शनिवार, 24 मई 2008

अधिकार हों सबके लिए

हम एक ऐसे समाज में रहते है जिसमे एक ही तरह की यौनिकता को मान्यता दी जाती है --शादी के रिश्ते में बंधे हुए औरत और मर्द की । एक मात्र उसी को 'प्राकृतिक' और 'सामान्य' बताया जाता है । इसमे भी मर्द की यौनिकता निर्णायक और प्रधान है । औरत की यौनिकता तो वंश चलाने का एक जरिया भर है । यहाँ तक की औरत और मर्द का क्या मतलब है, दोनों के बीच क्या रिश्ता हो, उनकी भूमिकाएं क्या हों और इनके मुताबिक परिवार का स्वरूप क्या हो--इन सबका सामाजिक ताकतें ऐसा रूप तय करती है जिससे की समाज में गैरबराबरी बनी रहे । इन सामाजिक ताकतों में महत्वपूर्ण है पित्रसत्ता, जिसे बरकरार रखने के लिए विषमलैंगिकता ( यौनिकता का वो रूप जिसमे केवल औरत और मर्द के बीच आकर्षण हो ) और जेंडर की एक संकीर्ण परिभाषा की जरुरत होती है । अगर औरत में औरतों से अपेक्षित गुण न हों, मर्द में मर्दों से जुड़े गुण न हों, और ये शादी में बंध कर अपनी तय भूमिकाएं निभाते हुए परिवार न बनाएँ, तो पित्रसत्ता की व्यवस्था चलेगी कैसे ? वे सभी जो इस 'आदर्श संरचना' के बाहर जीने की हिम्मत रखते है, उन्हें नैतिकता और समाज के लिए खतरा मन जाता है । इस खतरे के कारण सामाजिक व्यवस्था या तो इस 'आदर्श संरचना' से अलग जाने वालों के अस्तित्व को पुरी तरह नकार देती है या उन्हें यह कह कर अस्वीकार कर देती है कि वे पश्चिमी सभ्यता की उपज है । जैसे कहा जाता है कि 'हमारे समाज में लेस्बियन औरतें है ही नही' या 'पश्चिमी रंग में रंगे हुए उच्च वर्ग के मुठ्ठी भर शहरी युवक ही गे है । ' जब उनकी उपस्थिति को अनदेखा करना मुश्किल हो जाता है, तो उन्हें इस तरह दण्डित किया जाता है कि उनके लिए स्वतंत्र व गरिमामय जीवन जीना दूभर हो जाता है ।
पिछले कुछ दशकों में समलैगिक इच्छा रखने वाले लोगों, जिसमें लेस्बियन ( औरत जो औरत के प्रति आकर्षित है ), गे ( मर्द जो मर्द के प्रति आकर्षित है ), बाईसेक्स्युअल ( औरत और मर्द दोनों के प्रति आकर्षित है ), ट्रांसजेंडरर्ड ( औरत और मर्द कि परिभाषा में नहीं बंधे हुए ), हिजडा आदि सामिल है, की ओर से हिंसामुक्त और भयमुक्त, गरिमामय जीवन के संवैधानिक मानव अधिकार की मांग भारत के अलग-अलग कोनों से उठ रही है । यह आन्दोलन ऐसे लोगों के विरुद्ध हो रहे मानव अधिकारों के हनन का विरोध कर रहा है । उनके संघर्षों के इतिहास का दस्तावेजीकरण कर रहा है । लोगों की आपबीती के माध्यम से टकराहट और सहयोग दोनों के अनुभवो को सामने ला रहा है । अन्य प्रगतिशील आन्दोलनों के साथ जुडाव बनाने की कोशिश भी जारी है । ताकि संगठित होकर उन सामाजिक ताकतों को चुनौती दी जा सके जो परिभाषित 'आदर्श संरचना' से बाहर रहने वालों को प्रताडित करती है।
इस आलेख का विषय भारतीय दंड संहिता की धारा ३७७ है जो 'प्राकृतिक नियम के विरुद्ध' माने जाने वाले स्वैच्छिक यौन संबंधों को आपराधिक मानती है । और आज यौनिक अधिकारों के आन्दोलन में एक मुख्य बाधा बनी हुई है । बिडम्बना यह है की दावा किया जाता है कि १८६० में पास हुआ औपनिवेशिक कानून आज भी हमारे समाज के लिए उपयुक्त है । यह कानून ऐसे सभी यौनिक व्यवहारों को आपराधिक करार करने के लिए बनाया गया था जो प्रजनन प्रक्रिया से जुड़े नही है । इस कानून के अंतर्गत, दो वयस्कों के बीच समलैगिक यौनिक गतिविधियाँ या एक विषमलैंगिक शादीशुदा जोड़े के बीच मुख मैथुन से लेकर सभी 'अप्राकृतिक क्रियाएँ' अपराध है । फिर भी हमारे समाज में व्याप्त होमोफोबिया ( समलैगिकता के प्रति भय ) यह सुनिश्चित करता है कि केवल पहली स्थिति ( दो वयस्कों के बीच समलैंगिक व्यवहार) को ही दण्डित किया जाए ।
