सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

32 रूपये में कैसे जियेंगे मनमोहन जी?




देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की अध्यक्षता के अंतर्गत आधारभूत संरचना और मानव विकास के लिए पुख्ता योजनाये बनाने का दावा करने वाली केन्द्र सरकार की संस्था योजना आयोग ने उच्चतम न्यायालय को बताया है कि खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीब नहीं माना जा सकता है. गरीबी रेखा की नई परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है.

अपनी यह रिपोर्ट योजना आयोग ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष हलफनामे के तौर पेश की है. इस रिपोर्ट पर खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हस्‍ताक्षर किए हैं. योजना आयोग ने गरीबी रेखा पर नया मापदंड सुझाते हुए कहा है कि दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नै में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3860 रुपये खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता.

योजना आयोग के इस हास्यास्पद परिभाषा पर हो-हल्ला मचना शुरू हो चुका है. रिपोर्ट के मुताबिक, एक दिन में एक आदमी प्रति दिन अगर 5.50 रुपये दाल पर, 1.02 रुपये चावल-रोटी पर, 2.33 रुपये दूध, 1.55 रुपये तेल, 1.95 रुपये साग-सब्‍जी, 44 पैसे फल पर, 70 पैसे चीनी पर, 78 पैसे नमक व मसालों पर, 1.51 पैसे अन्‍य खाद्य पदार्थों पर, 3.75 पैसे रसोई गैस व अन्य ईंधन पर खर्च करे तो वह एक स्‍वस्‍थ्‍य जीवन यापन कर सकता है. साथ में एक व्‍यक्ति अगर 49.10 रुपये मासिक किराया दे तो आराम से जीवन बिता सकता है और उसे गरीब नहीं कहा जाएगा. योजना आयोग की मानें तो स्वास्थ्य सेवा पर 39.70 रुपये प्रति महीने खर्च करके आप स्वस्थ रह सकते हैं। शिक्षा पर 99 पैसे प्रतिदिन खर्च करते हैं तो आपको शिक्षा के संबंध में कतई गरीब नहीं माना जा जायेगा. यदि आप 61.30 रुपये महीनेवार, 9.6 रुपये चप्पल और 28.80 रुपये बाकी पर्सनल सामान पर खर्च कर सकते हैं तो आप आयोग की नजर में बिल्कुल भी गरीब नहीं कहे जा सकते.

योजना आयोग ने गरीबी की इस नई परिभाषा को तय करते समय 2010-11 के इंडस्ट्रियल वर्कर्स के कंस्यूमर प्राइस इंडेक्स और तेंडुलकर कमिटी की 2004-05 की कीमतों के आधार पर खर्च का लेखा-जोखा दिखाने वाली रिपोर्ट पर गौर किया है. हालांकि, रिपोर्ट में अंत में कहा गया है कि गरीबी रेखा पर अंतिम रिपोर्ट एनएसएसओ सर्वेक्षण 2011-12 के बाद पेश की जाएगी. ज्ञात हो कि उच्चतम न्यायालय ने गत 29 मार्च को 2004 के लिए निर्धारित मानदंडों के आधार पर वर्ष 2011 में गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों का निर्धारण करने पर मनमोहन सरकार को आड़े हाथ लिया था. कोर्ट ने योजना आयोग की सिफारिशों के आधार पर गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की आबादी 36 प्रतिशत होने के सरकारी दावों पर सवाल उठाते हुए सरकार से इसका विवरण माँगा था. न्यायाधीशों का कहना था कि 2004 में दिहाड़ी मजदूरी 12 रु. और 17 रु. थी, लेकिन क्या आज यह वास्तविकता है. इतने पैसे में आज क्या होता है? न्यायाधीशों का यह भी कहना था कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन में भी साल में कम से कम दो बार बदलाव होता है, लेकिन गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने में मानदंडों में सात साल में कोई बदलाव नहीं करना आश्चर्य पैदा करने वाला है.

आज देश का गरीब आदमी अपने ही नीतिनिर्धारकों द्वारा तय किये गए 'नव आर्थिक उदारीकरण' की मार झेल रहा है. उसकी जमीन, पानी और रोजी-रोटी राज्य द्वारा कब्जाई जा रही हैं ताकि सब कुछ बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और धन्ना-सेठों की खनन, सेज और दूसरे बड़े-बड़े प्रोजेक्टों, आदि के लिए दी जा सकें. जहाँ एक ओर पिछले 10 सालों में देश के कारपोरेट घरानों को 22 लाख करोड रूपये ( टेक्स आदि में छूट के माध्यम से) दे दिया गया वहीं देश के गरीब आदमी को सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी को खत्म करने की सोची-समझी रणनीति के तहत, योजना आयोग, मनमोहन सिंह के नेतृत्व में काम कर रहा है. अब ऐसे में उस उच्चतम न्यायालय को उन गरीबों की मदद के लिए आगे आना चाहिए, जिनके अधिकार छीनने की मंसा से योजना आयोग उच्चतम न्यायालय को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है. कोई मनमोहन, मोंटेक अर्थशास्त्रीद्वय, की मंडली से कोई यह पूछे की आपकी झक्क सफेदी जो कि आप सभी के पहनावे में झलकती है और क्रीच टूट जाने पर तत्काल बदल दी जाती है ( दिन में 3 बार) कितना खर्च आता है ? ( संभवतः 23 रूपये से कई गुना ज्यादा होगा) तो आपने यह कैसे मान लिया कि देश का आम आदमी केवल 32 रूपये रोज गुजारा कर लेगा ?

