गुरुवार, 27 अगस्त 2009

अदालतों में लंबित मामलों से हो रहा है मानव अधिकारों का हनन

पिछले दिनों प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह नई दिल्ली में राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के एक संयुक्त सम्मेलन संबोधित करते हुए बताया कि कानून और न्याय मंत्रालय न्यायिक सुधारों के बारे में एक रूप रेखा तैयार कर रहा है उन्होंने न्यायपालिका से ३००० खाली पदों को तत्काल भरने को कहा उन्होंने बताया कि भारत दुनिया का ऐसा देश है जहां सबसे अधिक संख्या में मामलों पर निर्णय होना बाकी है। उन्होंने कहा कि अधीनस्थ न्यायालयों में बीस से पच्चीस फीसदी तक न्यायिक पद खाली पड़े हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की क्षमता का विकास करने के लिए राज्यों की न्यायिक अकादमियों को सुदृढ़ करने की जरूरत है।बहुत जल्द नई दिल्ली में न्यायवादियों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ बातचीत की जाएगी। इससे एक सीमा और पुनर्गठन तैयार हो जाएगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने न्यायिक अधिकारियों की बहुत अधिक कमी पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इसकी वजह से विचाराधीन मामलों की बढ़ती हुए संख्या से निपटने के प्रयासों में बाधा पहुंच रही है। उन्होंने यह भी कहा कि ढ़ांचागत अड़चनों के कारण कानून के प्रतिभाशाली स्नातक न्यायिक सेवाओं में शामिल नहीं हो पाते और अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक अधिकारियों के सत्रह प्रतिशत से अधिक पद खाली पड़े हैं। इस सम्मेलन का लब्बोलुआब यह रहा कि प्रधानमंत्री नें न्यायपालिका को रिक्त न्यायिक पदों को भरने को कह कर गेंद न्यायपालिका के पाले में डाल दिया तो भारत के मुख्य न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने ढ़ांचागत अड़चनों का हवाला देते हुए गेंद को पुनः सरकार की तरफ उछाल दिया ।
यह बात भारत सरकार के मुखिया डा. मनमोहन और न्यायपालिका के शीर्ष पुरुष के जी बालाकृष्णन दोनों को पता है कि भारत की अदालतों में लंबित मामलों नें उसकी न्यायिक प्रक्रिया के सही इस्तेमाल को लेकर सवालिया निशान खड़े किए हैं ? देश का एक प्रबुद्ध नागरिक तब अपना माथा ठोक लेता है जब उसे पता चलता है कि भारतीय अदालतों में न्याय की आस लिए करोडों मामले अंतिम फैसले का इंतजार कर रहे है । गौरतलब है कि देश भर के उच्च न्यायालयों में ३१ दिसंबर २००८ तक ३९,१४,६६९ मामले लंबित थे। जबकि ३१ मार्च २००९ तक उच्चतम न्यायालय में ५०१६३ मामले लंबित थे। देश भर की निचली अदालतों में वर्ष २००८ के अंत तक लंबित मामलों की संख्या २,६४,०९०११ थी जिसमें १,८८,६९,१६३ मामले क्रिमिनल, और ७५,३९,८४८ मामले सिविल से संबंधित हैं।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने देश की अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित मुकदमों के विषय पर चिंता जाहिर करते हुए जल्द निस्तारण के लिए कानूनों में बदलाव की वकालत की है। महाराष्ट्र न्यायिक अकादमी के उद्घाटन समारोह के मौके पर राष्ट्रपति ने यहां कहा कि न्यायालयों के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या लंबित मुकदमों की है। मुकदमों पर निर्णय आने में काफी वक्त लगता है, तब तक मुकदमे से जुडे लोग सामान्य जीवन नहीं जी पाते। उन्होंने कहा, 'ऐसे लोगों की समस्या का समाधान खोजने की जरूरत है, जो लंबे समय से न्याय पाने का इंतजार कर रहे हैं।
पॉँच वर्ष, दस वर्ष या पंद्रह वर्ष तक एक मुकद्दमें का जारी रहना तो आम बात है कई कई मामले के निपटारे में तो ३५ से ४० वर्ष तक लग जाते है इसलिए भारत की कुछ जेलों में यह हाल है कि वहां तिल धरने की जगह नहीं है मध्य-प्रदेश के कुछ कारावासों में तो बंदी बारी बारी सोते हैं, यानि सबके लेटने तक की जगह नहीं है लंबित मुकद्दमों की अंतिम सुनवाई एवं न्याय की आस लिए मर रहे एवं मानसिक संतुलन खो रहे लोगो की जवाबदेही किस पर है ? सरकार और न्यायपालिका दोनों की तरफ से जजों की कमी का रोना रोया जाता है । मुकद्दमें के निपटारे के देरी के लिए चाहे सरकार जिम्मेदार हो या न्यायपालिका किन्तु यह आम आदमी के ही "मानव अधिकारों का हनन" है ।

2 टिप्‍पणियां:

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

सौ फ़ीसदी सच.

Pilland ने कहा…

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