धारा ३७७ के बारे में हमारी मुख्य चिंताएँ क्या है ? यौनिक और जेंडर की विविधता पर धारा ३७७ एकरूपता थोपना चाहती है । क्या 'प्राकृतिक' है और क्या 'सामान्य है --इन अवधारणाओं को यह मान्यता देती है ताकि पित्रसत्ता और विषमलैगिकता से जुड़ी शादी एवं परिवार जैसी सामाजिक संस्थाएं और उनमे निहित गैर- बराबरी बनी रहे । यह समलैगिक इच्छा रखने वाले लोगों को दण्डित करने की अनुमति देती है । इनके मानव अधिकारों का उल्लंघन राज्य व पुलिस, परिवार, मिडिया और चिकित्सा जैसे विविध राजकीय एवं गैर राजकीय पात्रों द्वारा बार-बार होता है । पुलिस द्वारा यौनिक अत्याचार और शोषण, जबरदस्ती पैसे ऐठ्ना, मानसिक चिकित्सा संस्थाओं में विजली के झटके और तेज दवाये देकर 'मरीज' की यौनिकता को बदलने की कोशिश करना और हर रोज होने वाले सामाजिक लांछन और भेदभाव-- ऐसे मानव अधिकार उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण कई तथ्य-जांच की रिपोर्ट और अध्ययन करते है । लेकिन बार-बार घटने वाले इन गंभीर उल्लंघनों को समाज ने अभी तक नही समझा है । व्यक्तिगत जिंदगी के अनुभव भी हमे बताते है कि यह कानून मित्रों, परिवार वालों, सहकर्मियों आदि द्वारा खुले रूप से भिन्न यौनिक प्रवित्तियों को स्वीकार करने में एक मुख्य बाधा है । जो सामाजिक कार्यकर्ता इन उपेक्षित लोगों के बीच, शिक्षा सहयोग और पैरवी करने के लिए प्रतिबद्ध है । उन्हें भी कानूनी रूप से अपराधी ठहराए जाने का खतरा है ।
इसके अलावा धारा ३७७ और बाल यौन उत्पीडन के मामले में इसके उपयोग ने बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को हताश किया है । उनका तर्क यह है कि धारा ३७७ बाल यौन उत्पीडन से निपटने के लिए नही बनाया गया था । इसलिए वह बाल यौन उत्पीडन के मामलों की जटिलता और जरूरतों को समझने में पूरी तरह असमर्थ है । डर यह है कि जबतक धारा ३७७ बनी रहेगी, बाल यौन उत्पीडन पर अलग से कोई विशेष उपयुक्त कानून नही बन पाएगा ।
धारा ३७७ के विरुद्ध सबसे पहली याचिका सन १९९४ में एड्स भेदभाव विरोधी आन्दोलन (ए.बी.वी.ए. ) द्वारा दायर की गई थी । सन २००१ में नांज फाउन्डेशन इंडिया ने लायर्स कलेक्टिव के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पी.आई.एल.) दायर की सन २००३ में सरकार ने न्यायालय को जो जवाब दिया, उससे जाहिर है कि धारा ३७७ को चुनौती देना आसान नही होगा । सरकार का तर्क था कि आम तौर पर भारतीय समाज समलैगिकता को अनुचित मानता है । और इसे अपराध करार देना के लिए यही कारण काफी है । इसके अलावा बाल यौन उत्पीडन के मामलों में कानूनी कार्यवाही करने के लिए और समाज को नैतिक गिरावट से बचाने के लिए सरकार धारा ३७७ को सही करार देती है ।
सितम्बर २००४ में दिल्ली उच्च न्यायालय ने याचिका रद्द की , यह कहते हुए कि याचिका उस समुदाय द्वारा दर्ज कीजा सकती है, जो इस् कानून से सीधे रूप से प्रभावित है । नाज ने इस फैसले पर पुनः विचार के लिए उच्च न्यायालय में एक रिव्यू पेटिशन दर्ज किया । पेटिशन में नाज ने तर्क दिया कि नांज को धारा ३७७ से प्रभावित समुदाय की ओर से याचिका दर्ज करनी पडी क्योकि धारा ३७७ के रहते अपने पहचान के खुलासे और पुलिस उत्पीडन के डर की वजह से समलैंगिक समाज ख़ुद सीधे अदालत नहीं जा सकता । लेकिन उच्च न्यायालय ने रिव्यू पेटिशन खारिज कर दिया । कई समूहों की राय लेते हुए नाज ने सर्वोच्च न्यायालय से उच्च न्यायालय के याचिका खारिज करने के सीमित बिन्दु पर अपील की । मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह एक सार्वजनिक हित का मामला है और एक ऐसा मसला है जिसपर दुनिया भर में चर्चा चल रही है अदालत ने सरकार को निर्धारित समय के अन्दर इस बात पर जवाब देने के लिए कहा कि जनहित याचिका वैध है है या नहीं ।
धारा ३७७ के मूलभूत संदर्भ में, यह देखना बाकी है कि सरकार सामाजिक मूल्यों के नाम पर अपने नजरिये को लागु करने का अधिकार हथियाएगी ? क्या वो इस अधिकार को समलैगिक इच्छा रखने वाले लोगों की आजादी, सम्मान और अधिकारों से ज्यादा महत्वपूर्ण ठहराएगी ?
लेकिन सार्वजनिक नैतिकता का फौजदारी कानून से क्या रिश्ता है ? कौन तय करता है कि 'नैतिक' क्या है और 'प्राकृतिक' क्या है ? अकेले भारत में ही समलैगिक इच्छा रखने वाले लोग, विधवाऐ, ......आगे जारी....................