जब देश में वैश्वीकरण की नीतिया लागू की जा रहीं थी उस समय तमाम बुद्धिजीवियों नें जो आशंका व्यक्त की थी कि अगर वैश्वीकरण की नीतियों पर चल कर उदारीकरण और ग्लोबलीकरण को अपनाया गया तो अधिक से अधिक लोग हाशिए पर धकेल दिए जाएंगे. नतीजतन, एक ऐसी परिस्थिति निर्मित होगी जिसमें बहुत ही थोड़े से लोग अपना अस्तित्व बचा पाएंगे. गरीबों को यह चुनाव करना होगा कि वे फांसी लगाकर मरेंगे या कीटनाशक पीकर अथवा सरकारी सुरक्षाबलों के बंदूक की गोली से. क्या स्थितियां उससे अलग नजर आ रहीं हैं ? राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता की अधोगति तथा आर्थिक व राजनीतिक प्रक्रिया से दूर रखे जाने की प्रवृत्ति के कारण कई युवा गुमराह होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मजबूरन आतंकवाद और हिंसा तथा अन्य गैरकानूनी रास्ता अपनाने को बाध्य हुए हैं. इन स्थितियों के मद्देनजर क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि नक्सलवाद और कुछ नहीं, बल्कि अस्तित्व के संघर्ष में गरीबों के जवाबी प्रतिरोध का पर्याय मात्र है. सवाल यह है कि आखिर योजना आयोग के योजनाकारों के समझ में यह क्यों नहीं आता कि जिस देश में महंगाई दर 10 फीसदी की दर से बढ़ रही हो वहां का आम आदमी 32 रूपये में कैसे गुजारा कर सकता है.

वह वर्ल्ड बैंक जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आम आदमी के बारे में नहीं सोचता वह केवल अपने निवेशकों के बारे में सोचता है नें भी गरीबी रेखा के ऊपर की न्यूनतम आय 2 डॉलर यानि 96 रूपये तय किया है और हमारे नीति निर्धारकों की नजर में प्रतिदिन 32 रूपये की आय अर्जित करने वाले गरीबी रेख के निचे नहीं हैं. वैसे तो यूपीए 2 का घोषित लक्ष्य देश के आम आदमी और खासकर देश की गरीब आबादी के लिए ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध करवाकर उनका जीवन स्तर सुधारना था, लेकिन अब वही यूपीए2 की सरकार देश के चंद पूंजीपतियों व निजी कंपनियों का हितसाधक बन गई है. इसी के मद्देनजर गरीबी निर्धारण के भ्रामक आंकड़े उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया है. कुल मिलाकर उच्चतम न्यायालय को हलफनामे के रूप में दी गई योजना आयोग की रिपोट से यह स्पष्ट होता है कि मौजूदा दौर में बट्टा भारी हो गया है और आदमी हल्का हो गया है. सरकार की इन्ही नीति निर्धारण के मद्देनजर चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार, और आवास की बातें करना बेमानी है देश की गरीब जनता के सामने तो अब दो जून की रोटी का सवाल मुंह बाए खड़ा हो गया है.

सरकार की ढिठाई से बेलगाम होती महंगाई


महंगाई कम करने का जादुई तरीका रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने इजाद किया है जब-जब महंगाई बढती है तो आरबीआई अपने जादुई तरीके को अपनाते हुए रेपो रेट और रिवर्स रोपो रेट को बढा देती है परिणाम स्वरूप सभी बैंक व्याज दर में इजाफा कर देती है जिसका असर होम लोन, कार लोन, गूड्स करियर लोन, बिजनेस लोन, पर पड़ना तय है इसके लिए ज्यादा रूपये किस्त के रूप में बैंक को चुकता करना पड़ेगा. अब अगर विभिन्न कारणों से व्याज के रूप में ज्यादा पैसा बैंक को अदा करना पड़े तो महंगाई कैसे रुकेगी?

