बुधवार, 17 जून 2009

महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग जाँच के दायरे में

महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग के काम-काज की जांच मुंबई हाईकोर्ट करेगा, मानवाधिकार आयोग में मानवाधिकार उल्लंघन के बारे में कोई करवाई न किए जाने को लेकर तथा आयोग के सदस्यों द्वारा नियमित तौर पर की गई अनियमितताओं पर एक जनहित याचिका दायर की गयी थी । इस याचिका के लिए सूचना अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त की गई थी याचिका में कहा गया था कि जून २००८ तक २८,०८३ मामले दायर किए गए थे । परन्तु आयोग नें कारवाई का आदेश केवल ३९ मामलों में दोषी अधिकारियों के खिलाफ दिया है । मानवाधिकार उल्लंघन के मामले शिकायतकर्ताओं नें दायर किए थे ये मामले राज्य के विरुद्ध थे जिसमें सरकारी अधिकारी भी शामिल थे ।
आयोग नें २४०७१ मामले निपटाए तथा जून २००८ तक ४०१२ मामले निपटाने बाकी थे याचिका में कहा गया था कि २४०३२ मामलों को विचारणीय न माना जाना अजीब लगता है । इसका अर्थ यह हुआ कि केवल ०।१६ प्रतिशत मामलों में ही मानवाधिकार उल्लंघन के केस साबित हो पाए क्या बाकी बकवास थे ? यह याचिका व्यवसायी व समाजसेवी पुष्कर दामले नें दायर की थी । जो हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार तथा एस।सी. धर्माधिकारी की खंडपीठ में गुरुवार को सुनवायी हेतु आयी थी । खंडपीठ नें इस याचिका पर राज्य सरकार से ३ सप्ताह के भीतर उत्तर देने को कहा है । याचिका में बताया गया है कि राज्य सरकार नें वर्ष १९९३ के मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के वर्ष २००६ के संशोधन के प्रावधानों को लागू करने का कोई प्रयास नहीं किया इस परिवर्तन से किसी भी उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता तथा ४ सदस्यों वाले आयोग में मात्र एक अध्यक्ष तथा दो सदस्य रखे जाने थे पर वर्ष २००६ में आयोग केवल एक अध्यक्ष सी।एल। थूल की अध्यक्षता में ६ माह तक काम करता रहा ।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि २३.११.२००६ में इसके लागू होने से पूर्व महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में गठित कमेटी नें ३ सदस्यों का चयन किया इनकी नियुक्ति राज्यपाल नें वास्तव में १०.११.२००६ में की थी । अब तक जो सदस्य कार्यरत रहे उनमें टी।सिंगार्वेल ( नागपुर के पूर्व पुलिस आयुक्त ) सुभाष लाला ( मुख्यमंत्री के पूर्व निजी सहायक) तथा विजय मुंशी ( उच्च न्यायलय के पूर्व जज ) याचिका में कहा गया है कि परिवर्तित एच.आर. एक्ट अभी तक महाराष्ट्र सरकार नें लागू नहीं किया है । याचिका में कहा गया है कि अपनी नियुक्ति के एक दिन बाद ही एक सदस्य कैंसर सर्जरी के लिए अवकाश पर चला गया । इस सदस्य के इलाज पर राज्य सरकार के ६।२५ लाख रूपये खर्च हुए एक अन्य सदस्य नें निर्देशों का उल्लंघन करके अपनी पत्नी के साथ अत्यधिक यात्रायें की ।

रविवार, 7 जून 2009

अनुकंपा नियुक्ति पाना व्यक्ति का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति पाना व्यक्ति का अधिकार नहीं है। अनुकंपा नियुक्ति कमाऊ व्यक्ति की अचानक हुई मौत से परिवार को होने वाले वित्तीय संकट से उबारने के लिए दी जाती है। यह नौकरी में भर्ती का जरिया नहीं हो सकती और न ही इसे कोई उपहार या सरकारी नौकरी पाने का अधिकार माना जा सकता है। यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 18 वर्ष पहले लापता हुए सिपाही के बेटे की अनुकंपा नियुक्ति की मांग खारिज कर दी है। यह फैसला न्यायमूर्ति मुकुंदकम शर्मा व न्यायमूर्ति बी. एस. चौहान की पीठ ने उत्तर प्रदेश के संतोष कुमार दुबे की याचिका खारिज करते हुए सुनाया है। इसके पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट भी संतोष की मांग ठुकरा चुका है।
इस मामले में संतोष के पिता वर्ष 1981 में लापता हो गए थे। वे सिपाही थे। उसकी मां ने लापता होने के सात साल बाद याचिका दाखिल कर पति की नौकरी के लाभ व पैसा दिलाए जाने की मांग की। कोर्ट ने सिपाही को लापता हुए सात वर्ष बीत चुकने के कारण मरा मानते हुए वर्ष 1999 में पत्नी के हक में आदेश पारित कर दिया। संतोष ने भी याचिका दाखिल कर अनुकंपा नियुक्ति की मांग की। राज्य सरकार ने याचिका का पुरजोर विरोध किया और कहा कि निर्धारित नियमों के मुताबिक संतोष को अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जा सकती क्योंकि उसके पिता को बिना बताए गैरहाजिर रहने पर नौकरी से बर्खास्त किया गया था। जबकि संतोष के वकील का कहना था कि जब कोर्ट के आदेश पर उसकी मां को वर्ष 1999 में लाभ दिए गए तो फिर उसकी याचिका को देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सेवा के कर्मचारियों के आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति दिए जाने के नियमों पर विचार किया जिसमें अन्य आधारों के साथ एक आधार यह भी था कि मरने वाले के आश्रित मृत्यु के पांच वर्षो के अंदर अनुकंपा नियुक्ति की अर्जी देंगे। पीठ ने नियमों का विश्लेषण करते हुए कहा कि पांच वर्ष के भीतर अर्जी दी जानी चाहिए थी। संतोष के पिता वर्ष 1981 में लापता हुए। सात वर्ष की अवधि 1988 में पूरी होती है (किसी व्यक्ति के सात वर्ष तक लापता रहने पर कानून में उसे मरा मान लिया जाता है)। इसके बाद 1993 में पांच वर्ष और हो जाते हैं। याचिकाकर्ता को वर्ष 1993 तक अर्जी दे देनी चाहिए थी।
कोर्ट ने कहा कि सिपाही के लापता होने के 18 साल बाद तक परिवार का गुजारा चलता रहा और सफलतापूर्वक आर्थिक संकट से उबर गया। इन परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें याचिकाकर्ता को अनुकंपा नियुक्ति दिए जाने का निर्देश पारित करने का आधार नहीं लगता और इस मामले में लागू नियम भी उन्हें ऐसा निर्देश जारी करने की अनुमति नहीं देते हैं।
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शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