बुधवार, 21 मई 2008

नंदीग्राम और सिंगुर की जनता ने माकपा को दिया करारा जवाब

पश्चिम बंगाल के पंचायती चुनाव में वहाँ की जनता ने वाम मोर्चे को करारा जवाब दे दिया है । पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ वाममोर्चे के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बने नंदीग्राम और सिंगुर में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के हांथों वाम मोर्चे के उम्मीदवारों को मुह की खानी पडी है ।
सिंगुर की तीन जिला परिषद सीटों पर वाम मोर्चे के उम्मीदवारों को तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवारों के हाथों हार का मुह देखना पडा है इन चुनाओं में उद्योग के लिए कृषि भूमि के अधिग्रहण की बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार की नीति की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है ।
इस पंचायती चुनावों में पश्चिम बंगाल पुलिस के अनुसार चुनाव के दौरान हिंसा में ८ लोगों की मौत हुई तथा १३ लोग घायल हुए पुलिस का कहना है की पश्चिम बंगाल के सत्तारूढ़ वाम मोर्चे के समर्थकों और कार्यकर्ताओं नें दूसरी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर हथियारों से हमले किए ।
दरसल नंदीग्राम और सिगुर में विशेष आर्थिक क्षेत्र (एस ई जेड़ ) खास करके हुगली जिले के सिंगुर में टाटा मोटर्स की एक लाख रूपये की ड्रीम कार परियोजना हेतु राज्य सरकार ने ९९७ एकड़ जमीन टाटा समूह को सौपने का निर्णय लिया था इसके अलावा हल्दिया और नंदीग्राम में बनने वाले एस ई जेड़ को इण्डोनेशियाई कम्पनी को सौपने की तैयारी चल रही थी, वस्तुतः पश्चिम बंगाल सरकार बडे औद्योगिक घरानों को खुश करने के लिए किसानों से उनकी उपजाऊ जमीन छीन रही थी । जमीन बचाने के लिए आन्दोलन कर रहे नंदीग्राम के किसानों पर १४ मार्च २००७ को पुलिस ने गोलियां चलाई थी जिसमे कम से कम १४ आन्दोलनकारी मारे गए थे ।
यही कारण है कि साल २००३ में हुए पंचायती चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को जिला परिषद में केवल २ सीटें मिली थी किंतु २००८ के अभी तक घोषित ५३ सीटों के परिणाम में ३२ सीटों को वहाँ के लोगों ने तृणमूल की झोली में डाल दिया है । बतादें कि जमीन अधिग्रहण के मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी किसानों के हितों के लिए आन्दोलनरत थी ।
आशय यह है कि जन विरोधी नीतियों का खामियाजा तो वाम मोर्चे को भुगतना ही होगा, उम्मीद की जानी चाहिए की वाम मोर्चा इस् चुनाव से सबक लेगी और अपनी गलतियों को सुधारने की कोशिश करेगी ।