लगातार बढ़ रही महंगाई से पहले से ही परेशान आम भारतीयों के बजट पर सरकार नें इस सप्ताह फिर से एक बार कुठाराघात किया. इधर पेट्रोलियम कंपनियों नें पेट्रोल के दाम ३.१४ रूपये बढ़ाये तो उधर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया आम आदमी को राहत देने के बजाय सभी तरह के लोन को महंगा करने की व्यवस्था कर दी ऊपर से तुर्रा यह कि यह सब महंगाई को काबू करने के लिए किया जा रहा है. महंगाई को काबू करने के नाम पर पिछले १८ महीनों में १२ बार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया नें रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में २५-२५ बेसिस पाइन्ट्स की बढोत्तरी कर दी इस समय रेपो रेट ८.२५ और रिवर्स रेपो रेट ७.२५ पाइन्ट्स हो गया है. दरसल रेपो रेट का मतलब रिजर्व बैंक अन्य बैंकों को रेपो रेट पर उधार देता है और रिवर्स रेपो रेट का मतलब रिजर्व बैंक रिवर्स रेपो रेट पर अन्य बैंकों से उधार लेता है. जब हम महंगाई दर की चार्ट पर नजर डालते है तो हमें पता चलता है कि अगस्त के महीने में महंगाई दर बढ़कर ९.७८ फीसदी के साथ १२ महीने के उच्चतम स्तर तक जा पहुंची है. खाद्य महंगाई दर भी ३ सितंबर को खत्म हुए सप्ताह में लगातार छठवे सप्ताह भी ९ फीसदी के ऊपर रहते हुए ९.४७ फीसदी पर रही. बेकाबू हो रही महंगाई को रोकने में नाकाम सरकार अपने हाँथ खड़े कर रही है. और सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं को महँगा करना अपनी मजबूरी बता रही है.

सरकार द्वारा लगातार महंगाई बढ़ाना क्या जनविरोधी कदम नहीं है ? गुरुवार रात से पेट्रोल के दाम ३.१४ रूपये बढा दिए गए इसी के साथ इस साल जनवरी से लेकर अब तक लगभग १० रूपये पेट्रोल के दाम में बढ़ोत्तरी कर दी गई है. पेट्रोल के दाम बढ़ाये जाने को लेकर सरकार द्वारा जो बार-बार बहाना बनाया जाता है वह है पेट्रोलियम कंपनियों को लगातार घाटा होना. जिस तरह से पेट्रोलियम कंपनियों के घाटे की बात की जाती है उसके हिसाब से अब तक पेट्रोलियम कंपनियों को दिवालिया हो जाना चाहिए था. किन्तु ऐसा न होकर पेट्रोलिय की कीमतें बढाये जाने के कारण आम आदमी लगातार आर्थिक रूप से दिवालिया हो रहा है. पेट्रोलियम पदार्थों के कीमतों की बढ़ोत्तरी के पीछे अनुमानत: औद्योगिक घराने ही हैं. क्योकिं इन औद्योगिक घरानों के पेट्रोलियम पदार्थों के (रिटेल चेन) पेट्रोल पम्प इस लिए बंद करने पड़े थे क्योकि कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों को बेलआउट देती थी जिससे उनका नुकसान जो कि सब्सिडी देने पर होता था उसकी भरपाई हो जाती थी और प्राइवेट कंपनियों के नुकसान की भरपाई नहीं हो पा रही थी. अब सरकार उन्ही कंपनियों के हितों के मद्देनजर लगातार पेट्रोलियम के दाम बढाती जा रही है. जिससे कि एक बार फिर से पेट्रोलियम के कारोबार में लगे औद्योगिक घराने पेट्रोलियम पदार्थों के (रिटेल चेन) पेट्रोल पम्प खोल सकें.

व्याज दर बढ़ाकर महंगाई कम करने का जादुई तरीके को समझना मुश्किल है. प्राप्त जानकारी के अनुसार महंगाई कम करने के नाम पर आरबीआई नें पिछले ३ वर्षों में कुल १२ बार व्याज दरों में बढ़ोत्तरी की लेकिन क्या महंगाई कम हुई. वस्तुत: महंगाई कम नहीं होगी उसके कारण सीधे और स्पष्ट हैं भारत सरकार को अनाज, दालें, खाने के तेल, फल आदि, बहुराष्ट्रीय निगमों के (रिटेल चेन) शापिंग माल में बेचने और मुनाफा कमाने का अवसर देना जो है. अब अगर १०-२० रूपये किलो अनाज, दालें, खाने के तेल, फल आदि बेचे जायेगे तो शापिंग माल बनाने में किये गए पूंजी निवेश का रिटर्न या माल के कर्मचारियों की तनख्वाह और रखरखाव तो छोडिये शापिंग माल में लगे सेन्ट्रल एसी के लिए उपभोग की गई बिजली का बिल नहीं भरा जा सकेगा. जमाखोरी के विरुद्ध आपने आढ़तियों के गोदामों पर छापेमारी करते हुए खाद्यान विभाग के अधिकारियों को देखा होगा लेकिन क्या कभी आपने यह भी सुना कि रिटेल चेन के कारोबार में संलग्न बहुराष्ट्रीय निगमों के वेयरहाउसों (जहाँ खाद्यान का बंफर स्टाक जमा करके रखा जाता है) में खाद्यान विभाग के अधिकारियों द्वारा छापेमारी की गई?

