मंगलवार, 13 मई 2008

अस्पृश्यता चरम विन्दु है मानव अधिकार हनन का

संयुक्त राष्ट्र संघ की महा सभा ने "मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा करते समय उसकी उद्देशिका लिखने के बाद उसके अनुच्छेद ४ में लिखा था---किसी भी व्यक्ति को दास या गुलाम बनाकर नही रखा जाएगा, सभी प्रकार की दासता और दास व्यापार निषिद्ध होगा,१ संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ऐसा उदघोषित कर मानव जाति में शताब्दियों से चली आ रही एक बडी बुराई के विरुद्ध जंग छेड़ी है । दरसल दास प्रथा में मनुष्य का मनुष्य द्वारा शोषण एवं उत्पीडन होता है तथा दास व्यापार में मनुष्य द्वारा मनुष्य पर भारी अत्याचार होता है । उपरोक्त महासभा ने इस् रक्षा उपाय मे यह चेतावनी भी दी थी कि यदि मनुष्य के इन अधिकारों की कानूनों के माध्यम से प्राप्ति नही कराई गई तो इसके भयावह परिणाम हो सकते है ।
महासभा ने इन "मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा" की उद्देशिका मे लिखा है ---यदि मनुष्य के अत्याचार और उत्पीडन अंतिम अस्त्र के रूप मे विद्रोह का अवलंब लेने के लिए विवस नही किया जाना है तो यह आवश्यक है की मानव अधिकारों का संरक्षण विधि सम्मत शासन द्वारा किया जाना चाहिए २ । इसके साथ ही महासभा ने मानव अधिकार अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा मे अपने संकल्प को अंगीकृत करते हुए तथा उसमे आथिक-सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं का उपबंध जोड़ते हुए उसकी उद्देशिका मे इसका तर्क बताया था कि इस् प्रसंविदा के पक्षकार राज्य यह मानकर कि ये अधिकार मानव देह की अन्तरनिहित गरिमा से व्युत्पन्न है ३ । इन अनुच्छेदों का करार करते है । देखा जा सकता है कि "मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा" के अनुच्छेद ४ के नजदीक भारत के संविधान मूल अधिकार वाले अध्याय के अनुच्छेद २३ (१) में इसी प्रकार का प्रावधान रखा गया है--मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात्श्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है और इस् उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दंडनीय होगा ।
हुआ यों था कि तबतक दास प्रथा और दास व्यापार विश्व की समस्या बन चुके थे । विश्व की कई मानव नस्लें और राष्ट्र दास प्रथा के विरोध मे लड़ रहे थे अमेरिका मे इस् प्रथा को समाप्त करने के लिए गृहयुद्ध लड़ा जा चुका था । इस पृष्ठभूमि और उसकी जानकारी के कारण मानव समाज का यह एक खास मुद्दा था । लेकिन भारतीय समाज मे एक इससे भी ज्यादा घिनौनी प्रथा कायम थी, परन्तु उसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान नही हो सकी थी । यहाँ जो स्वतंत्रता के लिए आन्दोलन चला रहे थे वह अंग्रेजों से राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए था, उस समय तक विश्व समुदाय को यही पता था कि भारत ब्रिटेन से अपनी आजादी की लडाई लड़ रहा है उस समय के मानव चिंतकों को यह पता नही था कि भारत में ब्रिटेन की गुलामी से स्वतंत्र होने के बाद भी एक और सामाजिक गुलामी बची रह सकती है जो दास प्रथा अथवा दास व्यापर से भी ज्यादा खतरनाक एवं भयावह है ।
तत्कालीन भारतीय हिंदू राजनीतिक और वेदांत के दार्शनिक विद्वान् विदेशी मंचों पर अपनी इस् भयावह बुराई को छिपाया करते थे वे विदेशों में अपनी स्वतंत्रता की लडाई पर क्रांतिकारी एवं गंभीर भाषण दिया करते लेकिन मन में इस बात से डरे रहते थे कि कोई उनसे हिन्दुओं में फैली अस्पृश्यता के बारे में सवाल न पूछ बैठे । इस सवाल के पूछे जाने पर उन्हें बेहद बेचैनी महसूस होती थी क्योंकि इसका उनके पास कोई जवाब नहीं था एक केवल डा० आम्बेडकर थे जिन्होंने अवसर मिलने पर इस समस्या को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उठाया था । संयोग से उन्हें १९४२ में इंस्टीट्यूट आफ पैसिफिक रिलेशन के चेयरमैन के तरफ़ से भारत के अछूतों की समस्या पर कनाडा के क्यूबेक के मांट ट्रमबलेंट में होने वाली कांफ्रेंस में एक पेपर पढ़ने के लिए आमंत्रित किया गया था । बाद में उन्होंने अपना यह पेपर "मिस्टर गाँधी एंड द एमोंसिपेशन आफ द अनटचेबल्स" शीर्षक से पुस्तिका के रूप में अलग से छपवाया था । इसमे डा अम्बेडकर ने विश्व समुदाय को बताया था कि भारत में अछूतों की मुसीबतें विश्व में अन्यत्र नीग्रो और यहूदियों की मुसीबतों से कम कठिन नहीं है उन्होंने चाहा था कि साम्राज्यवाद और नस्लवाद से लड़ते समय विश्व के चिन्तक अस्पृश्यता से लड़ना न भूलें ।५ इधर डा अम्बेडकर ने भारत में भी अस्पृश्यता की इस समस्या को पूरे राजनीतिक स्तर पर उठा दिया था उन्होंने एक तरह से अस्पृश्यता के खिलाफ पूरी शक्ति से आवाज उठाई थी । उनकी आवाज दबाने के लिए उस समय के कट्टरपंथी एवं उदारवादी हिन्दुओं के दोनों वर्गों ने पूरी कोशिश की थी लेकिन डा अम्बेडकर ने अपने काम में सफलता हासिल कर ली । उनके इसी दबाव के कारण भारत के संविधान के अनुच्छेद १७ में "मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा" से अधिक और अलग तथा उसमे एक नया आयाम जोड़ते हुए लिखा गया कि-"अस्पृश्यता" का अंत किया जाता है । आगे जारी.........