मंगलवार, 13 मई 2008

अस्पृश्यता चरम विन्दु है मानव अधिकार हनन का

संयुक्त राष्ट्र संघ की महा सभा ने "मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा करते समय उसकी उद्देशिका लिखने के बाद उसके अनुच्छेद ४ में लिखा था---किसी भी व्यक्ति को दास या गुलाम बनाकर नही रखा जाएगा, सभी प्रकार की दासता और दास व्यापार निषिद्ध होगा,१ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ऐसा उदघोषित कर मानव जाति में शताब्दियों से चली आ रही एक बडी बुराई के विरुद्ध जंग छेड़ी है । दरसल दास प्रथा में मनुष्य का मनुष्य द्वारा शोषण एवं उत्पीडन होता है तथा दास व्यापार में मनुष्य द्वारा मनुष्य पर भारी अत्याचार होता है । उपरोक्त महासभा ने इस् रक्षा उपाय मे यह चेतावनी भी दी थी कि यदि मनुष्य के इन अधिकारों की कानूनों के माध्यम से प्राप्ति नही कराई गई तो इसके भयावह परिणाम हो सकते है ।
महासभा ने इन "मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा" की उद्देशिका मे लिखा है ---यदि मनुष्य के अत्याचार और उत्पीडन अंतिम अस्त्र के रूप मे विद्रोह का अवलंब लेने के लिए विवस नही किया जाना है तो यह आवश्यक है की मानव अधिकारों का संरक्षण विधि सम्मत शासन द्वारा किया जाना चाहिए २ । इसके साथ ही महासभा ने मानव अधिकार अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा मे अपने संकल्प को अंगीकृत करते हुए तथा उसमे आथिक-सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं का उपबंध जोड़ते हुए उसकी उद्देशिका मे इसका तर्क बताया था कि इस् प्रसंविदा के पक्षकार राज्य यह मानकर कि ये अधिकार मानव देह की अन्तरनिहित गरिमा से व्युत्पन्न है ३ । इन अनुच्छेदों का करार करते है । देखा जा सकता है कि "मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा" के अनुच्छेद ४ के नजदीक भारत के संविधान मूल अधिकार वाले अध्याय के अनुच्छेद २३ (१) में इसी प्रकार का प्रावधान रखा गया है--मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात्श्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है और इस् उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा ।
हुआ यों था कि तबतक दास प्रथा और दास व्यापार विश्व की समस्या बन चुके थे । विश्व की कई मानव नस्लें और राष्ट्र दास प्रथा के विरोध मे लड़ रहे थे अमेरिका मे इस् प्रथा को समाप्त करने के लिए गृहयुद्ध लड़ा जा चुका था । इस पृष्ठभूमि और उसकी जानकारी के कारण मानव समाज का यह एक खास मुद्दा था । लेकिन भारतीय समाज मे एक इससे भी ज्यादा घिनौनी प्रथा कायम थी, परन्तु उसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान नही हो सकी थी । यहाँ जो स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन चला रहे थे वह अंग्रेजों से राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए था, उस समय तक विश्व समुदाय को यही पता था कि भारत ब्रिटेन से अपनी आजादी की लडाई लड़ रहा है उस समय के मानव चिंतकों को यह पता नही था कि भारत में ब्रिटेन की गुलामी से स्वतंत्र होने के बाद भी एक और सामाजिक गुलामी बची रह सकती है जो दास प्रथा अथवा दास व्यापर से भी ज्यादा खतरनाक एवं भयावह है ।
तत्कालीन भारतीय हिंदू राजनीतिक और वेदांत के दार्शनिक विद्वान् विदेशी मंचों पर अपनी इस् भयावह बुराई को छिपाया करते थे वे विदेशों में अपनी स्वतंत्रता की लडाई पर क्रांतिकारी एवं गंभीर भाषण दिया करते लेकिन मन में इस बात से डरे रहते थे कि कोई उनसे हिन्दुओं में फैली अस्पृश्यता के बारे में सवाल न पूछ बैठे । इस सवाल के पूछे जाने पर उन्हें बेहद बेचैनी महसूस होती थी क्योंकि इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था एक केवल डा० आम्बेडकर थे जिन्होंने अवसर मिलने पर इस समस्या को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाया था । संयोग से उन्हें १९४२ में इंस्टीट्यूट आफ पैसिफिक रिलेशन के चेयरमैन के तरफ़ से भारत के अछूतों की समस्या पर कनाडा के क्यूबेक के मांट ट्रमबलेंट में होने वाली कांफ्रेंस में एक पेपर पढ़ने के लिए आमंत्रित किया गया था । बाद में उन्होंने अपना यह पेपर "मिस्टर गाँधी एंड द एमोंसिपेशन आफ द अनटचेबल्स" शीर्षक से पुस्तिका के रूप में अलग से छपवाया था । इसमे डा अम्बेडकर ने विश्व समुदाय को बताया था कि भारत में अछूतों की मुसीबतें विश्व में अन्यत्र नीग्रो और यहूदियों की मुसीबतों से कम कठिन नहीं है उन्होंने चाहा था कि साम्राज्यवाद और नस्लवाद से लड़ते समय विश्व के चिन्तक अस्पृश्यता से लड़ना न भूलें ।५ इधर डा अम्बेडकर ने भारत में भी अस्पृश्यता की इस समस्या को पूरे राजनीतिक स्तर पर उठा दिया था उन्होंने एक तरह से अस्पृश्यता के खिलाफ पूरी शक्ति से आवाज उठाई थी । उनकी आवाज दबाने के लिए उस समय के कट्टरपंथी एवं उदारवादी हिन्दुओं के दोनों वर्गों ने पूरी कोशिश की थी लेकिन डा अम्बेडकर ने अपने काम में सफलता हासिल कर ली । उनके इसी दबाव के कारण भारत के संविधान के अनुच्छेद १७ में "मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा" से अधिक और अलग तथा उसमे एक नया आयाम जोड़ते हुए लिखा गया कि-"अस्पृश्यता" का अंत किया जाता है । आगे जारी.........