अब सरकार यह कहती नजर आ रही है कि महंगाई से हो रही जनता की तकलीफों के लिए हमें खेद है लेकिन चीजों के दाम बढ़ाना हमारी मजबूरी है, सरकार में बैठे लोगों से सवाल किया जाना चाहिए कि महंगाई बढ़ाना आपकी मजबूरी है, भ्रष्टाचार में आपके संतरी से लेकर मंत्री तक सभी आकंठ डूबे हुए है इसलिए भ्रष्टाचार आप मिटा नहीं सकते, आतंकवाद से निपटना आपके बूते का नहीं तो आप सत्ता से क्यों चिपके है. इधर महंगाई सुरसा की तरह बढ़ रही है और उधर आपके मंत्रियों की संपत्ति में हजार-हजार प्रतिशत का इजाफा हो रहा है ! आखिर माजरा क्या है ? छठे वेतन आयोग को लागू करने के भार से अभी केन्द्र सरकार उबर नहीं पायी थी कि केन्द्र सरकार नें १ जुलाई २०११ से अपने कर्मचारियों को ७ प्रतिशत डीए बढा दिया है. इस फैसले से केन्द्र सरकार के ५० लाख कर्मचारी और ४० लाख पेंशनर को फायदा मिलेगा इससे सरकार पर सालाना ७,२२८,७६ करोड रूपये का अतिरिक्त भार होगा. यहाँ यह समझ में आता है कि सरकार का एकमेव उद्देश्य रह गया है... महंगाई बढाओ, आम जनता को लूटो, सरकारी खजाने भरो, और फिर उसे सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, पार्षदों, विधायकों, सांसदों, और मंत्रियों में बंदरबाँट करो.

१९९१ से लेकर आज तक केवल और केवल देश की सार्वजनिक निगमों को जिसे नवरत्न कहा जाता था. उन्हें पूजीपतियों के पक्ष में न केवल हलाल किया गया वरन एनडीए शासनकाल में (डिस्इन्वेस्टमेंट) विनिवेश मंत्रालय बनाकर औद्योगिक घरानों के हवाले किया गया, जनहित से जुड़े क्षेत्र एक-एक कर औद्योगिक घरानों के हवाले किया जा रहा है, चाहे वह बैंकिंग का क्षेत्र हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, चिकित्सा का क्षेत्र हो, खनन का क्षेत्र हो, यहाँ तक कि बिजली और पानी भी. उधर मंदी से अमेरिका का दम निकल रहा है अमेरिकी बांडों की साख लगातार गिर रही है फिर भी क्या कारण है कि डालर के सामने रूपया (रूपये का अवमूल्यन हो रहा है) लगातार टूट रहा है. आखिर इस समय रूपये के अवमूल्यन का रहस्य क्या है? क्या रूपये का अवमूल्यन निर्यात के व्यवसाय से जुड़े पूंजीपतियों के इशारे पर किया जा रहा है? रइस मंत्रियों के तले देश का दम घुट रहा है और आम आदमी को हासिए पर फेंक दिया गया है.

अब सरकार की नीतियां और सोच मुनाफा बनाने तक ही सीमित हो गई है मुनाफा बनाना ही विकास है. “कल्याणकारी राज्य” अब “मुनाफाखोर राज्य” में तब्दील होता दिख रहा है. सरकार अभी और भी कड़े फैसले लेने की बात कर रही है. रसोई गैस और रेल यात्री/माल किराये में वृद्धि. यानि आम आदमी अभी और अपनी आर्थिक रीढ़ पर महंगाई का वार सहने को को तैयार रहें. अरे सरकार उनके हितों की सुरक्षा के लिए क्यों कड़े फैसले नहीं ले रही है जिसके मतो से वह सत्ताशीन हुई है. स्पष्ट दीखता है कि भारतीय लोकतंत्र को सरकार नहीं बल्कि देश के कुछ चुनिन्दा वकीलों के माध्यम से बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने मन मुताबिक हांक रही हैं. महंगाई बढ़ाकर आम आदमी का जेब काटने से लेकर किसानों और आदिवासीयों के हिस्से का जल, जंगल और जमीन लूटने की कयावद जारी है. किन्तु यूपीए सरकार की कैबिनेट द्वारा तेज टिकाऊ और समग्र विकास का जुमला फेंका जा रहा है अब इस जुमले का आम आदमी क्या करे ? वैसे तो यह सभी को पता है कि सत्ता हाँथ में आते ही जैसे कांग्रेस के पिछले जुमले “कांग्रेस का हाँथ गरीब के साथ” को पलट दिया था वैसे ही आम आदमी तेज टिकाऊ और समग्र विकास को अपने साथ जोड़कर न देखे क्योंकि यह जुमला सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों, पार्षदों, विधायकों, सांसदों, और मंत्रियों और पूंजीपतियों के लिए है आम आदमी के लिए नहीं.