शनिवार, 10 मई 2008

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने कहा है कि 'सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ हो'

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की फाँसी की सज़ा माफ़ करने की वकालत की है । उनका व्यक्तिगत मानना है कि सरबजीत को माफ़ कर दिया जाना चाहिए । उन्होंने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को सरबजीत मामले की समीक्षा करने को कहा है तथा सुझाव दिया है कि वे सरबजीत की फाँसी की सज़ा पर रोक लगा दें । इससे पहले पाकिस्तान के मानवाधिकार मामले के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से कहा था कि उन्हें पाकिस्तान में मौत की सारी सज़ाओं को उम्रक़ैद में तब्दील करने पर विचार करना चाहिए । उनका यह सुझाव भी सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ करने के संदर्भ में था । हालांकि पाकिस्तान सरकार ने भारतीय नागरिक सरबजीत सिंह की फाँसी पर अगले आदेश तक के लिए रोक पहले ही लगा दी है। लेकिन अभी सज़ा माफ़ नहीं की गई है ।
पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री ने एक भारतीय टेलीविज़न चैनल सीएनएन-आईबीएन को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को सुझाव दिया है कि सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ कर देनी चाहिए । उन्होंने कहा, "सरबजीत की फाँसी की सज़ा पर गृहमंत्रालय, विदेश मंत्रालय, क़ानून और मानवाधिकार मंत्रालय को भी विचार करना चाहिए । " गिलानी ने यह भी कहा है कि सरबजीत की फाँसी पर पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय विचार कर रहा है पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का यह सुझाव भारत की ओर से की गई अपील के बाद आया है जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान को सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ कर देनी चाहिए ।
शुरूआत मे राष्ट्रपति मुशर्रफ ने सरबजीत की फासी ३० दिन के लिए टाल दी थी, ऐसा इसलिए किया गया था ताकि पाकिस्तान की नई सरकार सरबजीत को क्षमादान करने के सम्बन्ध मे भारत सरकार के अपील की समीक्षा कर सके । गिलानी के हस्तक्षेप की वजह से पाकिस्तानी अधिकारियों ने अगले आदेश तक सरबजीत की फांसी स्थगित कर दी थी । सरबजीत को १९९० मे पंजाब प्रांत मे हुए चार बम धमाकों मे कथित तौर पर शामिल रहने को लेकर मौत की सजा सुनाई गई थी ।
सरबजीत के परिजनों ने भी पाकिस्तान सरकार से ऐसी ही अपील की थी । पिछले दिनों सरबजीत के परिजन उनसे मिलने पाकिस्तान गए थे । इसके अलावा दोनों देशों के कई मानवाधिकार संगठन और नेता सरबजीत की फाँसी की सज़ा माफ़ करने की माँग करते आए हैं ।