संगठन द्वारा दिनांक ०९/११/२००८ को मुंबई के मालाड तालुका कमिटी द्वारा रखे गये मुफ्त आरोग्य शिविर का उद्धाटन

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

जरूरी है सूचना के अधिकारों का इस्तेमाल

सरकारी कार्यालयों में अक्सर लोगों का काम अटकाने का मामला सामने आता रहता है आम आदमी को इस समस्या से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से भारत सरकार नें वर्ष २००५ में राइट्स टू इन्फार्मेशन एक्ट ( आर. टी. आई ) कानून बनाया । जम्मू-कश्मीर को छोड़ कर यह कानून देश के सभी हिस्सों में लागू है । देश का कोई भी नागरिक इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है । इस कानून के जरिये अपने काम से सम्बंधित जानकारी पा सकता है इस विषय में कुछ खास जानकारियां इस प्रकार है ।
आरटीआई कानून का मकसद :- इस कानून का मकसद सार्वजनिक विभागों के कामों की जवाबदेही तय करना और पारदर्शिता लाना ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके । इसके लिए सरकार नें केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों का गठन भी किया है ।
आरटीआई कानून के दायरे में आने वाले विभाग :- सरकारी दफ्तर, पीएसयू, अदालतें, संसद व विधानमंडल, स्थानीय संस्थाए, सरकारी बैंक, सरकारी अस्पताल, बीमा कम्पनियाँ, चुनाव आयोग, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, और राष्ट्रपति कार्यालय आदि आरटीआई कानून के दायरे में आते है । इनके आलावा वैसे एनजीओ जो सरकार से फंडिंग प्राप्त करते हों, पुलिस, सीबीआई व सेना के तीनों अंगों की सामान्य जानकारी भी इस कानून के तहत ली जा सकती है ।
इनपर आरटीआई कानून नहीं लागू होता :- किसी भी खुफिया एजेंसी की वैसी जानकारियां जिनके सार्वजनिक होने से देश की सुरक्षा व अखंडता को खतरा हो, को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है । लेकिन मानवाधिकार उल्लंघन होने व इन संस्थाओं में भ्रष्टाचार के मामलों की जानकारी ली जा सकती है । अन्य देशों के साथ भारत के सम्बन्ध से जुड़े मामलों की जानकारी को भी इस कानून से अलग रखा गया है साथ ही साथ निजी संस्थाओं को भी इस दायरे से बाहर रखा गया है । लेकिन इन संस्थाओं की सरकार के पास उपलब्ध जानकारी को सम्बंधित विभाग के माध्यम से हासिल किया जा सकता है ।
क्या है थर्ड पार्टी :- आरटीआई कानून में थर्ड पार्टी का जिक्र है । इसके तहत वैसी प्राइवेट कंपनियां आती है, जो सरकार से मदद नहीं लेती है और जो सूचना के अधिकार कानून के दायरे में नहीं आती । इन कंपनियों के बारे में जानकारी सिर्फ़ सरकारी विभागों के माध्यम से मांगी जा सकती है, लेकिन वे कंपनिया सीधे जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं है ।
कहां करे अप्लाई :- सम्बंधित विभागों में पब्लिक इन्फारमेंशन आफिसर को एक ऍप्लिकेशन देकर इच्छित जानकारी मांगी जा सकती है . इसके लिए सरकार नें सभी विभागों में एक पब्लिक इन्फार्मेशन आफिसर यानी पीआईओ की नियुक्ति की है . उसकी सहायता के लिए एपीआईओ भी होता है .
कैसे करें अप्लाई :- सादे कागज पर हाँथ से लिखी हुई या टाईप की गई अप्लिकेशन के जरिये से जानकारी मांगी जा सकती है । वैसे कुछ राज्यों को छोड़ कर सभी राज्यों में इसके फार्म मुफ्त में मिलते है । आरटीआई अप्लिकेशन के साथ १० रूपये की फीस भी जमा करानी होती है ।
अप्लिकेशन में क्या लिखें :- क्या सूचना चाहिए, कितनी अवधि की सूचना चाहिए, अपना नाम, पता, फ़ोन या मोबाईल नम्बर, ताकि सूचना देने वाला विभाग आपसे संपर्क कर सके । इसके अलावा फीस का विवरण भी देना होता है । अगर सूचना मांगने वाला गरीबी रेखा के नीचे आता है तो उसे कोई फीस नहीं देनी पड़ती, लेकिन ऍप्लिकेशन के साथ बीपीएल कार्ड की कॉपी अटैच करनी पड़ती है ।
कैसे जमा कराएँ फीस :- केन्द्र व दिल्ली से संबंधित सूचना आरटीआई के तहत लेने की फीस है १० रूपये । वैसे ज्यादातर राज्यों में भी १० रूपये ही है, पर कुछ राज्य ज्यादा भी चार्ज कर रहे है । फीस कैश, बैंक ड्राफ्ट, या पोस्टल ऑडर के रूप में दी जा सकती है ।
इन भाषाओँ का इस्तेमाल करें :- हिन्दी, अंग्रेजीया किसी भी स्थानीय भाषा में ऍप्लिकेशन दी जा सकती है ।
