेगे ? इसमें संशय है । आयोग के सदस्य और कर्मचारीगण स्वयम यह साबित करना शुरू कर दिया है कि "मानव अधिकार जो कि आम नागरिक का मुद्दा था उसे व्यवस्था द्वारा हड़प लिया गया है" उन्होने मानव अधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले गैर सरकारी संगठनो तथा संस्थाओं पर हमले तेज कर दिए है उनके इन हमलों से पता चलता है कि मानव अधिकार आयोगों को ऐसे गैर सरकारी संगठन या संस्था जो कि मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत है और आयोग के क्रियाकलापों पर नजर रख सकते है उनके द्वारा गलत किये जाने पर ऊँगली भी उठा सकते है ।
दु:ख की बात यह है की महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग इससे भी दो कदम आगे जाकर मानव अधिकारों के क्षेत्र में पिछले १५ वर्षों से कार्यरत मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस के माध्यम से झूठे एफ.आई.आर. दर्ज कराने शुरू कर दिए है तथा मानव अधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों की जांच के नाम पर संगठनों, संस्थाओं के कार्यकर्ताओं को प्रताडित करना शुरू कर दिया है । यह सब आयोग में बैठे आयोग के सदस्यों एवं आयोग के जांच विभाग में बैठाये गए पुलिस कर्मचारियों के इशारे पर हो रहा है आयोग के सदस्य के द्वारा तो यहाँ तक कहते सुना गया है कि ऐसे सभी स्वयं सेवी संगठनों को बंद कराना है जो मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे है । प्रश्न यह है कि आखिर महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग की मंशा क्या है मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध झूठे एफ।आई.आर. दर्ज कराने से लेकर, जांच के नाम पर मानव अधिकार संगठनों को प्रताडित करना क्या यही मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ का उद्देश्य था, क्या संयुक्त राष्ट्रसंघ के मानव अधिकार विश्वघोषणा का उद्देश्य यही है ? जो महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग का उद्देश्य बनता नजर आ रहा है जब रक्षक भक्षक बन जाये तो उसके विरुद्ध उठ खडे हो जाना नितांत आवश्यक हो जाता है । ब्यवस्था की खामियों से संघर्ष करना ही मानव अधिकार आंदोलनों का पहला चरण है अब वह समय आ गया है जब हम सभी मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनो एवं संस्थाओं तथा कार्यकर्ता एकजुट हों और महाराष्ट्र राज्य मानव अधिकार आयोग द्वारा भारी पैमाने पर किये जा रहे मानव अधिकार हनन के विरुद्ध संघर्ष शुरू करे ।
रविवार, 16 दिसंबर 2007
संघर्ष के दायरे
शनिवार, 15 सितंबर 2007
मानव अधिकारों के संघर्ष को कुचलने हेतु सरकारें सिद्दत से जुटी है
न केवल मानव अधिकार कार्यकर्ता और शिशु रोग विशेषज्ञ डा विनायक सेन को छत्तीसगढ़ सरकार प्रताड़ित कर रही है बल्कि आज पुरे देश में मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया जा रहा है. पुलिस अपराधियों के बजाय मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को अपना दुश्मन नम्बर 1, मान रही है. पुलिस जब मानव अधिकारों का हनन करती है तो राजनेताओं सहित तमाम लोग यह कहते हुए सुने जाते है की मुद्दे को उछालने से पुलिस का मनोबल गिरेगा उन्हें देश के नागरिकों के मनोबल की चिन्ता नही है. हमारा देश जब गुलाम था उस समय अंग्रेजों ने भारतीय पुलिस की रचना आम भारतीयों को कायर बनाने के लिए किया था इस दिशा में पुलिस आज भी तल्लीनता से जुटी है. इधर सन १९९६ में अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते भारत सरकार ने "the Protection of Human Rights Act." बिल संसद में पास किया जिसका मकसद था देश के आम नागरिक के मानव अधिकारों की रक्षा करने और ऐसे स्वयं सेवी संगठनो (NGOs) एवं (Activisto) कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन देना जो मानव अधिकारों के रक्षा के एवं उसके प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रहे है किंतु यह करके मानव अधिकार जो की आम नागरिक का मुद्दा था भारत सरकार ने हड़प लिया आज स्थिति यह है की राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं राज्यस्तरीय मानव अधिकार आयोग, आयोग नही बल्कि लालफीताशाही के प्रतीक बनकर रह गए है जो पुलिस मानव अधिकारों का हनन कर रही है वही पुलिस मानव अधिकार के हनन के मामले के जांच के लिये आयोग में बैठा दी गई है ( यानि घोडा घास की रखवाली के लिए नियुक्त है ) और आयोग में पहुची शिकायतों की लीपापोती करके शिकायतकर्ता को थकाकर अथवा पुलिस का डर दिखा कर चुप करा दिया जा रहा है. इतना ही नही अगर कोई मानव अधिकार कार्यकर्त्ता के खिलाफ झूठी सिकायत इन मानव अधिकार अयोगो को कर रहा है तो ये आयोग मानव अधिकार कार्यकर्ता के खिलाफ तत्काल कड़ी कार्रवाई के लिए हायर पुलिस अधिकारी को पत्र लिख रहे है और पुलिस अयोगो का इशारा पाते ही मानव अधिकार कार्यकर्ता पर भूखे शिकारी की तरह टूट पड़ती है यह सब योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध राष्ट्रिय स्तर पर षड्यंत्र रचने और उन्हें कुचलने के लिए जो करवाईयां की जा रही है वे विचलित करने वाली है आये दिन इन्हे extortion, personation, imprisonment for life or other imprisonment, unlawful organisation prohibition act, आदि तमाम कानूनों के तहत देश भरके मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को फसाया जा रहा है इस विषय पर मिडिया भी अपवाद के रूप एकाध मामलों को छोड़ कर मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ घटीं पुरी घटना को जानने के बजाय पुलिस अधिकारीयों के बयानों को जनता के समक्ष पेश कर रही है जिसमे मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को विलेन के रूप में दिखाया जा रहा है. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है की इतने पर भी देश के सभी मानव अधिकार कार्यकर्ता एकजुट नही हो रहे है आज मुद्दा मानव अधिकारों के हनन को रोकने का नही बल्कि मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के अस्तित्व को बचाने का है. क्योकि यही ओ लोग है जो व्यवस्था में अंकुश-संतुलन को कायम रखने का कार्य करते है यही आम जनता के बीच जाकर उनके मानव अधिकारों के सुरक्षा के लिए कार्य कर रहे है