मंगलवार, 6 मई 2008

देशमुख के मोहरा है "राज"

दिनांक ३ मई को मुम्बई के शिवाजी मैदान में मनसे के सर्वेसर्वा राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों पर कड़ी ( गाली गलौज के स्तर की) टीका टिप्पणी की दो वर्ष पहले राज अपने चचा बालठाकरे का साथ केवल इसलिए छोड़ा क्योकि उनकी महत्वाकांक्षा वहाँ पूरे होने के आसार नही थे इसलिए वे शिवसेना से निकलकर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना नामक पार्टी बनाई किंतु जब राज अपने आपको राजनैतिक हासिये पर जाता हुआ महसूस करने लगे तो उन्होंने अपनी दिशा बदल दी और वे पिछले कुछ दिनों से नफरत और हिंसा फैलाने का काम शुरू कर दिया वस्तुतः राज के पास कोई मुद्दा नही है जिससे वे महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें । इसीलिए उत्तर भारतीय टैक्सी ड्राइवरों पर हमले और उत्तर भारतीयों के खिलाफ बयानबाजी करना उनकी मजबूरी बन गयी है । राज अपने वजूद को बनाये रखने के लिए इसके अलावा और कुछ कर भी नही सकते ।
कांग्रेस और एनसीपी (अघाड़ी सरकार) के खिलाफ कुछ कह नही सकते क्योकि राज का देशमुख सरकार से तालमेल है तथा अन्य जो भी कांग्रेसी नेता है वे राज से काफी ताक़तवर है अगर उनके खिलाफ राज ने कुछ कहा तो वे राज को धुल चटा सकते है । जहाँ तक एनसीपी का सवाल है तो श्री शरद पवार के रहते राज की इतनी हिम्मत नही कि वे एनसीपी पर कोई कड़ी टिपण्णी कर सकें एनसीपी के अध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री के समकक्ष देश के कद्दावर नेता श्री शरद पवार ने राज की रैली से ठीक पहले राज को निशाना बनाते हुए कहा कि अलगाववादियों को कत्तई वरदास्त नही किया जाएगा, आपको बतादे कि आमतौर पर अलगाववादी शब्द आतंकवादियों के लिए उपयोग मे लाया जाता है । इसके बावजूद भी राज की हिम्मत नही हुई कि पवार के इस् बयान पर कोई टिपण्णी कर सकें । अब बची भाजपा-शिवसेना ये दोनों ही पार्टियाँ राज पर भारी है भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने इसपर महाराष्ट्र सरकार की उदाशीनता के तरफ़ इशारा करते हुए केवल इतना कहा कि समाज मे नफरत फैलाने के काम को रोका जाना चाहिए । ऐसे मी राज के पास केवल एक ही चारा है कि वे उत्तर भारतीयों के खिलाफ टिपण्णी करके अपना एवं अपनी पार्टी मनसे का प्रचार-प्रसार कर सकें ।
पता चला है कि ०६ मई को राज के विरुद्ध किसी तरह की करवाई न किए जाने के मुद्दे को लेकर महाराष्ट्र राज्य के उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्री श्री आर आर पाटील को काफी खरी-खोटी सुननी पडी श्री आर आर पाटील को श्री अजित पवार और श्री नारायण राणे ने खरी-खोटी सुनाई इससे नाराज होकर श्री पाटील अपना स्तीफा देने तक की धमकी दे डाली पर मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख के बीच-बचाव करने पर मामला शांत हुआ । इसके पहले भी राज ठाकरे पर करवाई किए जाने पर हुई देरी को लेकर एनसीपी अध्यक्ष श्री शरद पवार ने श्री पाटील को आडे हाथों लिया था ।
वस्तुतः इस नूरा कुस्ती के केन्द्र मे शिवसेना को कमजोर करने की कयावत चल रही है क्योकि शिवसेना ने पिछले दिनों जब राष्ट्रपति के चुनाव की बात आई तो शिवसेना सुप्रीमो श्री बालासाहेब ठाकरे प्रतिभा ताई को मराठी माणूस के नाम पर समर्थन दिया तथा इस् मुद्दे पर एनडीए को ठेंगा दिखा दिया शिवसेना सुप्रिमों प्रतिभा ताई पाटील को समर्थन देते समय अपने आप को मराठी माणूस का सबसे प्रबल पैरोकार बताने की कोशिश की, बाकी अन्य तमाम मुद्दे मसलन महाराष्ट्र के किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्या, मंहगाई को लेकर शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष एवं राज के चचेरे भाई श्री उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री श्री विलास राव देशमुख को बुरी तरह घेर दिया है इसलिए देशमुख को उद्धव को दबाने के लिए एक मोहरा चाहिए था जोकि राज के रूप मे उनके हाथ लग गया है अब देशमुख लोहा लोहे से काट रहे है इसमे भले ही उत्तर भारतीय अपमानित हों और मारे जाय तथा मराठी माणूस के नाम पर हिन्दी भाषियों के बीच आतंक फैलाया जाय इन बातों से देशमुख को कोई फर्क नही पड़ता देशमुख का मकसद एक मुस्त मराठी वोटर को शिवसेना के तरफ जाने से रोकना है इसके लिए अब उन्हें शिवसेना के मराठी माणूस के प्रबल पैरोकार के काट के रूप मे "राज" नामक तुरुप का पत्ता हाथ लग गया है कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह है की उत्तर भारतीयों को इंधन के रूप मे इस्तेमाल कर राजनीति की रोटियां सेकी जा रही है ।
उधर राहुल बाबा उत्तर प्रदेश मे कांग्रेस को स्थापित करने के लिए एडी से चोटी तक का जोर लगा रहे है और इधर विलास राव देशमुख यू पी सहित उत्तर भारतीयों के मन मे जो भी थोडी बहुत कांग्रेस के प्रति राहुल गाँधी द्वारा आस्था पैदा की जा रही थी उसे सफाचट करते जा रहे है यानि बाड़ ही खेत को खा रहा है क्या करेंगे उत्तर भारतीय और क्या करेंगे राहुल बाबा ?