सूचना मिलने में देरी होने पर क्या करें :- आमतौर पर सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी जानकारी तीस दिन में मिल जानी चाहिए । थर्ड पार्टी यानी प्राइवेट कंपनी के मामले में ४५ दिन और जीवन और सुरक्षा से संबंधित मामलों में ४८ घंटों में सूचना मिलनी ही चाहिए । ऐसा न होने पर संबंधित विभाग के संबंधित अधिकारी पर एक केस के लिए २५० रूपये प्रतिदिन के हिसाब से २५ हजार रूपये तक का जुर्माना हो सकता है ।
इसके अंतर्गत कौन आते है :- यह अधिनियम ज़म्मू-कश्मीर राज़्य को छोड़कर पूरे भारत में लागू है (एस। 12)।
सुचना का क्या मतलब होता है :- सूचना का मतलब है- रिकार्डों, दस्तावेज़ों, ज्ञापनों, ई-मेल, विचार, सलाह, प्रेस विज्ञप्तियाँ, परिपत्र, आदेश, लॉग पुस्तिकाएँ, ठेके, टिप्पणियाँ, पत्र, उदाहरण, नमूने, डाटा सामग्री सहित कोई भी सामग्री, जो किसी भी रूप में उपलब्ध हों। साथ ही, वह सूचना जो किसी भी निजी निकाय से संबंधित हो, किसी लोक प्राधिकारी के द्वारा उस समय प्रचलित किसी अन्य कानून के अंतर्गत प्राप्त किया जा सकता है, बसर्ते कि उसमें फाईल नोटिंग शामिल नहीं हो। (एस।-2 (एफ))
इसके अंतर्गत निम्न चीजें आती है :-
(1) कार्यों, दस्तावेज़ों, रिकार्डों का निरीक्षण,
(2) दस्तावेज़ों या रिकार्डों की प्रस्तावना/सारांश, नोट्स व प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त करना,
(3) सामग्री का प्रमाणित नमूने लेना,
(4) रिंट आउट, डिस्क, फ्लॉपी, टेपों, वीडियो कैसेटों के रूप में या कोई अन्य ईलेक्ट्रॉनिक रूप में जानकारी प्राप्त करना (एस- 2(ज़े))
लोक अधिकारी के कर्तव्य :-
1. इस कानून के लागू होने के १२० दिन के भीतर निम्न सूचना प्रकाशित कराना अनिवार्य होगा,
2. सरकार द्वारा अपने संगठनों, क्रियाकलापों और कर्त्तव्यों के विवरण
3. अधिकारियों और कर्मचारियों के अधिकार और कर्त्तव्य
4. अपने निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनाई गई विधि, पर्यवेक्षण और ज़िम्मेदारी की प्रक्रिया सहित
5. अपने क्रियाकलापों का निर्वाह करने के लिए इनके द्वारा निर्धारित मापदण्ड
6. अपने क्रियाकलापों का निर्वाह करने के लिए इनके कर्मचारियों द्वारा उपयोग किए गए नियम, विनियम, अनुदेश, मापदण्ड और रिकार्ड
7. इनके द्वारा धारित या इनके नियंत्रण के अंतर्गत दस्तावेज़ों की कोटियों का विवरण
8. इनके द्वारा गठित दो या अधिक व्यक्तियों से युक्त बोर्ड, परिषद्, समिति और अन्य निकायों के विवरण। इसके अतिरिक्त, ऐसे निकायों में होने वाली बैठक की ज़ानकारी आम जनता की पहुँच में है या नहीं
9. इसके अधिकारियों और कर्मचारियों की निर्देशिका
10. इसके प्रत्येक अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा प्राप्त की जाने वाली मासिक वेतन, इसके विनियमों के अंतर्गत दी जाने वाली मुआवज़े की पद्धति सहित
11. इसके द्वारा संपादित सभी योजनाएँ, प्रस्तावित व्यय और प्रतिवेदन सहित सभी का उल्लेख करते हुए प्रत्येक अभिकरण को आवंटित बज़ट विवरण
12. सब्सिडी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की विधि, आवंटित राशि और ऐसे कार्यक्रमों के विवरण और लाभान्वितों की संख्या को मिलाकर
13. इसके द्वारा दी जाने वाली रियायत, अनुमतियों या प्राधिकारियों को प्राप्त करने वालों का विवरण,
14. इनके पास उपलब्ध या इनके द्वारा धारित सूचनाओं का विवरण, जिसे इलेक्ट्रॉनिक रूप में छोटा रूप दिया गया हो
15. सूचना प्राप्त करने के लिए नागरिकों के पास उपलब्ध सुविधाओं का विवरण, जनता के उपयोग के लिए पुस्तकालय या पठन कक्ष की कार्यावधि का विवरण, जिसकी व्यवस्था आम जनता के लिए की गई हो
16। जन सूचना अधिकारियों के नाम, पदनाम और अन्य विवरण (एस. 4 (1)(बी))
लोक अधिकारी का क्या मतलब है :- इसका अर्थ है कोई भी स्थापित या गठित प्राधिकारी या निकाय या स्वशासी संस्थान [एस-२(एच)] जिसका गठन निम्न रीति से हुआ है-
* संविधान द्वारा या उसके अंतर्गत
* संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा
* राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून के द्वारा
उपयुक्त शासन द्वारा जारी अधिसूचना या आदेश द्वारा जिसमें निम्न दो बातें शामिल हों-
1. वह सरकार द्वारा धारित, नियंत्रित या वित्त पोषित हो
2. उक्त सरकार से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से धन ग्रहण करता हो