बुधवार, 7 सितंबर 2011

सोती सरकारें मरते लोग

आज सुबह १० बजकर १५ मिनट पर दिल्ली हाईकोर्ट के गेट नं ५, पर जोरदार बम धमाका हुआ है । बताया जा रहा है कि इस् बम धमाके में कम से कम ११ लोगों की मौत हो गयी है और लगभग ७६ से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हैं। आज बुधवार का दिन था। आज का दिन दिल्ली हाईकोर्ट के पीआईएल (पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन) का दिन होता है यह बम धमाका दिल्ली हाईकोर्ट के गेट नं ४ और ५, के बीच जहाँ लिटीगेंस/ विजिटर्स का पास बनाया जाता है लिटीगेंस /विजिटर्स का पास बनाने के लिए लोगों की लंबी कतार लगी हुई थी। सुबह कोर्ट खुलने का समय होने के कारण दिल्ली हाईकोर्ट के गेट नं ५, के आस-पास वकीलों और उनके मुवक्किलों की भारी भीड़ जमा थी। चश्मदीदों के अनुसार यह बम ब्रीफकेस में रखकर लाया गया था और इसे ठीक उस वक्त ब्लास्ट कराया गया जब दिल्ली हाईकोर्ट के गेट नं ५ पर भारी भेद जमा थी। भारत सरकार के गृह सचिव के मुताबिक इस् धमाके में आईईडी और टाइमर का इस्तेमाल किया गया हो सकता है। धमाके में अमोनियम नाईट्रेट का भी इस्तेमाल किये जाने की खबर है। इस् बीच खबर आयी है कि हरकतुल इस्लामी जेहाद के नाम का मेल मीडिया को भेजकर एक आतंकी गुट नें इस आतंकी कार्रवाई की जिम्मेदारी ली है। गृह मंत्रालय के अनुसार इस मामले के जाँच की जिम्मेदारी नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी (एन.आई.ए) के हवाले कर दी गयी है।

केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम नें संसद में दिए गये अपने बयान में यह क़ुबूल कर लिया है कि यह एक आतंकवादी हमला है। उन्होंने मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करने की रस्म अदायगी भी की साथ ही धमाके की जगह का ८ मिनट ( इतने कम समय में पी चिदंबरम नें घटनास्थल का दौरा कर क्या हासिल करना चाहते थे ए वे ही जानें) का दौरा कर यह जताने की भरपूर कोशिश की है कि सरकार इस आतंकी कार्रवाई में मारे गये लोगों और घायलों के प्रति संवेदनशील है। दिल्ली की मुखिया शीला दीक्षित भी १.१५ बजे घायलों का हाल-चाल जानने डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंची। जाहिर है कि इस धमाके से संबंधित और इस तरह के मामलों को रोकने के लिए जिम्मेदार दोनों नेताओं नें लगभग अपनी-अपनी औपचारिकतायें पुरी कर ली हैं संभव है कि इन दौरों के पश्चात् मृतकों के परिजनों और घायलों के लिए मुआवजे भी घोषित कर दिए जाय। शीला दीक्षित की आगवानी के लिए डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल का अमला हाँथ बांधे खड़ा नजर आया किन्तु आश्चर्य यह होता है कि घायलों और मृतकों के परिजन पागलों की तरह अपनें लोगों को ढूढ़ रहे थे किन्तु उन्हें जानकारी देने वाला किसी भी अस्पताल में कोई नहीं था।

ज्ञात हो कि इसी वर्ष २५ मई को दिल्ली हाईकोर्ट की पार्किंग में आतंकियों द्वारा बम धमाका किया गया था किन्तु उस धमाके में न किसी की मौत हुई थी और न ही कोई हताहत हुआ था। दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर गेट नं ५ पर आज किये गये बम धमाके उन आतंकियों के मनोबल और हमारी सुरक्षा एजेंसियों के नकारेपन का पता चलता है। बताया जाता है कि दिल्ली पुलिस के आलावा दिल्ली हाईकोर्ट की सुरक्षा का जिम्मा सीआईएसएफ के हवाले है। सवाल यह पैदा होता है कि ये सभी सुरक्षा एजेंसियों ने २५ मई को दिल्ली हाईकोर्ट परिसर में हुए बम धमाके के बाद सुरक्षा के लिहाज से क्या कदम उठाया । क्या उस जगह पर जहाँ २५ मई को बम धमाका हुआ था वहां सीसीटीवी कैमरे नहीं लगाये जा सकते थे ? अगर पिछले धमाके से सबक लेते हुए उस स्थान पर सीसीटीवी कैमरे लगा दिए गये होते तो आज के धमाके की जांच में कुछ न कुछ मदद जरूर मिलती, कुछ न कुछ सुराग सीसीटीवी कैमरे के माध्यम से जरूर मिलते। आम तौर पर कहा जाता है कि आतंकी उस जगह को दुबारा निशाना नहीं बनाते जिस जगह को वे एक बार निशाना बना चुके होते है किन्तु आज के बम धमाके के मामले में आतंकियों द्वारा इस् सोच को पलट दिया गया दीखता है।