शनिवार, 10 मई 2008

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने कहा है कि 'सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ हो'

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की फाँसी की सज़ा माफ़ करने की वकालत की है । उनका व्यक्तिगत मानना है कि सरबजीत को माफ़ कर दिया जाना चाहिए । उन्होंने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को सरबजीत मामले की समीक्षा करने को कहा है तथा सुझाव दिया है कि वे सरबजीत की फाँसी की सज़ा पर रोक लगा दें । इससे पहले पाकिस्तान के मानवाधिकार मामले के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से कहा था कि उन्हें पाकिस्तान में मौत की सारी सज़ाओं को उम्रक़ैद में तब्दील करने पर विचार करना चाहिए । उनका यह सुझाव भी सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ करने के संदर्भ में था । हालांकि पाकिस्तान सरकार ने भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की फाँसी पर अगले आदेश तक के लिए रोक पहले ही लगा दी है। लेकिन अभी सज़ा माफ़ नहीं की गई है ।
पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री ने एक भारतीय टेलीविज़न चैनल सीएनएन-आईबीएन को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को सुझाव दिया है कि सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ कर देनी चाहिए । उन्होंने कहा, "सरबजीत की फाँसी की सज़ा पर गृहमंत्रालय, विदेश मंत्रालय, क़ानून और मानवाधिकार मंत्रालय को भी विचार करना चाहिए । " गिलानी ने यह भी कहा है कि सरबजीत की फाँसी पर पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय विचार कर रहा है पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का यह सुझाव भारत की ओर से की गई अपील के बाद आया है जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान को सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ कर देनी चाहिए ।
शुरूआत मे राष्ट्रपति मुशर्रफ ने सरबजीत की फासी ३० दिन के लिए टाल दी थी, ऐसा इसलिए किया गया था ताकि पाकिस्तान की नई सरकार सरबजीत को क्षमादान करने के सम्बन्ध मे भारत सरकार के अपील की समीक्षा कर सके । गिलानी के हस्तक्षेप की वजह से पाकिस्तानी अधिकारियों ने अगले आदेश तक सरबजीत की फांसी स्थगित कर दी थी । सरबजीत को १९९० मे पंजाब प्रांत मे हुए चार बम धमाकों मे कथित तौर पर शामिल रहने को लेकर मौत की सजा सुनाई गई थी ।
सरबजीत के परिजनों ने भी पाकिस्तान सरकार से ऐसी ही अपील की थी । पिछले दिनों सरबजीत के परिजन उनसे मिलने पाकिस्तान गए थे । इसके अलावा दोनों देशों के कई मानवाधिकार संगठन और नेता सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ करने की माँग करते आए हैं ।

मंगलवार, 6 मई 2008

देशमुख के मोहरा है "राज"