शनिवार, 27 सितंबर 2008

भारत को डर के कारोबारियों बचाओं

देश जल रहा है , नेता वोट के खातिर देश को गिरवी रखने को आतुर है, देश का आम आदमी सहमा हुआ है पूरे देश में वोट के खातिर दंगे कराए जा रहे है, अराजकता फैलाई जा रही है । इन सब का लाभ उठाते हुए आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे देश के चुनिन्दा शहरों में धमाके आम भारतीयों में दहशत का माहौल पैदा कर रहे है ।
उडीसा, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में चर्च एवं ईसाई समुदाय पर हमले कराए जा रहे है, नक्सलवादियों द्वारा अपहरण, हत्याए और पुलिस थानों को लूटना आम बात हो गयी है इन सब पर काबू पाना अब पुलिस के बस में नहीं रह गया है क्योंकि भारतीय पुलिस को नेताओं नें कानून व्यवस्था बनाये रखने के कार्य से अलग कर अपनी वोट की राजनीति के एजंडे को आगे बढाने के काम में लगा रखा है । पुलिस की हताशा दिल्ली में हुए बम विस्फोट के बाद दिल्ली पुलिस पुलिस आयुक्त के तरफ़ से आया बयान स्वयं ही बयां करता है ।
एक जुमला है कि "जब रोम जल रहा था तो नीरों वंशी बजा रहा था " यह जुमला हमारे गृहमंत्री माननीय शिवराज पाटील काफी सटीक बैठता है कि जब १३ सितम्बर को दिल्ली में धमाके हो रहे थे उस समय देश के गृहमंत्री दो-दो घंटे के अन्तराल में कपडे बदल कर आकर्षक दिखने की कोशिश कर रहे थे ।
काफी समय से उडीसा, मध्यप्रदेश और कर्नाटक के ईसाई समुदाय को प्रताडित किया जा रहा है उनपर आरोप लगाया जा रहा है कि वे हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करा रहे है इसे रोकने के लिए जनता उत्तेजित होकर कार्रवाई कर रही है अब सवाल यह है कि कुछ तथाकथित संगठन सरकारों का मुह चिढ़ाते हुए कानून को अपने हाँथ में ले लेते है और सत्ताधारी नेता इसे आम जनता की "स्वाभाविक प्रतिक्रिया" बताने से नहीं चूकते । कानून के राज का तकाजा तो यह था कि इन आरोपों की जाँच होती और यदि अपराध प्रमाणित होता तो अपराधी को सजा दी जाती किंतु ऐसा न करके सरकारें "स्वीकृत हिंसा" को बढावा दे रहीं है अराजक तत्वों की भीड़ कानून को लहुलुहान कर रहा है पुलिस प्रशासन और सरकारें मूकदर्शक बनी तमाशा देख रही है ।
राज ठाकरे द्वारा समय-समय पर कानून को धत्ता बताया जा रहा है इससे क्षुब्ध होकर मुंबई के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ( के.एल. प्रसाद) द्वारा राज ठाकरे और उनकी सेना को घुडकने पर अब तक दो भागों में बंट चुकी ठाकरे परिवार की सेनाएं तत्काल अपने-अपने अंदाज में पुलिस अधिकारी को ललकारा । उक्त अधिकारी का दोष केवल यह था कि वह राज ठाकरे की सेना को कानून हाँथ में न लेने की चेतावनी दी थी पुलिस अधिकारी द्वारा दी गयी चेतावनी कही से भी ग़लत नहीं थी किंतु इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि जब ठाकरे परिवार की दोनों सेनाओं द्वारा पुलिस अधिकारी को ललकारा जा रहा था तो महाराष्ट्र सरकार उस पुलिस अधिकारी के पीछे नहीं खडी दिखी । इस विषय पर हाल ही में मुंबई उच्च न्यायालय नें तल्ख़ टिप्पणी करते हुए राज ठाकरे के इन कृत्यों को आतंकी की संज्ञा दी तथा मूकदर्शक बने रहने के कारण महाराष्ट्र सरकार को भी आड़े हांथों लिया ।
दिल्ली के धमाकों के आरोपियों को पकड़ने के लिए दिल्ली के जामिया नगर में पुलिस और आतंकियों में मुठभेड़ हुई पुलिस के अनुसार दो आतंकवादी मुठभेड़ में मारे गये इस मुठभेड़ में एक पुलिस अधिकारी की भी मौत हो गयी तथा कुछ आतंकवादी पकडे गये जिसमें दो जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के छात्र बताये जा रहे है । जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर नें उन आतंकवादियों को कानूनी मदद देने का एलान कर दिया है मानव संसाधन मंत्री श्री अर्जुन सिंह उक्त वाईस चांसलर का समर्थन कर रहे है कानूनी सहायता देना कोई गुनाह नहीं है । देश के किसी भी नागरिक को कानूनी सहायता प्रापर फोरम द्वारा दिया जाना चाहिए इसके लिए देश के प्रत्येक न्यायालयों में कानूनी सहायता विभाग है । अगर वे कानूनी सहायता के पात्र है तो उन्हें सहायता दी जाय । किंतु जामिया मिलिया विश्वविद्यालय द्वारा आतंकियों को कानूनी सहायता दी जाती है तो यह एक गलत परंपरा की शुरूवात होगी और समाज टूटेगा, देश की एकता और अखंडता के लिहाज से खतरनाक होगा, ऐसा करने से आतंक फैलाने वालों का हौसला बढेगा ।
आशय यह है कि आज की सरकारों में इच्छाशक्ती का जबरदस्त अभाव है इस लिए देश की आम जनता डरी हुई है, देश के शहरी इलाकों में आतंकवादीयों का डर है, ग्रामीण क्षेत्रों में नक्सलवादियों का डर है, उद्योगपतियों को अंडरवल्ड का डर है, बेगुनाहों को पुलिस द्वारा झूंठे केश में फसाये जाने का डर है, यथास्थितिवादी इन सभी प्रकार के डर के बीच अपने हितों को साधने में जुटे हुए है उन्हें यथास्थिति बदल जाने का डर है, इन सभी प्रकार के डर के कारोबारी हमारे देश के नेता है और इन नेताओं को अपने वोट बैंक और दलाली के पैसे से मतलब है देश की आम जनता से इन्हे कुछ लेना-देना नहीं है ।
आख़िर देश का सबसे ताक़तवर तबका जिसे आम आदमी कहा जाता है और उसे निरीह बताया जाता है कब जागेगा ? यह तो पता नहीं किंतु अगर यह आम आदमी का तबका जाग गया तो यथास्थितिवादियों, वोट के सौदागरों तथा डर के कारोबारियों की खैर नहीं और ऐसा होगा जरूर ! करना केवल इतना है कि अपने-अपने अहंकार को भूल कर एक जुट हो जाय और इन सभी का सामना करे तभी हमारा देश भारत बच सकेगा ।

