गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

हिरासत में मौत गंभीर मामला ! किन्तु आम बात

आज सुबह जब मै अखबार पढ़ रहा था तो अचानक मेरी नजर एक खबर पर पडी शीर्षक था " हिरासत में युवक की मौत से पुलिस संदेह के घेरे में" खबर को आगे पढ़ने पर पता चला कि मुंबई हाई कोर्ट के न्यायाधीश 'द्वय' जस्टिस बिलाल नाचकी एवं जस्टिस ए. आर. जोशी की डिविजन बेंच नें मंगलवार को याचिकाकर्ता मेहरूनिसा जो कि मृतक अल्ताफ की माँ है के याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पहली नजर में यह हिरासत में हत्या का मामला लगता है क्योंकि पोष्टमार्डम रिपोर्ट में यह बात कही गयी है कि मृतक अल्ताफ के पुरे शरीर पर गंभीर घाव थे पुलिस इस मामले की लीपापोती कर रही है । संभव है कि याचिकाकर्ता के प्रयास एवं मुंबई हाई कोर्ट की सक्रियता से अल्ताफ के हिरासत में मौत का मामला उजागर हो जाय यह भी संभव है कि मामला उजागर होने से पहले दबा दिया जाये और याचिकाकर्ता हाँथ मलते हुए अदालत से बाहर आ जाय क्योंकि न्यायपालिका, विधायिका आदि आज के भारतीय लोकतंत्र की तानाशाही के दिखाने के दाँत हैं, पुलिस, सेना और तरह-तरह के अर्द्धसैनिक बल ही उसके खाने के दाँत हैं। तमाम पुलिसिया दमन-उत्पीड़न के बावजूद सरकार दोषी पुलिसकर्मियों पर न तो कोई कार्रवाई करती है और न ही ब्रिटिशकालीन पुलिस सम्बन्‍धी कानूनों में संशोधन करती है। हिरासत में मौत अब आम बात हो गयी है देश भर में हर रोज पुलिस हिरासत या कानूनी हिरासत में औसतन चार लोगों की मौत हो रही है ।
एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट ( टार्चर इन इंडिया ) खुलासा किया है कि १ अप्रैल २००१ से ३१ मार्च २००९ तक देश भर में कुल ११८४ लोगों की पुलिस हिरासत में मौत होने की सूचना राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को मिली इसमें उन लोगों की भारी संख्या है जिनकी मौत पुलिस हिरासत में की गई हिंसा ( मार-पीट) से हुई अधिकतर मौतें पुलिस हिरासत में लिये जाने के ४८ घण्टों के भीतर हुईं वर्ष २००७ में पुलिस हिरासत में ११८ लोगों की मौत हुई जबकि २००६ में यह संख्या ८९ थी। यानी कि एक साल में ३२.५ प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी के बरक्स रिपोर्ट बताती है कि २००७ में पुलिस हिरासत में हुई मौतों के ११८ मामलों में सिर्फ ६१ मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच के आदेश दिये गये या जाँच की गयी। १२ मामलों में कानूनी जाँच हुई। ५७ मामलों में पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ मामले दर्ज किये गये और ३५ पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ चार्जशीट दाख़िल की गयी। ग़ौरतलब है कि वर्ष २००७ में हिरासत में हुई मौत के मामलों में एक भी पुलिसकर्मी को सज़ा नहीं हुई। ध्‍यान देने वाली बात यह भी है कि ये ऑंकड़े सिर्फ उन मामलों के हैं जिनकी सूचना सम्बन्धित राज्यों की पुलिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दी है। एसीएचआर की रिपोर्ट कई ऐसे मामलों का ज़िक्र करती है जिनमें हिरासत में हुई मौत की सूचना पुलिस ने मानवाधिकार आयोग को नहीं दी। इसके अलावा सेना, अर्द्धसैनिक बलों, सीमा सुरक्षा बल और अन्य सशस्त्र बलों की हिरासत मे होने वाली मौतों का ज़िक्र इस रिपोर्ट में नहीं है, क्योंकि ये बल केन्द्र सरकार के नियन्त्रण में हैं।
इन सब के बीच मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनाये गये राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्यों में राज्य मानवाधिकार आयोग के पास कोई ख़ास अधिकार ही नहीं होते। ये सिर्फ जवाब-तलब कर सकते हैं और सूचनाएँ इकट्ठा कर सकते हैं। सरकारी अधिकारी बहुत बाध्‍य हो जाने पर ही और काफी टालमटोल के बाद इनकी बात मानते हैं। इन आयोगों की शिकायतें और संस्तुतियाँ कार्रवाई के इन्तज़ार में पड़ी धूल फाँकती रहती हैं। हिरासत में मौत होने के ज्यादातर मामलों में पीड़ित के स्वास्थ्य सम्बन्‍धी रिपोर्टों और मौजूदा साक्ष्यों के बजाय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राज्य मानवाधिकार आयोग पुलिस के बयान को तरजीह देता है। यही कारण है कि वर्ष २००७ में हिरासत में हुई मौतों के सिलसिले में एक भी पुलिसकर्मी को सज़ा नहीं हो पायी। अन्य सरकारी विभागों की तरह ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी आम जनता को जितनी राहत देता है, उससे कहीं अधिक का भ्रम बनाये रखता है। मानवाधिकारों का खुलेआम और बड़े पैमाने पर हनन के विरोध में मीडिया और सभ्य समाज में किसी सार्थक पहल का पूरी तरह अभाव है। ऐसे में मानव अधिकारों के संरक्षण हेतु कार्य कर रहे देश के तमाम बुद्धिजीवियों एवं मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी निश्चित रूप से बढ़ गयी है ।

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