दिनांक ३ मई को मुम्बई के शिवाजी मैदान में मनसे के सर्वेसर्वा राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों पर कड़ी ( गाली गलौज के स्तर की) टीका टिप्पणी की दो वर्ष पहले राज अपने चचा बालठाकरे का साथ केवल इसलिए छोड़ा क्योकि उनकी महत्वाकांक्षा वहाँ पूरे होने के आसार नही थे इसलिए वे शिवसेना से निकलकर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना नामक पार्टी बनाई किंतु जब राज अपने आपको राजनैतिक हासिये पर जाता हुआ महसूस करने लगे तो उन्होंने अपनी दिशा बदल दी और वे पिछले कुछ दिनों से नफरत और हिंसा फैलाने का काम शुरू कर दिया वस्तुतः राज के पास कोई मुद्दा नही है जिससे वे महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें । इसीलिए उत्तर भारतीय टैक्सी ड्राइवरों पर हमले और उत्तर भारतीयों के खिलाफ बयानबाजी करना उनकी मजबूरी बन गयी है । राज अपने वजूद को बनाये रखने के लिए इसके अलावा और कुछ कर भी नही सकते ।
कांग्रेस और एनसीपी (अघाड़ी सरकार) के खिलाफ कुछ कह नही सकते क्योकि राज का देशमुख सरकार से तालमेल है तथा अन्य जो भी कांग्रेसी नेता है वे राज से काफी ताक़तवर है अगर उनके खिलाफ राज ने कुछ कहा तो वे राज को धुल चटा सकते है । जहाँ तक एनसीपी का सवाल है तो श्री शरद पवार के रहते राज की इतनी हिम्मत नही कि वे एनसीपी पर कोई कड़ी टिपण्णी कर सकें एनसीपी के अध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री के समकक्ष देश के कद्दावर नेता श्री शरद पवार ने राज की रैली से ठीक पहले राज को निशाना बनाते हुए कहा कि अलगाववादियों को कत्तई वरदास्त नही किया जाएगा, आपको बतादे कि आमतौर पर अलगाववादी शब्द आतंकवादियों के लिए उपयोग मे लाया जाता है । इसके बावजूद भी राज की हिम्मत नही हुई कि पवार के इस् बयान पर कोई टिपण्णी कर सकें । अब बची भाजपा-शिवसेना ये दोनों ही पार्टियाँ राज पर भारी है भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने इसपर महाराष्ट्र सरकार की उदाशीनता के तरफ़ इशारा करते हुए केवल इतना कहा कि समाज मे नफरत फैलाने के काम को रोका जाना चाहिए । ऐसे मी राज के पास केवल एक ही चारा है कि वे उत्तर भारतीयों के खिलाफ टिपण्णी करके अपना एवं अपनी पार्टी मनसे का प्रचार-प्रसार कर सकें ।
पता चला है कि ०६ मई को राज के विरुद्ध किसी तरह की करवाई न किए जाने के मुद्दे को लेकर महाराष्ट्र राज्य के उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री श्री आर आर पाटील को काफी खरी-खोटी सुननी पडी श्री आर आर पाटील को श्री अजित पवार और श्री नारायण राणे ने खरी-खोटी सुनाई इससे नाराज होकर श्री पाटील अपना स्तीफा देने तक की धमकी दे डाली पर मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख के बीच-बचाव करने पर मामला शांत हुआ । इसके पहले भी राज ठाकरे पर करवाई किए जाने पर हुई देरी को लेकर एनसीपी अध्यक्ष श्री शरद पवार ने श्री पाटील को आडे हाथों लिया था ।
वस्तुतः इस नूरा कुस्ती के केन्द्र मे शिवसेना को कमजोर करने की कयावत चल रही है क्योकि शिवसेना ने पिछले दिनों जब राष्ट्रपति के चुनाव की बात आई तो शिवसेना सुप्रीमो श्री बालासाहेब ठाकरे प्रतिभा ताई को मराठी माणूस के नाम पर समर्थन दिया तथा इस् मुद्दे पर एनडीए को ठेंगा दिखा दिया शिवसेना सुप्रिमों प्रतिभा ताई पाटील को समर्थन देते समय अपने आप को मराठी माणूस का सबसे प्रबल पैरोकार बताने की कोशिश की, बाकी अन्य तमाम मुद्दे मसलन महाराष्ट्र के किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या, मंहगाई को लेकर शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष एवं राज के चचेरे भाई श्री उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री श्री विलास राव देशमुख को बुरी तरह घेर दिया है इसलिए देशमुख को उद्धव को दबाने के लिए एक मोहरा चाहिए था जोकि राज के रूप मे उनके हाथ लग गया है अब देशमुख लोहा लोहे से काट रहे है इसमे भले ही उत्तर भारतीय अपमानित हों और मारे जाय तथा मराठी माणूस के नाम पर हिन्दी भाषियों के बीच आतंक फैलाया जाय इन बातों से देशमुख को कोई फर्क नही पड़ता देशमुख का मकसद एक मुस्त मराठी वोटर को शिवसेना के तरफ जाने से रोकना है इसके लिए अब उन्हें शिवसेना के मराठी माणूस के प्रबल पैरोकार के काट के रूप मे "राज" नामक तुरुप का पत्ता हाथ लग गया है कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है की उत्तर भारतीयों को इंधन के रूप मे इस्तेमाल कर राजनीति की रोटियां सेकी जा रही है ।
उधर राहुल बाबा उत्तर प्रदेश मे कांग्रेस को स्थापित करने के लिए एडी से चोटी तक का जोर लगा रहे है और इधर विलास राव देशमुख यू पी सहित उत्तर भारतीयों के मन मे जो भी थोडी बहुत कांग्रेस के प्रति राहुल गाँधी द्वारा आस्था पैदा की जा रही थी उसे सफाचट करते जा रहे है यानि बाड़ ही खेत को खा रहा है क्या करेंगे उत्तर भारतीय और क्या करेंगे राहुल बाबा ?