रविवार, 22 जून 2008

आम आदमी के साथ की गयी धोखाधडी

वर्षों पहले भारत वासियों ने एक ऐतिहासिक सपथ ली थी-घोर गरीबी और आभाव के बीच मुस्किल से गुजारा कर रही जनता के दुःख दर्द दूर करने की सपथ । लेकिन अफ़सोस, उस पवित्र निश्चय को लगातार भुलाया जा रहा है खुले-आम वादा खिलाफी की जा रही है । हम भारत के लोग...संविधान की प्रस्तावना में जो देशभक्ति पूर्ण संकल्प दर्ज किया गया था, सर्वोच्च राजाज्ञा का वह संकल्प जिसे भारत के संसद की सर्वोच्च सम्मति से भी नहीं बदला जा सकता उसे उलट दिए जाने की त्रासदी हम आज देख रहे है । और संसद ? उसका वजूद ही क्या रह गया है, जब संसद में किसी प्रकार की बहस किए बगैर ही वित्त मंत्रालय में गैट और डब्ल्यू० टी० ओ० का पालन करने की होड़ मची हो- शासन चाहे किसी भी पार्टी का हो, अविश्वास प्रस्ताव ही क्यो न पारित हुआ हो, आम चुनाव ही क्यो न सर पर हो और गिरगीट की तरह रंग बदलने वालों की गठबंधन सरकारें ही क्यो न स्थापित हुई हो । और दोष निवारण के विशेष अधिकारों से लैश दुसरी प्रमुख संवैधानिक संस्था सर्वोच्च न्यायालय की क्या स्थिति है ? कभी तो यह एक बुत की तरह रहस्यमय चुप्पी साधे रहता है और कभी कम महत्व के मुद्दों पर व्यवस्थाए देते हुए राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर राय देने से कतरा जाता है ।

ऐसे में कार्यपालिका वस्तुतः एक जंगली घोडे पर सवार होकर भारतीय जनता को मन मुताविक हांकती जा रही है इस पर लगाम लगाना न तो संसद के बस में है न न्यायपालिका के और न प्रेस के ।
अंकुश संतुलन की व्यवस्था स्थापित करने की बातें महज एक भ्रम साबित हुई है एक अरब से भी अधिक जनता की आवाज जो शिर्फ़ मतदान के समय तथा वह भी अत्यन्त धीमी सुनाई देती है का कोई मायने नहीं रह गया है । सत्ता चंद मंत्रियों से कैबिनेट के हाँथ में है, राष्टपति शीर्ष पर विराजमान है, विधायिका में मछली बाजार जैसा शोर है और राजनैतिक पार्टियाँ सौदेबाजी में मशगुल है इन सबसे त्रस्त आम जनता संदिग्ध प्रशासन की ओर खौफजदा निगाहों से देख रही है ।
बर्लिन की दीवार ढह चुकी है चीन की महान दीवार फांदी जा रही है । हिमालय भी एक चुनौती न रह कर कब्जा जमाने वाले विदेशी निवेशकों को न्योता दे रहा है । चुनाव एक नकली मुखौटा है मताधिकार प्राप्त आबादी का मात्र दस या बीस फीसदी हिस्सा चुनावी गणित के सहारे सत्ता पर कब्जा दिला सकता है और वह बहुमत का शासन कहला सकता है कैबिनेट एक षड्यंत्रकारी दल बन चुका है देश की प्रमुख पार्टीयाँ तुच्छ मतभेदों को लेकर हो हल्ला मचाती है उसमे चाहे कोई भी चुनाव जीत जाए राज्य साम्राज्यवाद के अलंबरदार पैक्स अमेरिकाना का ही होता है । संविधान की प्रस्तावना जैसे आधारभूत दस्तावेजों के उद्देश्यों के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता, बावजूद इसके १९८० के दशक के उत्तरार्ध तक इसका पालन करने में कोताही बरती गई और बेईमानी भी की गई । हमारी आयात-निर्यात नीतियां विदेशी निवेश स्वीकार करने की तैयारी हमारा पूरा वित्तीय ढांचा और विदेश संवंधों में व्यवहारवाद यह सब गाँधी-नेहरू काल के अनुरूप हो रहे है आज तक विभिन्न
पार्टियों और गठबंधनों के मंत्रिमंडल संविधान की बाकायदा सपथ लेते रहे है जिससे ऐसा लगता है कि एक शाब्दिक निरंतरता बनी रही है एक के बाद एक सभी मंत्रियों नें गांधीजी को राष्ट्रपिता और आंबेडकर और नेहरू को आधुनिक भारत के निर्माता ही माना है । मगर अचानक १९९१ में पीछे मुड का आदेश दिया गया । वास्तव में इस दिशा पलट की भूमिका १९८० के दशक के उत्तरार्ध में राजीव गांधी के विचारधारात्मक घोटाले और २१ वी शताब्दी के आगमन के बारे में दुअर्थी बयानबाजी ने तैयार कर दी थी नरसिंह राव नें संसद की राय लिए बिना जनता के बीच बहस-मुबाहिसा कराए बगैर और भारतीय संविधान की आज्ञा की परवाह किए बगैर एकाएक दिशा पलट दी , इस जबरन कार्रवाई के दौरान वैश्वीकरण, उदारीकरण, और निजीकरण, के ऐसे सगूफे छोडे गये कि संवैधानिक जगत में उथल-पुथल मच गयी इधर वैचारिक भ्रम फैलाने और चिकनी-चुपडी बातों से जनता को बरगलाने की कोशिश हुई और उधर हमारे देश के आर्थिक ढांचे पर विश्वबैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की दुधारी तलवार ने वार किया ।

भारत पर रीगनी अर्थशास्त्र यानि रीगनोमिक्स का पालन करने की शतें थोपी गयी इसी नये नुस्खे को नाम दिया गया मनमोहनोंमिक्स, चिदम्बरोमिक्स के रूप में इसका नया संस्करण तैयार हुआ इसके पश्चात् स्वदेशी के समर्पित कार्यकर्ताओं, गरीबी की नब्ज टटोलने वालों और देश भक्ती के पुजारियों नें जन विरोधी और नस्लवादी दंभ के कड़वे घोल में उसी नुस्खे को मिलाकर एक नई दवा इजाद की - सिन्होमिक्स, अब मनमोहनोंमिक्स और चिदम्बरोमिक्स की जुगल जोड़ी दूसरी पारी डट कर खेल रही है ।