बुधवार, 23 अप्रैल 2008

भारत मे किसानों की स्थिति अमेरिका के रेड इंडियन जैसी

भारत एक कृषि प्रधान देश था लेकिन शायद अब भारत को कृषि प्रधान देश कहने मे किसी को भी हिचकिचाहट होगी ? क्योकि केन्द्र सरकार के कृषि मंत्री श्री शरद पवार ने कुछ समय पहले लोक सभा में बताया था कि देश मे ११,००० किसान प्रतिवर्ष आत्महत्या करते हैं जिसमें भारी संख्या में कर्ज न अदा करने वाले किसान हैं। फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार देश में कुल ३६ खरबपति हैं जिसमें अकेले महाराष्ट्र राज्य के मुंबई में २६ पाये जाते हैं. लेकिन उसी राज्य में पिछले १० सालों में कर्ज के बोझ तले दबकर ३६,००० से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है. उनका कहना था कि सरकारी प्रयासों का क्या हाल इसे समझने के लिए यह पर्याप्त होगा कि साल २००६ में प्रधानमंत्री के दौरे के बाद विदर्भ क्षेत्र में पांच हजार पांच सौ से अधिक किसानों ने आत्महत्या की. इनमें से अधिकांश किसानों ने अपने सुसाईड नोट में अपनी आत्महत्या के लिए सीधे प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री को जिम्मेदार ठहराया है.
आप ने अभी हाल मे ही सुना या पढा होगा कि देश के किसानों का कर्ज सरकार की तरफ़ से माफ़ कर दिया गया इस् कर्ज माफ़ी के लिए सरकार को कुल ६०.००० करोड़ रूपये का इंतजाम करना पडा इसको लेकर उद्योग जगत मे हाय तौबा मच गई यह कहा जाने लगा कि बैंक कंगाल हो जायेगे, किसानों पर की गई सरकारी दरियादिली के कारण देश की अर्थ व्यवस्था चरमरा जायेगी । आप को बता दें कि इन हाय तौबा मचाने वाले उद्योग जगत के लोगों द्वारा चलाई जा रही कंपनियों के आय पर सरकार ने इतनी छुट दे रक्खी है कि जितना राजस्व वसूल होता है उसका आधा छुट मे निकल जाता है वर्ष २००७-०८ मे केंद्रीय बजट के अनुसार यही उद्योग जगत सरकारी खजाने का २,३५,१९१ करोड़ रुपये डकार गया उसपर तुर्रा यह कि सरकारी नुमाइंदो ने इसे राजस्व की हानि नाम दिया अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारी खजाने से किसानों को साठ हजार करोड़ रूपये कर्ज माफ़ी के लिए दिया गया और उद्योग जगत के लोग सरकारी खजाने से दो लाख पैतीस हजार एक सौ इक्यान्बे करोड़ रूपये हजम किए । सरकार ने किसानों को दी गई राहत का जोर शोर से प्रचार किया और उद्योग जगत द्वारा हजम किए गए रकम के बारे मे कही भी चर्चा नही हुई ।
अब आइये हम आप को बताते है की किसानों को सरकार द्वारा दिया गया ६०,००० करोड़ रुपया आखिर जाएगा कहाँ । सरकार का यह किसान प्रेम दरसल वित्तीय संस्थाओं के दबाव मे उठाया गया कदम है बैंकों, कोआपरेटिव सोसाइटियों और अन्य वित्तीय संस्थानों का लगभग ३०,००० करोड़ रूपया ऐसा बकाया है जो एनपीए (नान परफार्मिंग एसेट) की श्रेणी में है। रिजर्व बैंक कहता है कि दो फसल चक्रों के बाद भी अगर खेती के लिए गये लोन का पैसा वापस नहीं मिलता है तो बैंक उस रकम को एनपीए घोषित कर सकते हैं देश के किसानों पर इस समय ३ लाख करोड़ से भी अधिक का कर्ज है। इसमें यह ३०.