शनिवार, 15 सितंबर 2007

मानव अधिकारों के संघर्ष को कुचलने हेतु सरकारें सिद्दत से जुटी है

मानव अधिकारों के संघर्ष को कुचलने हेतु सरकारें सिद्दत से जुटी है


न केवल मानव अधिकार कार्यकर्ता और शिशु रोग विशेषज्ञ डा विनायक सेन को छत्तीसगढ़ सरकार प्रताड़ित कर रही है बल्कि आज पुरे देश में मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया जा रहा है. पुलिस अपराधियों के बजाय मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को अपना दुश्मन नम्बर 1, मान रही है. पुलिस जब मानव अधिकारों का हनन करती है तो राजनेताओं सहित तमाम लोग यह कहते हुए सुने जाते है की मुद्दे को उछालने से पुलिस का मनोबल गिरेगा उन्हें देश के नागरिकों के मनोबल की चिन्ता नही है. हमारा देश जब गुलाम था उस समय अंग्रेजों ने भारतीय पुलिस की रचना आम भारतीयों को कायर बनाने के लिए किया था इस दिशा में पुलिस आज भी तल्लीनता से जुटी है. इधर सन १९९६ में अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते भारत सरकार ने "the Protection of Human Rights Act." बिल संसद में पास किया जिसका मकसद था देश के आम नागरिक के मानव अधिकारों की रक्षा करने और ऐसे स्वयं सेवी संगठनो (NGOs) एवं (Activisto) कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन देना जो मानव अधिकारों के रक्षा के एवं उसके प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रहे है किंतु यह करके मानव अधिकार जो की आम नागरिक का मुद्दा था भारत सरकार ने हड़प लिया आज स्थिति यह है की राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं राज्यस्तरीय मानव अधिकार आयोग, आयोग नही बल्कि लालफीताशाही के प्रतीक बनकर रह गए है जो पुलिस मानव अधिकारों का हनन कर रही है वही पुलिस मानव अधिकार के हनन के मामले के जांच के लिये आयोग में बैठा दी गई है ( यानि घोडा घास की रखवाली के लिए नियुक्त है ) और आयोग में पहुची शिकायतों की लीपापोती करके शिकायतकर्ता को थकाकर अथवा पुलिस का डर दिखा कर चुप करा दिया जा रहा है. इतना ही नही अगर कोई मानव अधिकार कार्यकर्त्ता के खिलाफ झूठी सिकायत इन मानव अधिकार अयोगो को कर रहा है तो ये आयोग मानव अधिकार कार्यकर्ता के खिलाफ तत्काल कड़ी कार्रवाई के लिए हायर पुलिस अधिकारी को पत्र लिख रहे है और पुलिस अयोगो का इशारा पाते ही मानव अधिकार कार्यकर्ता पर भूखे शिकारी की तरह टूट पड़ती है यह सब योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के विरुद्ध राष्ट्रिय स्तर पर षड्यंत्र रचने और उन्हें कुचलने के लिए जो करवाईयां की जा रही है वे विचलित करने वाली है आये दिन इन्हे extortion, personation, imprisonment for life or other imprisonment, unlawful organisation prohibition act, आदि तमाम कानूनों के तहत देश भरके मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को फसाया जा रहा है इस विषय पर मिडिया भी अपवाद के रूप एकाध मामलों को छोड़ कर मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ घटीं पुरी घटना को जानने के बजाय पुलिस अधिकारीयों के बयानों को जनता के समक्ष पेश कर रही है जिसमे मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को विलेन के रूप में दिखाया जा रहा है. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है की इतने पर भी देश के सभी मानव अधिकार कार्यकर्ता एकजुट नही हो रहे है आज मुद्दा मानव अधिकारों के हनन को रोकने का नही बल्कि मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के अस्तित्व को बचाने का है. क्योकि यही ओ लोग है जो व्यवस्था में अंकुश-संतुलन को कायम रखने का कार्य करते है यही आम जनता के बीच जाकर उनके मानव अधिकारों के सुरक्षा के लिए कार्य कर रहे है

1 टिप्पणी:

Dr. Purushottam Lal Meena Editor PRESSPALIKA ने कहा…

जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-ष्भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थानष् (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in