देश में जहाँ जहाँ आतंकियों द्वारा बम धमाके किये गये है वहां के सुरक्षा के बारे में अगर एक नजर डालें तो हमें पता चलता है कि सुरक्षा एजेंसियों द्वारा भारी लापरवाही की जा रही है। सवाल यह उठता है कि किसी भी आतंकवादी कार्रवाई के पश्चात प्रेकॉशन के लिए कौन कौन से स्टेप उठाये गये। क्या मुखबिरी के नेटवर्क को मजबूत किया गया ? क्या तकनीक के इस्तेमाल के लिए जरूरी कदम उठाये गये ? अथवा क्या इसे नियती मानकर देश की सुरक्षा एजेंसियों की मजबूरी को मान्यता दे दी जाय ? बांग्लादेश के दौरे पर गये देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भी बयान आ चुका है उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के पास हुए इस आतंकी कार्रवाई को 'कायरता पूर्ण कार्रवाई' बताया है। उन्होंने कहा है कि "हम इस आतंकवाद के आगे झुकेंगे नहीं, ये एक लंबी लड़ाई है जिसमे सभी राजनैतिक दलों और नागरिकों को मिलकर लड़ना होगा" प्रधानमंत्री जी देश का आम आदमी आपसे पूछ रहा है कि आतंकियों के विरुद्ध इस लड़ाई को लड़ने के लिए आपकी क्या तैयारी है ? इसका जवाब है आपके पास ? क्या इस लड़ाई में आप लगातार आम आदमी को झोकते रहेंगे आखिर इन आतंकवादी कार्रवाई को रोकनें में आप अक्षम क्यों हैं ? इन आतंकी कार्रवाईयों में आम जनता मरने को अभिशप्त क्यों है।

वकील के लबादे में और वकील की हैसियत से दिल्ली हाईकोर्ट में घटनास्थल पर पहुंचे कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी नें मीडिया से पहले ही अपनी असहमती दर्ज करा दी उन्होंने कहा कि वे मीडिया से असहमत हैं । (ध्यान रहे कि उस समय मीडिया के लोग ऐसे धमाकों को न रोक पाने के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे थे ) अब अभिषेक मनु सिंघवी से यह कौन पूछे की इस् भारी चूक की जिम्मेदार सरकार और संबंधित एजेंसियां नहीं हैं तो और कौन है? शीला दीक्षित नें मृतकों और घायलों के परिजनों के प्रति सहानुभूति जताती नजर आयी। लेकिन शीलाजी आपकी सहानुभूति का आम आदमी क्या करे, उसे ओढ़े या बिछाए, क्या आपके सहानुभूति से उन लोगों के परिजनों के जीवन हानि या वे जिन्होंने धमाके में अपनें हाँथ-पाँव खो दिए है उनके नुकसान की भरपाई हो पायेगी, आपनें तो चूक की जिम्मेदारी इन्क्वायरी के गड्ढे में डाल दिया। अब शायद is चूक की गाज किसी छोटे-मोटे अधिकारी पर गीरेगी और उसे नाप दिया जायेगा। और जैसा कि लगभग सभी आतंकी कार्रवाई के बाद एक सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या इस् आतंकी कार्रवाई के बाद हमारी सरकार और संबंधित एजेंसियां सबक ले लेंगी? क्या आइन्दा इस तरह की घटनाओं को रोकने का तरीका निकाल लिया जायेगा ? या इस घटना के बाद भी सरकारें और संबंधित एजेंसियां सोती रहेंगी और देश का आम आदमी इन आतंकी कार्रवाईयों का शिकार होकर लगातार मरता रहेगा। और इस तरह के धमाकों को रोकने के लिए (गलत) नीतियां बनाने के जिम्मेदार लोग सत्ता के गलियारे में उसी पुराने ठसक के साथ सत्ता की मलाई खाने में मशगूल हो जायेंगे या देश की आम जनता इन्हें इनकी जिम्मेदारियों का एहसास करायेगी।