बुधवार, 23 अप्रैल 2008

भारत मे किसानों की स्थिति अमेरिका के रेड इंडियन जैसी

भारत एक कृषि प्रधान देश था लेकिन शायद अब भारत को कृषि प्रधान देश कहने मे किसी को भी हिचकिचाहट होगी ? क्योकि केन्द्र सरकार के कृषि मंत्री श्री शरद पवार ने कुछ समय पहले लोक सभा में बताया था कि देश मे ११,००० किसान प्रतिवर्ष आत्महत्या करते हैं जिसमें भारी संख्या में कर्ज न अदा करने वाले किसान हैं। फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार देश में कुल ३६ खरबपति हैं जिसमें अकेले महाराष्ट्र राज्य के मुंबई में २६ पाये जाते हैं. लेकिन उसी राज्य में पिछले १० सालों में कर्ज के बोझ तले दबकर ३६,००० से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. उनका कहना था कि सरकारी प्रयासों का क्या हाल इसे समझने के लिए यह पर्याप्त होगा कि साल २००६ में प्रधानमंत्री के दौरे के बाद विदर्भ क्षेत्र में पांच हजार पांच सौ से अधिक किसानों ने आत्महत्या की. इनमें से अधिकांश किसानों ने अपने सुसाईड नोट में अपनी आत्महत्या के लिए सीधे प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री को जिम्मेदार ठहराया है.
आप ने अभी हाल मे ही सुना या पढा होगा कि देश के किसानों का कर्ज सरकार की तरफ़ से माफ़ कर दिया गया इस् कर्ज माफ़ी के लिए सरकार को कुल ६०.००० करोड़ रूपये का इंतजाम करना पडा इसको लेकर उद्योग जगत मे हाय तौबा मच गई यह कहा जाने लगा कि बैंक कंगाल हो जायेगे, किसानों पर की गई सरकारी दरियादिली के कारण देश की अर्थ व्यवस्था चरमरा जायेगी । आप को बता दें कि इन हाय तौबा मचाने वाले उद्योग जगत के लोगों द्वारा चलाई जा रही कंपनियों के आय पर सरकार ने इतनी छुट दे रक्खी है कि जितना राजस्व वसूल होता है उसका आधा छुट मे निकल जाता है वर्ष २००७-०८ मे केंद्रीय बजट के अनुसार यही उद्योग जगत सरकारी खजाने का २,३५,१९१ करोड़ रुपये डकार गया उसपर तुर्रा यह कि सरकारी नुमाइंदो ने इसे राजस्व की हानि नाम दिया अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारी खजाने से किसानों को साठ हजार करोड़ रूपये कर्ज माफ़ी के लिए दिया गया और उद्योग जगत के लोग सरकारी खजाने से दो लाख पैतीस हजार एक सौ इक्यान्बे करोड़ रूपये हजम किए । सरकार ने किसानों को दी गई राहत का जोर शोर से प्रचार किया और उद्योग जगत द्वारा हजम किए गए रकम के बारे मे कही भी चर्चा नही हुई ।
अब आइये हम आप को बताते है की किसानों को सरकार द्वारा दिया गया ६०,००० करोड़ रुपया आखिर जाएगा कहाँ । सरकार का यह किसान प्रेम दरसल वित्तीय संस्थाओं के दबाव मे उठाया गया कदम है बैंकों, कोआपरेटिव सोसाइटियों और अन्य वित्तीय संस्थानों का लगभग ३०,००० करोड़ रूपया ऐसा बकाया है जो एनपीए (नान परफार्मिंग एसेट) की श्रेणी में है। रिजर्व बैंक कहता है कि दो फसल चक्रों के बाद भी अगर खेती के लिए गये लोन का पैसा वापस नहीं मिलता है तो बैंक उस रकम को एनपीए घोषित कर सकते हैं देश के किसानों पर इस समय ३ लाख करोड़ से भी अधिक का कर्ज है। इसमें यह ३०.००० करोड़ की रकम बैंकों का एनपीए है. सरकार ने जो पैकेज घोषित किया है उससे बैंको को वह वसूली हो जाएगी जिसे वे अपना डूबा धन मान चुके थे. किसान की जान छूटेगी. क्योंकि अब उसको वसूली की धमकी नहीं आयेगी. लेकिन क्या किसानों को वसूली की धमकी मिलनी चाहिए जबकि रिजर्व बैंक खुद कहता है कि पैदावार न होने के कारण अगर किसान कर्ज नहीं दे सकता तो उस रकम को एनपीए मान लिया जाए. इसका मतलब यह है कि बैंक भागते भूत की लंगोटी की तर्ज पर जो कुछ रकम वसूल हो जाए उसे वसूल करना चाहते हैं ।
किसानों के प्रति राज्य सरकारों रवैया क्या है आपको उत्तर प्रदेश के बुन्देल खंड के ३०० किसानों के ऊपर इसलिए यू पी सरकार एफ आई आर करवा देती है क्योकि वे भूगर्भ से पानी निकाल कर अपने खेतों की सिंचाई करने का साहस किया हमारे देश की सरकारें पूंजीपतियों को नदियाँ और बडे बडे जलस्रोत सौप देती है और वे उन जल स्रोतों के उस पानी को जो प्रकृति ने मुफ्त मे दिया है उसे १२ रूपये लीटर मिनरल वाटर के नाम से बेच कर भारी मुनाफा कमा रहे है । भारत मे आबादी का सत्तर फीसदी हिस्सा गांव मे रहता है खेती से जुड़ा हुआ है और देश में ७० फीसदी किसानों के पास आधा हेक्टेयर से कम भूमि है। एक हेक्टेयर में सकल कृषि उपज का मूल्य ३०,००० रु। अनुमानित है। अत: लगभग तीन चौथाई किसान परिवार १५,००० रु. वार्षिक आमदनी पर जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी रेखा २१,००० रुपए मानी गई है। यानि स्पष्ट है कि ये तीन चौथाई किसान किसान नही बल्कि कृषि मजदुर है और अब तो इनकी जमीन को भी उद्योग जगत पैसे की ताकत से इनसे छीन लेना चाहता है इस् कयावत मे सरकार भी सामिल है ।
विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) और विशेष कृषि आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना की घोषणा के बाद इस प्रवृति को अधिक बल मिला है। विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना, अवासीय परिसरों के निर्माण, कृषि फार्मों की स्थापना, भूमि बैंकों की स्थापना, आवासीय परिसरों के निर्माण, कृषि फार्मों की स्थापना, भूमि बैंकों की स्थापना, सड़क निर्माण आदि के लिये व्यावसायिक घराने एवं कम्पनियाँ लाखों एकड़ भूमि खरीदने को आतुर हैं। रिलायंस इन्डस्ट्रीज, टाटा समूह, बाबा कलयानी, सहारा, महिन्द्रा ग्रुप, अंसल, इन्फोसिस, इंडिया बुल्स आदि नगरों में या उसके निकट बड़े-बड़े भू-भाग खरीदने को आतुर हैं। टाटा समूह ने भारत में कहीं भी ३ एकड़ से २५००० एकड़ तक भूमि निजी स्वामियों से खरीदने का विज्ञापन दिया है आज हमारी सरकारों द्वारा किसानों के प्रति जो नीति अपनाई जा रही है वो बर्ड फ्लू के समय मुर्गियों के साथ अपनाई गई नीति के समान ही है ।