००० करोड़ की रकम बैंकों का एनपीए है. सरकार ने जो पैकेज घोषित किया है उससे बैंको को वह वसूली हो जाएगी जिसे वे अपना डूबा धन मान चुके थे. किसान की जान छूटेगी. क्योंकि अब उसको वसूली की धमकी नहीं आयेगी. लेकिन क्या किसानों को वसूली की धमकी मिलनी चाहिए जबकि रिजर्व बैंक खुद कहता है कि पैदावार न होने के कारण अगर किसान कर्ज नहीं दे सकता तो उस रकम को एनपीए मान लिया जाए. इसका मतलब यह है कि बैंक भागते भूत की लंगोटी की तर्ज पर जो कुछ रकम वसूल हो जाए उसे वसूल करना चाहते हैं ।
किसानों के प्रति राज्य सरकारों रवैया क्या है आपको उत्तर प्रदेश के बुन्देल खंड के ३०० किसानों के ऊपर इसलिए यू पी सरकार एफ आई आर करवा देती है क्योकि वे भूगर्भ से पानी निकाल कर अपने खेतों की सिंचाई करने का साहस किया हमारे देश की सरकारें पूंजीपतियों को नदियाँ और बडे बडे जलस्रोत सौप देती है और वे उन जल स्रोतों के उस पानी को जो प्रकृति ने मुफ्त मे दिया है उसे १२ रूपये लीटर मिनरल वाटर के नाम से बेच कर भारी मुनाफा कमा रहे है । भारत मे आबादी का सत्तर फीसदी हिस्सा गांव मे रहता है खेती से जुड़ा हुआ है और देश में ७० फीसदी किसानों के पास आधा हेक्टेयर से कम भूमि है। एक हेक्टेयर में सकल कृषि उपज का मूल्य ३०,००० रु। अनुमानित है। अत: लगभग तीन चौथाई किसान परिवार १५,००० रु. वार्षिक आमदनी पर जीवन यापन कर रहे हैं। गरीबी रेखा २१,००० रुपए मानी गई है। यानि स्पष्ट है कि ये तीन चौथाई किसान किसान नही बल्कि कृषि मजदुर है और अब तो इनकी जमीन को भी उद्योग जगत पैसे की ताकत से इनसे छीन लेना चाहता है इस् कयावत मे सरकार भी सामिल है ।
विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) और विशेष कृषि आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना की घोषणा के बाद इस प्रवृति को अधिक बल मिला है। विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना, अवासीय परिसरों के निर्माण, कृषि फार्मों की स्थापना, भूमि बैंकों की स्थापना, आवासीय परिसरों के निर्माण, कृषि फार्मों की स्थापना, भूमि बैंकों की स्थापना, सड़क निर्माण आदि के लिये व्यावसायिक घराने एवं कम्पनियाँ लाखों एकड़ भूमि खरीदने को आतुर हैं। रिलायंस इन्डस्ट्रीज, टाटा समूह, बाबा कलयानी, सहारा, महिन्द्रा ग्रुप, अंसल, इन्फोसिस, इंडिया बुल्स आदि नगरों में या उसके निकट बड़े-बड़े भू-भाग खरीदने को आतुर हैं। टाटा समूह ने भारत में कहीं भी ३ एकड़ से २५००० एकड़ तक भूमि निजी स्वामियों से खरीदने का विज्ञापन दिया है आज हमारी सरकारों द्वारा किसानों के प्रति जो नीति अपनाई जा रही है वो बर्ड फ्लू के समय मुर्गियों के साथ अपनाई गई नीति के समान ही है ।