रविवार, 4 सितंबर 2011

कुपोषण के काल के गाल में नौनिहाल

भिवंडी, शाहपुर, वाडा, मोखाड़ा, पालघर, दहाणू, व तलासरी के इलाके देश की आर्थिक राजधानी मुंबई से १०० किलोमीटर के दायरे में पड़ते है। लेकिन १०० किलोमीटर दूर मुंबई अगर अपने ऐशो आराम के लिए जानी जाती है तो मुंबई से सटे ये इलाके इन दिनों किसी और कारण से चर्चा में है। यह कारण है अबोध बच्चों की कुपोषण से मौत। भारी संख्या में बसे आदिवासी और उनके बच्चे भूख और कुपोषण के चलते कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने को अभिशप्त है। बीते महीने अगस्त के आख़िरी सप्ताह में खबर आयी कि इन उपरोक्त इलाकों में कम से कम १५० आदिवासी बच्चों की कुपोषण से मौत हो गई तथा हजारों की संख्या में बच्चे आब भी कुपोषण के कारण मौत के कगार पर हैं।

यह खबर भी तब आ रही है जब देश भर में १ से ७ सितंबर के बीच राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जा रहा हैराष्ट्रीय पोषण सप्ताह के बीच कुपोषण से मौत की ख़बरें स्तब्ध कर देने वाली है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून २०११ तक कुपोषण से ठाणे जिले में कुल १५८ मृत्यु दर्ज की गई। इसमें ११९ बच्चों की उम्र केवल १ वर्ष है तथा बाकी बच्चों की उम्र ६ वर्ष तक है। आंकड़ों के अनुसार अप्रैल में ५५, मई में ४९, और जून में ५४ बच्चों की मृत्यु कुपोषण से हुई इस वर्ष के आंकड़ों के अनुसार भिवंडी में ३, वसई में १, मुरबाड में ३, शाहपुर में १४, वाडा में ६, दहाणू में ७, मोखाड़ा में ५, जव्हार में ६, और विक्रमगढ़ में १, बच्चे की मौत कुपोषण के कारण हुई।

इन कुपोषण से लगातार हो रही मौतों के संबंध में अगर ठाणे जिले के स्वास्थ्य विभाग के दावे को माने तो कुपोषण से हो रही इन मौतों में ३०% की कमी आयी है प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मोखाड़ा तालुका में ही कुल ९४३७ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। बताया जाता है कि मोखाड़ा तालुका में सामान्य कुपोषित बच्चों की संख्या ५९९०, तथा मध्यम कुपोषित बच्चों की संख्या ३१६५ और तीव्र कुपोषित बच्चों की संख्या २८२ सहित कुल ९४३७ बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं। उन २८२ कुपोषित बच्चों की हालत दिनों-दिन बद-से बदतर होती जा रही है और जिले का स्वास्थ्य विभाग आंकड़े इकट्ठे करने और उसकी तुलना पिछले वर्ष कुपोषण से हुई मौतों से करने में मशगुल है। जबकि स्वास्थ्य विभाग को यह मालूम रहता है कि कुपोषण का गंभीर खतरा सबसे अधिक बच्चों के गर्भ में आने से लेकर ३३ महीने तक रहता है। और कुपोषणग्रस्त इलाकों में कम से कम ६ वर्ष तक नजर रखना आवश्यक होता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि फुला हुआ पेट, थका हुआ चेहरा और बेहद पतले हांथ-पैर बच्चों में कुपोषण के आम लक्षण हैं।

आपको याद दिला दें कि दिसंबर २०१० में एक खबर आयी थी कि देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबई शहर में १४ बच्चे भुखमरी और कुपोषण के कारण काल के गाल में समा गए थे। इस भूखमरी और कुपोषण से प्रशासन और सरकार बेखबर थी जब मीडिया के द्वारा खबरें निकलकर आयी तो पता चला कि मुंबई के गोवंडी इलाके में पांच साल और उससे कम उम्र के १४ बच्चे भूख और कुपोषण के शिकार हो गए। पता चला था कि गोवंडी के झोपड़पट्टी में ६५% बच्चे कुपोषण के शिकार थे। इस मामले का खुला तब हुआ जब मुंबई की टाटा इंस्टीट्युट ऑफ़ सोशल साईंस से जुडी एक स्वयंसेवी संस्था नें जब गोवंडी झोपड़पट्टी का सर्वे किया। कुल ६०० परिवारों का सर्वे करनें पर उन्हें पता चला कि इन ६०० परिवारों के बीच कुल १४ बच्चे कुपोषण के वजह से मौत के शिकार हुए और गोवंडी की झोपड़पट्टी में ६५ % कुपोषण के शिकार बच्चे कमजोरी के कारण नियुमोनिया, मेनेंजाईटीस, और डायरिया से जूझ रहे थे। अब अगर पिछले साल ही सही देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का यह हाल था तो मुंबई से सटे ठाणे जिले के आदिवासी इलाके के १५८ बच्चों की भूख और कुपोषण से हुई मौत आश्चर्य तो नहीं किन्तु शासन और प्रशासन की लापरवाही पर गंभीर चिंता का सबब बनता है।