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2008

महिलाओं पर हमले....... राष्ट्रीय शर्म

पिछले दिनों १ अप्रैल २००८ को छत्तीसगड के रायपुर जनपद के ओसीएम चौक पर (नलघर) के पास रिद्धी-सिद्धि अपार्टमेंट से एक युवती को पीटने व उसे अर्धनग्न हालत मे सरेराह दौड़ने के लिए मजबूर किया उस महिला पर यह आरोप लगाया गया कि वह जिस्मफरोशी का धंधा करती है । महिला पर लगाया गया आरोप कितना सही था यह जांच का विषय है वैसे यह आरोप सही हो या ग़लत किंतु महिला के साथ किया गया व्यवहार एक सभ्य समाज के हो ही नही सकते रायपुर छत्तीसगड की राजधानी है । राजधानी मे एक औरत को शर्मसार होने के लिए मजबूर किया जाता हो और वहाँ की पुलिस उन लोगों के साथ दौड़ती हुई दिख रही हो जो उस महिला को अर्धनग्न अवस्था मे खुली सड़क पर खदेड़ रहे हों ।
दूसरी घटना दिल्ली के मांडवली इलाके की है । वहाँ पर एक महिला ने जब अपने मकान मालिक पर बलात्कार का आरोप लगाया तो वहाँ के लोगों ने महिला पर शराब पीने का आरोप लगाकर मकान मालिक के इशारे पर घर से बाहर लाया जाता है क्या औरत क्या मर्द सभी उस महिला पर अपना हाथ साफ करने मे लग जाते है । रायपुर भी राजधानी है दिल्ली भी राजधानी है लेकिन न रायपुर मे महिलाये महफूज है न दिल्ली मे । १ अप्रैल को रायपुर मे हुई घटना का मुख्य कारण जिस्मफरोशी तथा ११ अप्रैल को दिल्ली के मांडवली इलाके मे हुई घटना का मुख्य कारण महिला का शराब पीना रहा होगा किंतु इनके साथ किया गया व्यवहार सभ्य समाज की अभिव्यक्ति कत्तई नही हो सकती ।
बर्बर तरीके से इन दोनों महिलाओं को बुरी तरह प्रताडित करने वाले लोगों को क्या सजा मिल पायेगी ? यह तो वक्त ही बतायेगा किंतु अगर इन्हे सजा नही दी गयी तो शायद महिलाओं पर लगातार किए जा रहे हमलों मे वृद्धि ही होने वाली है ।