इन सब के निचोड़ के तौर पर देश में जो छुब्ध करने वाली तस्वीर उभर कर सामने आ रही है वह कुछ इस प्रकार है ।

कार्पोरेट कंपनियों के मालिक वर्ग के लिए और उसका पुछल्ला बन चुके मध्य वर्ग के लिए एक स्वर्ग सा निर्मित हुआ है । तमाम दरबारियों, गुटबाजों, शत्रु-सहयोगियों, संश्रयकारियों से बना है यह दस करोड़ से अधिक का मध्यवर्ग आज यह तबका खूब मजे लूट रहा है मजे पश्चिमोन्मुख पांच सितारा किस्म के जीवन के, चहुमुखी व्याप्त वी० आय० पी० मार्का शानों शौकत के, मंत्रियों के लिए ऐशो आराम के असीमित साधनों के, माफियाओं को दी जा रही खुली छुट के, सर्वत्र व्याप्त और सबपर हावी भ्रष्टाचार के, तथा विकृत विकास कार्यों के लिए राज्य द्वारा की गयी फिजूल खर्ची के जिससे एक ओर तो जहां-तहां फ्लाईओवरों, ऊँचें-ऊँचें बांधों, अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों, जम्बो साइज क्रीडा स्थलों और पर्यटन के लिए ऐशगाहों का निर्माण हो रहा है तो दुसरी ओर राज्य व्यापार घाटे, कर्ज के भार मूल्यवृद्धि, सरकारी कोषों के दिवालिएपन, और उत्तरोत्तर अपराधों के बढ़ते मकड़जाल में फसता जा रहा है । और दरिद्र भारत का क्या हाल है ? वह भूख से तड़प रहा है, आत्महत्या का खौफनाक रास्ता अपनाने को विवस हो रहा है, बीमारी के कारण कराह रहा है, और इलाज व भोजन के अभाव में मर रहा है, किसानों, जनजातियों, ग्रामीणों, सर्वहाराओं, की एक बहुत बडी तादात खून-पसीना बहा कर हाड़-तोड़ मेहनत कर और आँसू पीकर गुजारा कर रही है । दुनिया में सबसे ज्यादा निरक्षर, कंगाल, एड्स के शिकार, बेघर परिवार, और गंदे, अस्त-व्यस्त, प्रदूषित, कोलाहल युक्त शहर हमारे भारत में ही है । गावों एवं कस्बों में पीने के पानी का भी अभाव है लेकिन स्काच विह्स्की, फास्ट-फ़ूड, पेप्सी, कोका-कोला, और काल-गर्ल संस्कृति को हर सरकार अपने शासन काल में प्रगती का पैमाना मानती रही है ।

ये शर्मनाक अंतर्विरोध भयानक बीमारी के लक्षण है जिसकी गहरी पड़ताल होनी चाहिए, यह काम कठिन नहीं है पर इसका अहसास कठिनाई पैदा करता है । सत्ता के शिखर पर ऐसे रीढ़ विहीन नायक विराजमान है जिनपर विकसित देश दबाव डालते है और जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, और विश्वबैंक की तिकडी के दलालों के रूप में शासन करते है । स्वदेशी मर चुका है, समाजवाद को जानी दुश्मन करार दिया गया है, अधर्मियों का राज है और मसीहाओं को सलीबों पर लटकाया जा चुका है, तथा बचे-खुचों को लटकाने का षड्यंत्र जारी है । विदेशी जीवनशैली की चका-चौंध में दृष्टिहीन हो चुका हमारा मध्यवर्ग देश को दुबारा उपनिवेश बनाने के संविधान विरोधी अभियान को सहयोग और समर्थन दे रहा है । अफसरशाहों और पार्टियों के पदाधिकारियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की चाटुकारिता करने की होड़ मची है । न्यायालय जुआ घर बन गये है, कानून के हांथ बांध दिए गये है और न्यायालयों के शरण में जाने वाले कंगाली के चपेट में आ रहे है । ऐसी स्थिति में किसी से कोई उम्मीद की जा सकती है ।

जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री हुए तो लगा कि वे हमें स्वराज्य की संकल्पना की ओर वापस ले चलेंगे लेकिन यह भोली आशावादिता ही साबित हुई वी० पी० सिंह पहले ही राजनीति के पटल से गायब हो चुके थे । फ़िर छमाही प्रधानमंत्रियों का ताँता लग गया इसके बाद स्वदेशी का दंभ भरने वालों और आज के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री- सब के सब स्वराज्य को ताक पर रख दिया और साम्राज्यवादी देवताओं को साष्टांग दंडवत कर उनकी ओर से आने वाले तमाम प्रस्ताव एक-एक करके स्वीकारते चले जा रहे है ।

बडे व्यवसायीयों और लुटेरों द्वारा संचालित वैश्विकरण के कारण महात्मा गाँधी के सपनों की हत्या ठीक उसी तरह हो रही है जिस तरह उनकी हत्या कर दी गयी । धनपिपासुओं के खातिर किए जा रहे उदारीकरण और निजीकरण के माध्यम से भारत की कृषि एवं उद्योग को विदेशी प्रभुत्व के नए नए अवतारों के हवाले किया जा रहा है ।