हमारे शासकों द्वारा बताया जा रहा है कि भारत तेजी से विश्व की एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित हो रहा है और इस विकास दर को ८.५ का बताया जा रहा है । देश के नीतिनिर्धारकों के लिए क्या यह शर्म की बात नहीं है कि इस तेजी से विकसित हो रहे देश में बच्चों की एक बड़ी आबादी कुपोषण के कारण तिल-तिल कर मरने को मजबूर है आंकड़े बताते हैं कि देश में प्रति वर्ष ६,००,००० बच्चों की मौत कुपोषण के कारण हो जाती है। वैश्विक संस्थाओं, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और तमाम गैर सरकारी संगठनों के आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में बाल कुपोषण की खतरनाक स्थिति का पता चलता है। देश में ४३% बच्चे कुपोषण के वजह से सामान्य से कम वजन के हैं। और ५ वर्ष से कम उम्र के करीब ७०,००,००० बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं। वैश्विक भूख सूचकांक नें भी २०१० की अपनी रिपोर्ट में भारत में कुपोषण की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई थी वैश्विक भूख सूचकांक की रिपोर्ट में शामिल १२२ विकासशील देशों की सूची में भारत ६४ वें स्थान पर था इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व के सामान्य से कम वजन वाले बच्चों में से ४२ % बच्चे भारत में ही हैं।

सरकार और उसके नुमाइन्दों द्वारा आमतौर पर यह तर्क दिया जाता है कि कुपोषण की समस्या का मूल कारण आबादी है पर अगर हम अपनी तुलना चीन से करेंगे तो हमारी सरकार और उसके नुमाइन्दों का तर्क हमें खोखला और बेमानी लगने लगता है क्योंकि चीन की जनसंख्या हमारे देश से कहीं अधिक है। फिर भी वहां कुपोषण के शिकार बच्चे हमारे देश से छह गुणा कम है। सरकार नें बच्चों में कुपोषण को दूर करने के लिए कई योजनायें और जागरूकता कार्यक्रम भी चलायें हैं। छह वर्ष तक के बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए समेकित बाल विकास योजना शुरू कई गई। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधीन खाद्य एवं पोषण बोर्ड लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाने के लिए हर साल १ से ७ सितंबर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह आयोजित करता है। इस् वर्ष भी इस् सप्ताह के दौरान देश भर में कार्यशालाओं, शिविर, प्रदर्शनी आदि का आयोजन कर लोगों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाया जा रहा है। लेकिन लगातार कुपोषण से हो रही मौतों के आकड़ें ऐसे प्रयासों, कार्यक्रमों और नीतियों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

रविवार, 28 अगस्त 2011

अरे रे... स्वामी अग्निवेश.. ए क्या कर रहे हो महाराज च.. च..




ये है स्वामी अग्निवेश का असली चेहरा....स्वामी अग्निवेश भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे और देश के उन करोड़ों आन्दोलनकारियों के आन्दोलन का हिस्सा बनकर किस तरह सरकार के भेदिये का काम कर रहे है । इसका खुलासा या यूं ट्यूब का सवा मिनट का विडियो करता है इस् विडियो में स्वामीजी संभवतः कपिल सिब्बल से बात कर रहे है। उन्हें समझा रहे है कि कैसे सरकार जितना झुकती जा रही है उतना ही ये लोग अर्थात अन्ना हजारे के लोग सिर पर चढ़ रहे है। इसे आप खुद सुनें और अपने विचारों से हमें अवगत करायें।

सोमवार, 22 अगस्त 2011

उम्मीद की लौ


अब संसद के पीछे

छिपने लगे है नेता

और जनता सड़क पर

उतर गयी है


१२० करोड़ जनता नें

तय कर लिया है

कि वे जगाकर रहेंगे ५४५

सोये हुए लोगों को


अन्ना का

स्वास्थ्य गिर रहा है

गिर रही है सरकार की

लोकप्रियता भी


हे ईश्वर

सलामत रखना

अन्ना को और उनके

स्वास्थ्य को भी


क्योंकि उन्होंने

जनता के मन में

उम्मीद की लौ
जला दी है

शनिवार, 20 अगस्त 2011

स्विस बैंक तथा अन्य बैंकों में जमा भारतियों के काले धन की सूची

स्विस बैंक तथा अन्य बैंकों में जमा भारतियों के काले धन की सूची जुलियस अन्साजे नें अपने वेब साईट विकीलीक्स के माध्यम से दिनांक ०२/०८/२०११ को जारी की है। इस् सूची की जानकारी हमें न्यूज़ ऑफ़ डेल्ही डाट काम पर मिली। इसे आप भी देखें और अपनी टिप्पणी से हमें अवगत कराएँ।