गुरुवार, 11 अगस्त 2011

रक्षा करो अन्नदाता की

अरे किसान की कौन सुने
सत्ता का खेल जारी है

जंगल जमीन सब छीन रहे
अब पानी की बारी है

सुन सकते हो लालबहादुर
क्या हुआ तुम्हारा नारा

जो अधिकारों की मांग करे
वो मारा जाय बेचारा

पुलिस कर रही हत्याएं
और सरकारें सोती हैं

आह, चार को मार दिए
भारत माता भी रोती हैं

वो किसान हैं कहाँ जांय
क्या करें तुम्ही बतलाओं

रक्षा करो अन्नदाता की
स्वर्ग से वापस आओ

6 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

कविता में व्यवस्था के प्रति चिंता स्पष्ट है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुंदर संदेश!

janvaad ने कहा…

i agree with you in all sentence but one sentence swarg se wapas aao, i donot believe it, if we aal doing it at aal

Rajesh Kumari ने कहा…

aapke blog par pahli baar aai hoon bahut achchi prerak kavita padhne ko mili.bahut achchi rachna.welldone.saath hi apne blog par bhi aane ka nimantran deti hoon.update janne ke liye anusaran bhi kar rahi hoon.keep in touch.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत जम कर प्रहार किया है आपने बर्तमान व्यवस्था पर!

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

सुंदर रचना

आज का आगरा ,भारतीय नारी,हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल , ब्लॉग की ख़बरें, और एक्टिवे लाइफ ब्लॉग की तरफ से रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं

सवाई सिंह राजपुरोहित आगरा
आप सब ब्लॉगर भाई बहनों को रक्षाबंधन की हार्दिक बधाई / शुभकामनाएं