भारत के आर्थिक तंत्र पर आख़िर राज किसका है ? प्रचार चाहे कुछ भी किया जा रहा हो पेट्रौल -डीजल तथा रसोई घर के गैस का दाम बढाया जाना जनविरोधी कदम ही था और आयात करों में हेर-फेर राष्ट्रीय उद्योग के लिए हानिकारक ही होगा । सार्वजनिक निगमों को हलाल करना, विदेशी बैंकों और बीमा कंपनियों को प्रवेश की निर्बाध छुट देना, पेटेंट और ट्रिप्स-ट्रिप्स, परमाणु समझौते आदि को लागु करने के प्रति अड़ियल रवैया अपनाना -इन सबसे जाहिर है कि एक साम्राज्य परस्त मानसिकता जोर मार रही है । वित्तमंत्री पी० चिदंबरम ने कहा है कि अभी और सख्त फैसले किए जाने है इसका अर्थ है कि उन भारतीयों की टूटी अर्थ व्यवस्थाएं जिन्हें इन्सान तक नही समझा जाता, बर्फीली हवाओं के चपेट में आने वाली है । आख़िर वे देश के उन गरीबों के हित में सख्त फैसले क्यो नहीं लेते जिनके मतों से सत्ताशीन हुए है ? उनके मतदाता कौन थे ? अमेरिकी कंपनिया या भारत की आम जनता ? गैट-असुर के सामने आत्मसमर्पण करने के सवाल पर विपक्ष की सत्ता पक्ष के साथ एकता है । स्वतंत्रता प्राप्ति के ४० साल बाद तक भारतीय आवाम ने अपने बेहतरी के लिए न कभी भीख मांगी न उधार लिया और न कभी घुटने टेके । देश का संकठ अल्पावधि ऋण लेने के गैर जिम्मेदार फैसलों, विदेश से खर्चीले सामानों की खरीद तथा निवेश और साथ-साथ जनमानस के प्रति उदासीनता के कारण पैदा हुआ है । उधर विश्वबैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के शूरमाओं नें इस संकठ का लाभ उठाने की कोशिश शुरू की, इधर हमारी सरकार चलाने वाले उसका शिकार बनने के लिए तैयार बैठे थे । क्या कोई वैकल्पिक रास्ता भी था इसपर सायद ही संदेह होगा कि जब विकासशील देश धनी देशों के साथ सीधा संवंध बनाते है तो वे आधुनिक तकनीक पर आधारित नये उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों की आवश्यकता महसूस करते है । सवाल उस मान्यता पर उठाया जाना चाहिए जिसके अनुसार इस आधुनिक क्षेत्रों का इतना व्यापक विस्तार किया जा सकता है कि उसके लाभ आम आदमी तक पहुंचनें लगेंगे और यह कि ऐसा जल्दी ही संभव बना दिया जाएगा ।

हमारे वक्तव्य का प्रस्थान बिन्दु या यों कहें कि इस हद तक की गरीबी है । जो दुःख तकलीफ पैदा करती है, मनुष्य को छरित करती है और उसकी छमताओं को कुंद कर देती है हमारा पहला दायित्व यह जानने और समझने का है कि यह गरीबी किस तरह की सीमांए और बाधाएं खडी करती है साथ ही यह भी कि विकास का भौतिकवादी दर्शन हमें शिर्फ़ भौतिक अवसरों का दर्शन कराता है । अन्य कम महत्वपूर्ण लगने वाले कारकों पर कोई प्रकाश नहीं डालता । आशय यह है कि दरसल मानव विकास की शूरूआत वस्तुओं से होती ही नहीं है, उनकी शिक्षा से होती है, उनके संगठन से होती है, एवं उनके अनुशासन से होती है । इन तत्वों के बिना सारे संसाधन महज अन्तर्निहित क्षमता और सुप्त संभावना ही बने रहते है ।

आज की मौजूदा स्थिति यह है कि देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रीगण, सांसदगण, तथा अन्य वी० आय० पी० ख़ुद को जनता से काटते जा रहे है किंतु यह निश्चित है कि यदि वे अपना रास्ता नही बदले तो उनको इसकी किंमत आवश्यक रूप से चुकानी पडेगी । वैश्वीकरण के प्रति जो भय व्याप्त हो रहा है वह एक न एक दिन लावा बनकर अवस्य फूटेगा । उदाहरण के लिए बास्तील का वह किला जिसपर प्रहार के साथ फ्रांसीसी क्रांति की शुरूवात हुई थी आज भी प्रतीक के रूप में खडा है । वस्तुतः फ्रांस की क्रांति के पश्चात मैग्नाकार्टा की उदघोषणा मानव अधिकारों की आवश्यकता को जिस तरह उल्लिखित किया बिलकूल ठीक वही स्थिति आज हमारे भारत देश की है ।