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2008

महिलाओं पर हमले....... राष्ट्रीय शर्म

पिछले दिनों १ अप्रैल २००८ को छत्तीसगड के रायपुर जनपद के ओसीएम चौक पर (नलघर) के पास रिद्धी-सिद्धि अपार्टमेंट से एक युवती को पीटने व उसे अर्धनग्न हालत मे सरेराह दौड़ने के लिए मजबूर किया उस महिला पर यह आरोप लगाया गया कि वह जिस्मफरोशी का धंधा करती है । महिला पर लगाया गया आरोप कितना सही था यह जांच का विषय है वैसे यह आरोप सही हो या ग़लत किंतु महिला के साथ किया गया व्यवहार एक सभ्य समाज के हो ही नही सकते रायपुर छत्तीसगड की राजधानी है । राजधानी मे एक औरत को शर्मसार होने के लिए मजबूर किया जाता हो और वहाँ की पुलिस उन लोगों के साथ दौड़ती हुई दिख रही हो जो उस महिला को अर्धनग्न अवस्था मे खुली सड़क पर खदेड़ रहे हों ।
दूसरी घटना दिल्ली के मांडवली इलाके की है । वहाँ पर एक महिला ने जब अपने मकान मालिक पर बलात्कार का आरोप लगाया तो वहाँ के लोगों ने महिला पर शराब पीने का आरोप लगाकर मकान मालिक के इशारे पर घर से बाहर लाया जाता है क्या औरत क्या मर्द सभी उस महिला पर अपना हाथ साफ करने मे लग जाते है । रायपुर भी राजधानी है दिल्ली भी राजधानी है लेकिन न रायपुर मे महिलाये महफूज है न दिल्ली मे । १ अप्रैल को रायपुर मे हुई घटना का मुख्य कारण जिस्मफरोशी तथा ११ अप्रैल को दिल्ली के मांडवली इलाके मे हुई घटना का मुख्य कारण महिला का शराब पीना रहा होगा किंतु इनके साथ किया गया व्यवहार सभ्य समाज की अभिव्यक्ति कत्तई नही हो सकती ।
बर्बर तरीके से इन दोनों महिलाओं को बुरी तरह प्रताडित करने वाले लोगों को क्या सजा मिल पायेगी ? यह तो वक्त ही बतायेगा किंतु अगर इन्हे सजा नही दी गयी तो शायद महिलाओं पर लगातार किए जा रहे हमलों मे वृद्धि ही होने वाली है ।

गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

गरीब सवर्ण आरक्षण के हक़दार क्यों नही

क्या अब केंद्र सरकार सवर्ण गरीबों को भी आरक्षण पर पहल करेगी?
सुप्रीमकोर्ट ने बृहस्पतिवार को एक अहम फैसले में केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछडा वर्ग [ओबीसी] के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दे दी, लेकिन इस वर्ग की क्रीमीलेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने के निर्देश दिए। कोर्ट ने साथ आरक्षण की इस नीति की समय-समय पर समीक्षा करने का भी आदेश दिया। क्रीमी लेयर को परे रखने का फैसला तो स्वागत योग्य है मगर यह न्यायपूर्ण तभी होगा जब सवर्ण गरीबों को भी आरक्षण का लाभ मिले। इस बात को परे रखने के कारण ही मायावती ने सवर्णों के लिए यह मांग रख दी है। चुनाव जीतने के साथ ही उन्होंने सवर्ण गरीबों को आरक्षण का वायदा किया था। अब जबकि केंद्र में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजर है इस लिए फौरन सवर्णों की मांग रख दी। दलितों की तो वे नेता हैं ही मगर सशक्त तरीके से गरीब सवर्णों के लिए आवाज भी उठा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले आने के साथ ही उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अन्य पिछड़ा वर्ग को केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण की मंजूरी के सुप्रीमकोर्ट के फैसले का स्वागत किया और कहा कि उच्च वर्ग के गरीब तबके को भी इस प्रकार का लाभ दिया जाना चाहिए। मायावती ने कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकांश लोग आर्थिक एवं शैक्षिक रूप से तरक्की नहीं कर सके हैं, इसलिए उन्हें इस प्रकार के लाभ देने की सख्त आवश्यकता थी और उन्हें आरक्षण का फायदा मिलना ही चाहिए था। मुख्यमंत्री ने कहा कि वह केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मांग कर रही हैं कि उच्च वर्ग के गरीब वर्ग को भी उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण दिया जाए, ताकि उनके बच्चे भी उच्च शिक्षा ग्रहण कर अपना जीवन स्तर सुधारने के साथ-साथ देश की प्रगति में भी सहायक बन सकें। मायावती की यह मांग भले राजनीति के कारण है मगर न्यायसंगत है कि गरीब सवर्णों को भी आरक्षण दे सरकार।
आज मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिलाने वाले 2006 के केंद्रीय शिक्षण संस्थान [प्रवेश में आरक्षण] कानून को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए लंबी बहस के बाद उक्त कानून को वैध ठहराया, लेकिन साथ ही यह भी निर्देश दिया कि यदि आरक्षण का आधार जाति है तो इस वर्ग के सुविधा संपन्न यानी क्रीमीलेयर को आरक्षण के दायरे से बाहर रखा जाए। पीठ ने चार एक के बहुमत से उक्त कानून को वैध ठहराया। न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी ने इससे असहमति जताई। पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति अरिजित पसायत, न्यायमूर्ति सी के ठक्कर और न्यायमूर्ति आर वी रवींद्रन शामिल हैं।
ओबीसी के आरक्षण में दायर याचिकाओं में सरकारी कदम का जबरदस्त विरोध करते हुए कहा गया था कि पिछड़े वर्गो की पहचान के लिए जाति को शुरुआती बिंदु नहीं माना जा सकता। आरक्षण विरोधी याचिकाओं में क्रीमीलेयर को आरक्षण नीति में शामिल किए जाने का भी विरोध किया गया था। इस फैसले से न्यायालय के 29 मार्च 2007 के अंतरिम आदेश में कानून के कार्यान्वयन पर लगाई गई रोक समाप्त हो जाएगी। फैसले के बाद अब आरक्षण नीति को 2008-09 शैक्षणिक सत्र में लागू किया जा सकेगा।
ओबीसी का आरक्षण सफरनामा
आईआईटी और आईआईएम सहित केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से संबंधित विवादास्पद कानून की संवैधानिक वैधता को लेकर घटनाक्रम इस प्रकार रहा:-
20 जनवरी 2006: सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़े वर्गो तथा अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजातियों को शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश देने के लिए सरकार को विशेष प्रावधान बनाने की शक्ति देने वाला संवैधानिक [93वां संशोधन] अधिनियम 2005 प्रभाव में आया।
16 मई 2006: सामाजिक न्याय और अधिकारिता मामलों की स्थायी समिति ने अपनी 15वीं रिपोर्ट सौंपी जिसमें कहा गया कि पिछड़े वर्गो के मुद्दे को लेकर कोई जनगणना नहीं कराई गई। इसमें कहा गया कि भारत के महापंजीयक की रिपोर्ट के अनुसार 2001 की जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित आंकड़ों के बारे में कोई जानकारी नहीं ।
22 मई 2006: अशोक कुमार ठाकुर ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका दायर कर अधिनियम 2006 के तहत केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों के दाखिलों में आरक्षण दिए जाने के मामले को चुनौती दी। उस समय अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान [एम्स] में आरक्षण विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था।
27 मई 2006: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उच्च शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण कार्यान्वयन से संबंधित अधिनियम को देखने के लिए एक निगरानी समिति बनाई। समिति ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को चेताया कि अधिनियम के कार्यान्वयन से शैक्षणिक योग्यता के साथ समझौता होगा और इससे जनसांख्यिकी आपदा पैदा होगी।
29 मई 2006: सुप्रीमकोर्ट ने याचिका पर केंद्र को नोटिस भेजा।
31 मई 2006: सुप्रीमकोर्ट ने सभी संबंधित नागरिकों को याचिका पर पार्टी बनने की अनुमति दी और उनसे नई याचिका दायर करने को कहा।
1 दिसंबर 2006: मानव संसाधन और विकास मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 186वीं रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश की और कहा कि 1931 के बाद जाति के आधार पर कोई जनगणना नहीं हुई।
1 जनवरी 2007: अधिनियम के कार्यान्वयन को चुनौती देने वाली एक और याचिका सुप्रीमकोर्ट में दायर।
29 मार्च 2007: सुप्रीमकोर्ट ने अधिनियम के कार्यान्वयन को स्थगित करते हुए अंतरिम आदेश दिया।
7 अगस्त 2007: पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने अधिनियम की वैधता पर फैसला देने के लिए सुनवाई शुरू की।
11 नवंबर 2007: 25 दिन की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया।
10 अप्रैल 2008: सुप्रीमकोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण उपलब्ध कराने वाले केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान [प्रवेश आरक्षण] अधिनियम 2006 की वैधता को बरकरार रखा।

गुरुवार, 3 अप्रैल 2008

बाबा आमटे

बाबा आमटे के योगदान को कौन भूल सकता है। २६ दिसंबर १९१४ में महाराष्‍ट्र के वर्धा जिलें एक छोटे से गांव में जन्‍मे बाबा के पिता शासकीय सेवा में लेखपाल थे। बचपन शान से बिता था। लेकिन बाबा ने सब कुछ छोड़कर गांधी के रास्ता पर जाना ही बेहतर समझा। बाबा चाहते थे तो अपनी पढ़ाई के बल पर किसी बड़ी नौकरी को पकड़ कर बडे शान से अपना जीवन बिता सकते थे। लेकिन बाबा ने ऐसा रास्ता नहीं अपनाया। देखते देखते वो पूरे देश के बाबा बन गए। गरीब, आदिवासियों और मजदूरों की आवाज थे बाबा। आज के इस आधुनिक समय में अगर किसी व्यक्ति ने उपेक्षित, पीड़ित और समाज की घोर उपेक्षा के शिकार कुष्ट रोगियों की पीड़ा और संवेदना को अगर किसी ने समझा था तो वे बाबा आमटे ही थे।
एक दिन बाबा ने एक कोढ़ी को धुआँधार बारिश में भींगते हुए देखा उसकी सहायता के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। उन्होंने सोचा कि अगर अगर इसकी जगह मैं होता तो क्या होता ? उन्होंने तत्क्षण बाबा उस रोगी को उठाया और अपने घर की ओर चल दिए। इसके बाद बाबा आमटे ने कुष्ठ रोग को जानने और समझने में ही अपना पूरा ध्यान लगा दिया। वड़ोरा के पास घने जंगल में अपनी पत्नी साधनाताई, दो पुत्रों, एक गाय एवं सात रोगियों के साथ आनंद वन की स्थापना की। यही आनंद वन आज बाबा आमटे और उनके सहयोगियों के कठिन श्रम से आज हताश और निराश कुष्ठ रोगियों के लिए आशा, जीवन और सम्मानजनक जीवन जीने का केंद्र बन चुका है। मिट्टी की सौंधी महक से आत्मीय रिश्ता रखने वाले बाबा आमटे ने चंद्रपुर जिले, महाराष्ट्र के वड़ोरा के निकट आनंदवन नामक अपने इस आश्रम को आधी सदी से अधिक समय तक विकास के विलक्षण प्रयोगों की कर्मभूमि बनाए रखा। जीवनपर्यन्त कुष्ठरोगियों, आदिवासियों और मजदूर-किसानों के साथ काम करते हुए उन्होंने वर्तमान विकास के जनविरोधी चरित्र को समझा और वैकल्पिक विकास की क्रांतिकारी जमीन तैयार की।
आनन्दवन की महत्ता चारों तरफ फैलने लगी, नए-नए रोगी आने लगे और "आनन्दवन" का महामंत्र 'श्रम ही है श्रीराम हमारा' सर्वत्र गूँजने लगा। आज "आनन्दवन" में स्वस्थ, आनन्दमयी और कर्मयोगियों की एक बस्ती बस गई है। भीख माँगनेवाले हाथ श्रम करके पसीने की कमाई उपजाने लगे हैं। किसी समय १४ रुपये में शुरु हुआ "आनन्दवन" का बजट आज करोड़ों में है। आज १८० हेक्टेयर जमीन पर फैला "आनन्दवन" अपनी आवश्यकता की हर वस्तु स्वयं पैदा कर रहा है। बाबा आम्टे ने "आनन्दवन" के अलावा और भी कई कुष्ठरोगी सेवा संस्थानों जैसे, सोमनाथ, अशोकवन आदि की स्थापना की है जहाँ हजारों रोगियों की सेवा की जाती है और उन्हें रोगी से सच्चा कर्मयोगी बनाया जाता है।
सन १९८५ में बाबा आमटे ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत जोड़ो आंदोलन भी चलाया था। इस आंदोलन को चलाने के पीछे उनका मकसद देश में एकता की भावना को बढ़ावा देना और पर्यावरण के प्रति लोगों का जागरुक करना था।