बुधवार, 18 जून 2008

मानव अधिकारों का सामाजिक स्वरूप

वस्तुतः मानव अधिकारों का स्वरूप सामाजिक ही है समाज के बिना अधिकारों का अस्तित्व सम्भव नहीं, यह एक प्रकार का सामाजिक दावा है जो कि न तो स्वार्थ पूर्ण है और न तो किसी दुसरे व्यक्ति के हितों को नुकसान पहुंचता है । प्रो० लास्की ने कहा है कि " अधिकार सामाजिक जीवन की वह परिस्थिति है जिनके बिना कोई भी मनुष्य अपनी उन्नति पर नहीं पहुंच सकता" मानव अधिकार द्वारा समाज में सभी के हितों की पुष्टि होती है और इसमे समाज तथा कानून की मान्यता निहित रहती है मानव अधिकारों का स्वरूप कल्याणकारी है ए प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से मानव कल्याण से संवंधित है मानव हित से संवंधित होने के कारण ही मानव अधिकार राज्य तथा समाज द्वारा स्वीकार किया जाता है ।
मानव अधिकारों की सोच व्यक्ति के सामाजिक जीवन की देन है, समाज में रह कर ही मानव अधिकारों का प्रयोग किया जाता है मानव अधिकारों का प्रयोग जब-तक लोकहित में होता रहेगा तब-तक उसके ऊपर किसी का भी नियंत्रण नही हो सकेगा मानव अधिकारों के संरक्षण की जिम्मेदारी राज्य के ऊपर होती है, प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से अधिकारों का प्रयोग करने का अवसर देना कल्याणकारी राज्य का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए, मानव अधिकारों का लक्ष्य सार्वभौमिक है यदि एक व्यक्ति को जीने का अधिकार है तो यह अधिकार सभी व्यक्तियों के लिए अन्तर्निहित है, मानव अधिकारों की अवधारणा ने कर्तव्य को प्राथमिकता दी है अधिकार हमेसा कर्तव्य से संवंधित रहता है कर्तव्य के अभाव में हम किसी अधिकार की कल्पना नहीं कर सकते यदि लोगों को संपत्ति का अधिकार है तो यह अन्य व्यक्ति का कर्तव्य है कि वे उसके इस अधिकार का उल्लंधन न करे इस विषय में पश्चिमी विचारक हाब हाउस ने कहा है कि "अधिकार और कर्तव्य सामाजिक कल्याण की दो महत्वपूर्ण दशाए है ।
वैसे तो केवल एक लेख में संपूर्ण मानव अधिकारों की व्याख्या करना अत्यन्त कठिन कार्य है, सभ्यता और सामाजिक संगठन के साथ ही अधिकारों की वृद्धि होती गई और अब उनकी संख्या बहुत बढ़ गई है । भिन्न-भिन्न देशों के नागरिकों को भिन्न-भिन्न अधिकार प्राप्त है स्वतंत्र देश के नागरिक के अधिकार परतंत्र देश के नागरिकों के अधिकारों से भिन्न एवं मुखर होते है, हम यहाँ स्वतंत्र देश के नागरिकों के अधिकारों का अध्यन करें । अधिकारों को हम यहाँ चार श्रेणियों में विभाजित करते है । (१) प्राकृतिक अधिकार (२) नैतिक अधिकार (३) मौलिक अधिकार (४) कानूनी या वैधानिक अधिकार ।
प्राकृतिक अधिकार :- प्राकृतिक अधिकारों की श्रेणी में नैतिक व नैसर्गिक मूल अधिकार आते है यदि प्राकृतिक शब्द का विश्लेषण किया जाय तो पता चलता है कि इस शब्द का प्रयोग विराट, स्वाभाविक, आदर्श, अकृत्रिम और नैतिक के अर्थ में होता है अतः प्राकृतिक अथवा नैसर्गिक अधिकारों से व्यक्ति के उन अधिकारों का ज्ञान होता है जो उसे प्राकृतिक अवस्था में प्राप्त हो इसका अर्थ यह हुआ कि आदिम अवस्था में अथवा समाज के निर्माण से पहले व्यक्ति उन अधिकारों का उपयोग करता आया है । इन अधिकारों की जननी प्रकृति थी और जबतक संसार में मनुष्य रहेंगे तब-तक उन अधिकारों से मनुष्य को वंचित नहीं किया जा सकता प्रकृति ने जो सामाजिक भावना की उत्पत्ति की है इन्ही अधिकारों की रक्षा के लिए थी ।
उदाहरण के लिए-जीवन रक्षा और स्वतंत्रता के अधिकार व्यक्ति को है तो समाज का कर्तव्य हो जाता है कि वह इन अधिकारों की रक्षा इस लिए करे क्योकि समाज का निर्माण इन्ही अधिकारों की रक्षा के लिए हुआ है इस विषय में रूसों का मत है कि-"प्राकृतिक अधिकार ही आदर्श अधिकार थे और वे राज्य की उत्पत्ति से पहले विद्यमान थे ।
नैतिक अधिकार :- ऐतिहासिक काल से ही समाज व्यक्ति के इन अधिकारों को स्वीकार करता आया है उदहारण के लिए-बच्चे को यह अधिकार प्राप्त है कि जब-तक वह बडा न हो जाय माता-पिता उसका भरण-पोषण करें, गरीबों को सहायता करना, अंधे को रास्ता बताना आदि ऐसे अधिकार है जिनके विपरीत कार्य करने पर राज्य अथवा समाज दण्डित तो नही कर सकता परन्तु उन्हें हीन दृष्टि से अवश्य देख सकता है । इस आधार पर नैतिक अधिकार को इस तरह परिभाषित किया जा सकता है "जिन अधिकारों के प्रयोग के अभाव में व्यक्ति के आत्मा को कष्ट हो अथवा जिसका संवंध आत्मा से है वे नैतिक अधिकार है जैसे राज्य या समाज का यह कर्तव्य है कि वह नारी (महिलाओं ) का आदर करे । शवों का सम्मान भी नैतिक अधिकार के ही अंतर्गत आते है ।
मौलिक अधिकार :- इन अधिकारों को हम प्राकृतिक तथा वैज्ञानिक दोनों कह सकते है, यही कारण है जिसके उन्हें मूल अधिकार कहा जाता है । इन्ही अधिकारों के कारण व्यक्ति और समाज, राज्य और नागरिक का संवंध स्थिर होता है । कोई भी राज्य अथवा समाज बिना अपने सांस्कृतिक स्वरूप को बदले इन अधिकारों के प्रयोग से नागरिकों को वंचित नहीं कर सकता यही कारण है कि प्रायः सभी सभ्य एवं आधुनिक देशों के विधान में इन अधिकारों का स्पष्ट वर्णन रखा गया है । स्वतंत्रता, समानता, जीवनरक्षा, जीविकोपार्जन तथा देश के संविधान में आस्था इन्ही मौलिक अधिकारों की श्रेणी में आते है ।
इन अधिकारों को प्राकृतिक अथवा मौलिक अधिकार इसलिए कहा जाता है कि इन्ही से व्यक्ति की स्थिति और विकास की आवश्यक दशाओं का निर्माण होता है इन अधिकारों का कोई निश्चित वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता तथा न ही इसकी कोई सर्वमान्य तालिका ही बनाई जा सकती है ।
कानूनी या वैज्ञानिक अधिकार :- वैज्ञानिक अधिकारों के अंतर्गत सामाजिक तथा राजनैतिक दोनों प्रकार के अधिकार आते है । यह अधिकार व्यक्ति की वह मांग है जिसे समाज स्वीकार करता है तथा राज्य मान्यता देता है । वैज्ञानिक अधिकार वह अधिकार है जिसका उपयोग सभी नागरिक (वयस्क, बालक, विदेशी और व्यापारी ) करते है राज्य का यह कर्तव्य है कि इन अधिकारों के उपयोग के लिए सरल नियम बनाये साथ ही जो व्यक्ति, व्यक्ति अथवा समाज को इन अधिकारों के उपयोग से वंचित करें या इन अधिकारों का हनन अथवा अतिक्रमण करे उन्हें राज्य समुचित दंड दे । कानूनी अधिकारों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है (१) सामाजिक अधिकार (२) राजनैतिक अधिकार ........आगे जारी...................